मनयोग भगाये रोग! -1

मनोरोग जो भावनाओं के भंवर से जन्मते हैं… उनका भावनात्मक उपचार ही स्थाई निदान हो सकता है ना…

मनयोग भगाये रोग!-1

क्या आप जानते हैं कि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक युग में विकसित देशों में 10 में से 1 तथा हमारे देश में 10 में से केवल 2 व्यक्ति ही मानसिक स्वस्थ की श्रेणी में आते हैं….!
अर्थात 10 में से 8 भारतीय भी या तो मानसिक अस्वस्थ हैं / अवसाद ग्रस्त हैं या अवसाद ग्रस्त होने के बहुत निकट हैं…. दुर्भाग्य से हमारे देश में मानसिक रोगी को आवश्यक मानसिक उपचार का अभाव है… चिकित्सक काउंसिलिंग में समय खर्चने के स्थान पर सीधे दवायें लिखकर मष्तिष्क में रासायनिक परिवर्तन करा केवल एक प्रकार की अस्वस्थता को दूसरी और दूसरी को तीसरी अस्वस्थता में बदलने से अधिक कुछ और नहीं करते देखे जाते…! जिससे चिकित्सकों को मरीज की खर्चते रहने की क्षमता तथा धैर्य की सीमा तक के लिए एक निरंतर व स्थाई ग्राहक तो मिल जाता है किन्तु मरीज को स्वास्थ्य नहीं…! तब लम्बे उबाऊ उपचार से हताश निराश मरीज व उसके अवसाद ग्रस्त होते परिजन पूजा-पाठ, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, मंदिर, दरबार, दरगाह के चक्कर में पड़ने लगते हैं…. मजेदार तथ्य यह है कि इन विभिन्न दरबारों में किसी ना किसी / किसी किसी दरबार से अधिकांश मरीजों को थोड़े-बहुत दिनों के लिए चिकित्सकों की अपेक्षा अधिक आराम मिल जाता है…. *किन्तु यह आराम भी एक तरह का भ्रम ही होता है यह वास्तविक उपचार नहीं होता…!फिर तो सोचने वाली बात है ना…. कि मरीज और उसके परिजनों को ऐसा अल्पकालिक आराम क्यों और कैसे अनुभव होता है?
क्या ऐसा आराम का भ्रम वास्तविक व स्थाई आराम पाकर मानसिक स्वास्थ्य नहीं पाया जा सकता?
इन प्रश्नों का उत्तर जितना सरल और सहज है उतना ही इन बीमारियों से मुक्ति का मार्ग भी…
और उत्तर सकारात्मक भी हैं-
मानसिक रोगों का प्रारंभ अवसाद है… अवसाद का आधार मूलतःअसहज, अव्यवस्थित जीवनचर्या के कारण उपजता मानसिक असंतोष होता है… जिससे मरीज अपने आप से या/ और अपनों से विभिन्न प्रकार की असंतुष्टि, असामंजस्य, अविश्वास, अव्यवहार, असहजता, असहायता का अनुभव करने लगता है…. येही इस बीमारी के मूल हैं…

जब स्वास्थ्य पुनर्स्थापना में लम्बे इलाज के बाद भी चिकित्सकों से निराशा ही मिलती तो बड़े बड़े नाश्तिक भी पूजा-पाठ, दरबारों की शरण लेकर आस्तिकता को आजमाने तैयार हो जाते हैं…! वहां दरबार/पूजास्थल में पहुंच कर दूसरों के ठीक होने के भ्रम को ही ठीक होना मानकर उन्हें उनका आजमाने का निर्णय बुद्धिमता पूर्ण लगने लगता है और पहली बार दरबार (पूजा-स्थल) में पहुंचे व्यक्ति की उस दरबार में आस्था दृढ़ हो जाती है…! यह दृढ़ विश्वास आधारित गहरी आस्था ही, आशा को पुनर्जीवित करने वाले चमत्कारी प्रभाव को उत्पन्न करती है जिससे विश्वास की पतली‌ सी परत के नीचे अविश्वास दब जाता है…! स्वयं में या अपनों में अविश्वास के ऊपर चढ़ती विश्वास की यह परत, नगण्य संख्या तक व्यक्तियों में ही इतनी दृढ़ हो पाती है कि वह नीचे दबे अविश्वास को आजीवन फिर से ऊपर ना आने दे…! इस दरबार थ्योरी से एक बात तो सुनिश्चित है कि मनोरोग जो भावनाओं के भंवर से जन्मते हैं… उनका भावनात्मक उपचार ही स्थाई निदान हो सकता है…

