खुशी? यहां छुपी है!

खुशी? यहां छुपी है!

सबके लिए रामबाण औषधि है
उपरोक्त संदेश!

….. विज्ञान के सिद्धांत से उल्टा होता है मनोविज्ञान, धर्म, अध्यात्मिक सिद्धांत है जिसमें “सकारात्मक ही सकारात्मक को खींचता है…!” और “नकारात्मक नकारात्मक को!”
यही उपरोक्त संदेश में संक्षेप में था ! हमारी सोच ही हमारा परिवेश नकारात्मक बनाती है किन्तु हमारी ही सोच हमारे परिवेश को सकारात्मक बनाने में भी पूर्ण सक्षम है!

कैसे ? आइये देखते हैं!

सामान्यतः हम सब दुःख, दर्द, तकलीफ़ोंं की ही शिकायत लिए बैठे रहते हैं…! अपनी खूबियों और औरों की खामियों को देख-देख दर्द की अनुभूति से तड़पते-छटपटाते जीवन को, कांटों की सेज सा समझ इस मृत्युलोक को ही नर्क-लोक मान नारकीय जीवन जीते रहते हैं! सामान्यतः लोग मानते हैं कि दिन-प्रतिदिन घटित होता हुआ सबकुछ जो होना चाहिए उससे उल्टा ही होता है… मनचाहे के विपरीत ही होता है…! जाने भाग्य हमसे ही क्यों रूठा है…! हर दिन हर घड़ी उल्टा ही क्यों होता रहता है! जबकि हर दिन, हर घंटे कुछ ना कुछ अच्छा भी अवश्य होता रहता है… मगर 99% ध्यान उस 10-20% ना हो सके अच्छे पर ही रहता है…!

जब कोई स्त्री-पुरुष प्रेममय होते हैं तो अधिकांश समय उनके मन में वही प्रियतम / प्रियतमा रहता है.! जहां भी देखते हैं वहीं दिखाई देता / देती है/ जिन प्रेमी प्रेमिका के मन की लगन, चाह, जितनी गहरी, सच्ची होती है वे उतना ही सफल दाम्पत्य जी रहे होते हैं! किन्तु केवल वे जो अपने सहचर की खामियों को अनदेखा कर उसकी जिन खूबियों पर मर मिटे थे उनको महत्व देते रह पाते हैं….! कहते हैं ना जहां चाह वहां राह! अन्यथा एक दूसरे की खामियों को तूल देने वालोें से तो दुनियां भरी पड़ी है…!

मनोवैज्ञानिक के सिद्धांत अनुसार जो जितने गहन चिंतन में रहता है… वह उतना ही सहजता से उतने ही शीघ्र साकार होता है! अध्यात्म में भी उस ‘सर्वोपरि’ का यही विधान माना जाता है! प्रियतम की तरह मनोमष्तिष्क में जो 99% जगह घेरे रहता है वह आपका प्रियकर नहीं तो क्या समझा जायेगा?

समाज में 99% चर्चा दूसरों की कमियों पर होती है जबकि जिनकी आलोचना हो रही है उनमें भी कुछ तो खूबियां होती हैं…!

हम में और हर एक में खामियां होती हैं तो खूबियां भी होती ही हैं…! हममें से अनेक स्वयं अपनी और अपनों की तक की खूबियों को पहचानते ही नहीं…! वो अपनी, अपनों की, दूसरों की खूबियों से अनजान सबकी केवल खामियों की ही बात/ आलोचना कर रहे होते हैं! वे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को नकारात्मक (अधोन्मुखी) बनाने के साथ साथ कहीं ना कहीं अपनों के, अपने घर, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश, दुनियां की ऊर्जा को भी नकारात्मक ही बना रहे होते हैं….! नकारात्मकता से सजे भोज को ग्रहण करने सकारात्मकता कैसे आ सकती है!

जबकि; कमियों-खामियों के चिंतन में डूबे दुःखी जन, जरा से प्रयास से ही इसका ठीक उलट भी आराम से कर सकते है…!

हमारी, हमारों की और हर एक की मनभावन खूबियों पर ध्यान और खामियों को अनदेखा कर खूबियों की ही चर्चा शुरू तो की जाये….! जीवन से जो नहीं मिला या नहीं मिल रहा को अनदेखा कर जो मिला और जो मिल रहा है पर ही ध्यान देना शुरू कर, उसी की चर्चा की जाये! अप्राप्त के शोक की जगह प्राप्त के सुख का आनंद उठाना क्यों ना किया जाये! शुरू तो कीजिए, जरा से प्रयास से अभ्यास बन जायेगा फिर दिनचर्या…. फिर सकारात्मक सोच से सकारात्मक व्यक्तित्व, ओजोमय औरा, खुशहाल घर, अपने, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश और सारी दुनियां सकारात्मक और सुखमय ही दिखने लगेंगे… और जहां तक हम जायेंगे जि

हैं तो खूबियां भी होती ही हैं…! हममें से अनेक स्वयं अपनी और अपनों की तक की खूबियों को पहचानते ही नहीं…! वो अपनी, अपनों की, दूसरों की खूबियों से अनजान सबकी केवल खामियों की ही बात/ आलोचना कर रहे होते हैं! वे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को नकारात्मक (अधोन्मुखी) बनाने के साथ साथ कहीं ना कहीं अपनों के, अपने घर, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश, दुनियां की ऊर्जा को भी नकारात्मक ही बना रहे होते हैं….! नकारात्मकता से सजे भोज को ग्रहण करने सकारात्मकता कैसे आ सकती है!

जबकि; कमियों-खामियों के चिंतन में डूबे दुःखी जन, जरा से प्रयास से ही इसका ठीक उलट भी आराम से कर सकते है…!

हमारी, हमारों की और हर एक की मनभावन खूबियों पर ध्यान और खामियों को अनदेखा कर खूबियों की ही चर्चा शुरू तो की जाये….! जीवन से जो नहीं मिला या नहीं मिल रहा को अनदेखा कर जो मिला और जो मिल रहा है पर ही ध्यान देना शुरू कर, उसी की चर्चा की जाये! अप्राप्त के शोक की जगह प्राप्त के सुख का आनंद उठाना क्यों ना किया जाये! शुरू तो कीजिए, जरा से प्रयास से अभ्यास बन जायेगा फिर दिनचर्या…. फिर सकारात्मक सोच से सकारात्मक व्यक्तित्व, ओजोमय औरा, खुशहाल घर, अपने, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश और सारी दुनियां सकारात्मक और सुखमय ही दिखने लगेंगे… और जहां तक हम जायेंगे जितना देख पायेंगे उस सबमें आनंद ही आनंद दिखाई देगा!

कहीं कष्ट ना दिखेगा! ना हमें कोई पीड़ा होगी और ना अपनों को…

#औरक्याचाहिये?

लेखक: सत्यार्चन.SathyaArchan

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित-हेतु..... वास्तविक हिन्द हितचिंतक मंच!. प्रयास और परिवर्तन के प्रबल पक्षधर पराजित नहीं होते... हो भी नहीं सकते !!! - #सत्यार्चन #SathyArchan #Satyarchan

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