कर्मफल

कर्मफल!

रामायण काल में श्रीराम समुद्र प्रकरण में
“विनय ना मानत जलधि जड़
गए तीन दिन बीत,
बोले राम सकोप तब,
भय बिन होय ना प्रीत!”
.
महाभारत में श्रीकृष्ण ने
शिशुपाल की 100 भूलों तक क्षमा करने और लगभग हर भूल के बाद चेतावनी देने की वचनबद्धता दर्शाई! 101 वीं भूल होते ही श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का सर धड़ से अलग कर दिया था!
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जीजस क्राइस्ट ने
क्षमादान को महानतम बताया
और उनको सूली टांगने
के जिम्मेदार राजा को भी क्षमा कर दिया!
बाद में उस राजा को जनता ने बहुत बुरी मौत दी! उसका अंत बहुत खराब हुआ!
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उपरोक्त सभी मेरे आदर्श हैं !
श्रीराम ने जड़ यानी मूर्ख से
सज्जनता पूर्वक निवेदन को व्यर्थ माना!
श्रीकृष्ण ने दुष्ट से समझदारी को व्यर्थ बताया
और जीजस कथा से स्पष्ट है कि
मूर्ख और दुष्ट के लिए आप कोई सजा दो या ना दो उसे अपने कर्मों की सजा तो
मिलनी ही मिलनी है!
ये संदर्भ बताते है कि
प्रत्येक व्यक्ति अपने किये
हर एक दुष्कर्म
और इसी तरह सत्कर्म का भी
फल कभी ना कभी
मिलता अवश्य है!
सुधर जाइए!
सजाओं का समय सन्निकट है!
-SatyaArchan सुबुद्ध

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

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