मैं एक ऐसे ही स्वास्थ्य संरक्षण केंद्र (रिहेबिलिटेशन सेंटर) से आपका परिचय कराने जा रहा हूं *जहां की सुविधाएं, प्रारंभिक स्तर के मनोरोगी को पूर्व प्रस्तावित दवाओं से शीघ्रतम मुक्ति व स्थाई उपचार का मार्ग प्रशस्त करा सकती हैं…!

जहां की सेवाएं किसी को मनोरोगों से आजीवन बचाये रखने योग्य बना सकती हैं…!
यह केन्द्र भी विश्वास आधारित है किन्तु किसी दरबार, पूजा-स्थल, पीर या देवी-देवता के स्थान पर स्वयं में ही उसके विश्वास जगाने के रूप में.…!
उपरोक्त अन्य उपचार विधियों, सहजयोग, विपश्यना, रेकी आदि से भी हम लगभग पूरी तरह सहमत हैं किन्तु सहजयोग से भी सरल, सुगम, साधारण व घर बैठे, चलते फिरते कार्यरत रहते हुए भी, अनिद्रा, मोटापे सहित हर प्रकार के स्वास्थ्य लाभ को शीघ्रतम पाने का कोई मार्ग है तो वह है मनयोग!

(शेष मनयोग भगाये रोग! के भाग -2 में…)

सब्सक्राइब कीजिए! जीवनोपयोगी स्वास्थकर आलेख नियमित पढ़ते रहिए… और स्वस्थ रहिये!!!

कुर्बानी- नेकी के लिए!

अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…! जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें!

सभी मजहबों/ धर्मों की किताबों में लिखे वाकये (घटनाएं) वो नजी़रें हैं जिनको वक्ती हालात के हिसाब से आज, और आज से 1000 साल बाद भी, अमल में लाया जाना मुनासिब है और रहेगा …

इस्लामिक आस्था से जुड़ी, “कुर्बानी” भी एक ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है!

इस्लाम में कुर्बानी की शुरुआत का जिक्र, सर्वोपरि “हुजूर” के दरबार में उनके नबियों (फालोअर्स) के बीच सबसे काबिल होने / “हुज़ूर” के सबसे अजीज ओ करीब होने के दावे पर बहस चल रही थी! उन काबिलियत का दम भरने वालों की मौजूदगी में ही “हुजूर” ने एक उचित को चुनकर उनकी वफादारी साबित करने उन्हें एक इम्तेहान से गुजरने का मौका दिया! जिसके लिए उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने का हुक्म दिया गया…. बाकी नबियों ने गर्दनें झुका लीं मगर वे नबी पिता अपने बेटे की कुर्बानी देने, और उनके बेटे कुर्बान होने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गये!
हुजूर के दरबार में घटी इस घटना के दृश्य में पिता की आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की तलवार से कुर्बानी दी जाना और कुर्बानी के बाद पट्टी खुलने पर बेटे की जगह गर्दन कटे हुए बकरे का देखा जाना, बताया गया है!

इस बेहतरीन वाकये में एक से अधिक सीखें समाहित हैं…

1- तुम्हारे खैरख्वाहों /सरपरस्तों को जानो! उनके हुक्मों की, बिना किसी शक-ओ-शुबहा के बस तामील करो…! “
“जिनमें खैरख्वाही दिखती हो उनमें शुबहे कैसे देखे जा सकते हैं?”

2- अगर तुम सच्चे हो, ईमान पर हो और कभी भी, कहीं भी तुम्हें तुम्हारी सच्चाई का इम्तेहान देने कहा जाये, तो बड़े से बड़े इम्तिहान से गुजरकर दिखा दो कि तुम सच्चे हो!

3- नेकी की राह पर चलकर ही कबूल होने लायक इबादत की जा सकती है… नेकी की राह बेहिसाब कुर्बानियां चाहती है… इसीलिए नेकी के लिए कोई भी कुर्बानी छोटी है…!

