राममत-रामपथ!

सुबह_सुबह के समाचारों का हाल बेमिसाल!

रामभक्तों को राम जी ने दिखा दिया कमाल!

#बाड़मेर में मार-मार मुसलमान से जयश्रीराम बुलबाया…

राम जी ने रामभक्तों का पूरा पंडाल उड़ाया…

वहां 15-20 ने 1 को पीट पीट मार, शौर्य दिखाया…

बगल में रामजी ने 15-20 को शक्ति प्रहार कर मार गिराया!

रामभक्त, समझते क्यों नहीं?

रामपथ ऐसा वैसा नहीं!

हम-तुम… मैं!

हम-तुम… मैं!

आप और मैं
हम और तुम
जाने कब
हम-तुम
तुम-हम हो गये…
फिर मैं-तू, तू-मैं…
तू-तू-मैं-मैं के बाद
तुम-हम ना हो सके…
और ना हम-तुम!
फिर से
आप और हम हो गए…!
दुनियां गोल है
हम समझ गये…
चलते रहकर…
चलते चलते…
वहीं पहुंच कर
जहां से चले थे कभी
हम-तुम… तुम-हम!
-सत्यार्चन

जग जीत लो!

कलयुग के चरम उपरांत सतयुग के आगमन की संसूचना भी वर्णित है शास्त्रों में…!
आज असत, अनैतिक, अराजक (अधर्म) के स्थान पर सत, सन्मार्ग यानी धर्म का पथ चयन करने वाले दैनंदिन बढ़ते दिखते हैं! जिससे वर्तमान काल के कलयुग और सतयुग के संधिकाल होने की अवधारणा को बल मिलता है!
फिर संधिकाल हो या कलयुग का कोई भी चरण … मैं स्वयं को सन्मार्ग पर चलाये रखने की सफलता के असीमानंद से आनंदित हूं… और सभी अपनों से, सभी से, इस अलौकिक आनंद की प्राप्ति की दिशा में प्रयाण का अनुरोध करता हूं!
अधिकांश पौराणिक कथाओं में सत्य को भार लादे हुए दर्शाया गया है किन्तु कष्टमय नहीं… जैसे वायुमंडल का, परिवार के भरणपोषण का भार किसी को भी भार जैसा अनुभव नहीं होता… उस जैसा ही … बस स्वजन/ परिजन में सबको सम्मिलित करते जाना है … सब अपनों को … परायों को… समर्थकों को… विरोधियों को….. मित्रों को…. शत्रुता रखने वालों को…. सबको…. सारे संसार को…. स्वजन ही तो मानना है…. स्वजन के वृत को ही तो, विस्तार देना है ! स्वयं को सबकी तरह और सबको स्वयं की तरह देखने का अभ्यास करना है….! फिर स्वयं के शारीरिक कष्ट सहित, किसी का भी, किसी भी तरह का, कैसा भी व्यवहार, कम पीड़ादायक लगने लगेगा… फिर नगण्य … फिर शून्य… और पीड़ा ना होगी तो शेष सब आनंदमय ही तो होगा!
शुभकामनायें!
-सुबुद्ध सत्यार्चन

सुख चाहिए? ये लीजिए! -11 आम या खास…

सुख चाहिए? ये लीजिए! -11 आम या खास…

दुनियाॅं 2 तरह के लोगों से बनी है…
आम और खास!
पहली तरह के लोग “चल पड़ने वाली ट्रेन के बंद दरवाजे मिन्नतों, गालियों या लातों से खुलवाने और अंदर घुसते ही बंद कर फिर किसी के लिए ना खोलने का फरमान सुनाने वाले होते हैं!”
दूसरी तरह के लोग “वैसी ही ट्रेन के पहले से अंदर बैठे / खड़े वो लोग होते हैं जो बाहर छूट गये को अंदर आने देने की आवश्यकता समझते हैं और अंदर से दरवाजा खोलते-बंद करते रहते हैं!”

पहले वाले अमूमन, आजीवन अपने तरीकों से ही अंदर घुसते रह पाते हैं किन्तु दूसरी तरह के लोगों का प्रभामंडल (Oaura/ नूर) विकसित होने लगता है फिर दूर से ही नजर भी आने लगता है और तब उनको बाहर देखते ही ट्रेन के अंदर से लोग दरवाजे खोलने लगते हैं!

अब यह आप पर है कि प्रभामंडल विकसित होने पर विश्वास रख, विकसित होने तक अतिरिक्त कष्ट सहें या आजीवन मिन्नतों, गालियों, लातों से काम निकालते रहें! किसे चुनना है ये निर्णय तो आपको ही करना है…! आम रहना या खास बनना है!
-सुबुद्ध सत्यार्चन

बदला बदला चाँद — The REKHA SAHAY Corner!

कुछ दिनों पहले चाँद ने किया कुछ वायदा और बादलों में खो गया . आया इस हफ़्ते सामने बदला बदला सा रूप ले कर , नया नया सा चाँद . रोज़ रोज़ रूप बदलते किस चाँद से पूछूँ उसका पुराना वायदा ? लोग भी ऐसे ही बदलते हैं। समझना मुश्किल है , ऐसे बदलते लोगो […]

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ज़िंदगी — स्पंदन

ज़िंदगी एक दिन मिली थी राह में मैंने कहा , आ बातें करें तनहाई में बेवफ़ा है तू बड़ी हर बात में , चलती कहाँ है तू मेरे जज़्बात में !! छोड़ दिया था साथ मेरा , बीच राह में !! थक गया हूँ , मैं तेरी हर चाल में कैसे फँस गया हूँ , […]

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