रमजान में ईद-उल-फितर पर खूब जलसे किये फिर कुर्बानी मांगने वाली “ईद-उल-जुहा” आ रही है ! तो क्या हुजूर की नजरों में खुद को साबित नहीं करशा चाहोगे? क्यों! अब से हर “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम, नेकी के लिए, अपने आपकी कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! आज के हालातों में रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी से अच्छी और बड़ी कुर्बानी और क्या होगी? दीजिए…! रक्त बहाने के लिए नहीं… सहेजने के लिए हो…. आपकी कुर्बानी…. किसी की जान लेने नहीं ज़िन्दगी देने के लिए हो आपकी कुर्बानी…!

जरूरी होने पर जब औरों से आंखें, लीवर, किडनी, ब्लड, बांह, मांस, होंठ आदि लिए जाने में मज़हब आड़े नहीं आता है…. तो इत्मीनान रखिये… इनके दिये जाने में भी मज़हबी बंदिशें नहीं हो सकतीं!

चाहें तो अपने हाफ़िज़/ मौलवी/ मौलाना साहिबों से मशविरा करें… और अगर जायज़ पायें तो आगे बढ़ जायें… दीन के काम आकर मुस्लिम समुदाय को इज्जत बख्शने की वजह बन जायें!

जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी

इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें! इस्लाम का रुतबा ऊंचा बनाए रखने, ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम, अपनी जाती कुर्बानी देकर सच्चा मुसलमां होकर दिखायें!

सबसे अच्छी वो कुर्बानी, जो दे किसी को जिंदगानी!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

रावण, राम और रामभक्त!

*”#जय_श्रीराम!” के होते हुए, वर्तमान उद्घोषों को सुनकर ऐसा लगता है कि रामभक्त अन्यायी-अभिमानी-असत रावण के आदर्शों पर चल पड़े हैं!*
*आज के तथाकथित रामभक्त रावण की स्वर्ण-लंका सा आज के ‘स्वर्णिम-भारत’ को बनाने की जल्दी में… परम #पुरुषोत्कृष्ट_श्रीराम के स्थान पर रावण का अनुसरण करते अधिक देखे जा रहे हैं!*
*सत्यासत्य संग्राम चरम पर है!*
“*#सतयुगकेद्वार# खड़ी दुनियाँ आज असत के अतिरेक से आर्तनाद कर रही है!*”
-सुबुद्ध सत्यार्चन

TRUER TIMES

नीचे दिये लिंक्स
मेरे चैनल “TRUER TIMES” के हैं जिसमें सभी धर्मों का आधार मानवीय संवेदना यानी मानवता और मानव समाज की संरचना पर आधारित होना दर्शाया है! क्रम से देखिए…  शायद आपके काम का भी कुछ मिल जाये…
1 https://youtu.be/9GHGH9GkWbk
2 https://youtu.be/Fd6S_NoP0pA
3 https://youtu.be/wyU2_M0FapE
4 https://youtu.be/T1P12Q1HceM
5 https://youtu.be/AmGB76HchMw
6 https://youtu.be/4qREYfVitxo

ज़िन्दगी LIVE

नीचे दिये लिंक्स
मेरे चैनल TRUER TIMES पर “ज़िन्दगीLIVE” श्रृंखला का परिचय से निरंतर जारी श्रृंखला के हैं… “जिंदगीLIVE” में जिंदगी की जद्दोजहद में जीतने के टिप्स साधारण सरल शब्दों में हैं…! क्रम से देखिए… शायद आपके काम का भी कुछ मिल जाये…

1 https://youtu.be/iIES21JwZLg
2 https://youtu.be/Qb0zIUBftwU
3 https://youtu.be/sgGdg-6GdZU
4 https://youtu.be/pyciS5Es8hs
5 https://youtu.be/xlaS9JA6ieE
6 https://youtu.be/T9oHH8_ol0A
7 https://youtu.be/FWW7p1HWb0o
8 https://youtu.be/9fBa1F9AcbY
9 https://youtu.be/SggmyGm4O2M

आगाज-ए-महफिल 

आगाज-ए-महफिल

ना हम आते ना बुलाये जाते तो बहुत अच्छा था•••
अब आ ही गये हैं तो आप भी आ जाते तो अच्छा था •••

शब्द यूँ ही नहीं उछलकूद करते कभी किसी के•••
चंद इल्जाम और जरा आ जाते, तो अच्छा था!

रहे बेआवाज दिल का साज, क्यूँ कब तक?
आकर छेड़ जाते सूने तार••• तो बहुत अच्छा था•••

हुक्म आगाजे महफिल का मेरी खुशनसीबी मगर
ना जलाते दीप हम ही जल जाते तो अच्छा था!

बुलाये गये तो चले आये हैं••• हम यूँ ही उठकर,
अब आप भी आ जाते जनाब तो बहुत अच्छा था!

-सत्यार्चन

खुशी? यहां छुपी है!

खुशी? यहां छुपी है!

सबके लिए रामबाण औषधि है
उपरोक्त संदेश!

….. विज्ञान के सिद्धांत से उल्टा होता है मनोविज्ञान, धर्म, अध्यात्मिक सिद्धांत है जिसमें “सकारात्मक ही सकारात्मक को खींचता है…!” और “नकारात्मक नकारात्मक को!”
यही उपरोक्त संदेश में संक्षेप में था ! हमारी सोच ही हमारा परिवेश नकारात्मक बनाती है किन्तु हमारी ही सोच हमारे परिवेश को सकारात्मक बनाने में भी पूर्ण सक्षम है!

कैसे ? आइये देखते हैं!

सामान्यतः हम सब दुःख, दर्द, तकलीफ़ोंं की ही शिकायत लिए बैठे रहते हैं…! अपनी खूबियों और औरों की खामियों को देख-देख दर्द की अनुभूति से तड़पते-छटपटाते जीवन को, कांटों की सेज सा समझ इस मृत्युलोक को ही नर्क-लोक मान नारकीय जीवन जीते रहते हैं! सामान्यतः लोग मानते हैं कि दिन-प्रतिदिन घटित होता हुआ सबकुछ जो होना चाहिए उससे उल्टा ही होता है… मनचाहे के विपरीत ही होता है…! जाने भाग्य हमसे ही क्यों रूठा है…! हर दिन हर घड़ी उल्टा ही क्यों होता रहता है! जबकि हर दिन, हर घंटे कुछ ना कुछ अच्छा भी अवश्य होता रहता है… मगर 99% ध्यान उस 10-20% ना हो सके अच्छे पर ही रहता है…!

जब कोई स्त्री-पुरुष प्रेममय होते हैं तो अधिकांश समय उनके मन में वही प्रियतम / प्रियतमा रहता है.! जहां भी देखते हैं वहीं दिखाई देता / देती है/ जिन प्रेमी प्रेमिका के मन की लगन, चाह, जितनी गहरी, सच्ची होती है वे उतना ही सफल दाम्पत्य जी रहे होते हैं! किन्तु केवल वे जो अपने सहचर की खामियों को अनदेखा कर उसकी जिन खूबियों पर मर मिटे थे उनको महत्व देते रह पाते हैं….! कहते हैं ना जहां चाह वहां राह! अन्यथा एक दूसरे की खामियों को तूल देने वालोें से तो दुनियां भरी पड़ी है…!

मनोवैज्ञानिक के सिद्धांत अनुसार जो जितने गहन चिंतन में रहता है… वह उतना ही सहजता से उतने ही शीघ्र साकार होता है! अध्यात्म में भी उस ‘सर्वोपरि’ का यही विधान माना जाता है! प्रियतम की तरह मनोमष्तिष्क में जो 99% जगह घेरे रहता है वह आपका प्रियकर नहीं तो क्या समझा जायेगा?

समाज में 99% चर्चा दूसरों की कमियों पर होती है जबकि जिनकी आलोचना हो रही है उनमें भी कुछ तो खूबियां होती हैं…!

हम में और हर एक में खामियां होती हैं तो खूबियां भी होती ही हैं…! हममें से अनेक स्वयं अपनी और अपनों की तक की खूबियों को पहचानते ही नहीं…! वो अपनी, अपनों की, दूसरों की खूबियों से अनजान सबकी केवल खामियों की ही बात/ आलोचना कर रहे होते हैं! वे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को नकारात्मक (अधोन्मुखी) बनाने के साथ साथ कहीं ना कहीं अपनों के, अपने घर, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश, दुनियां की ऊर्जा को भी नकारात्मक ही बना रहे होते हैं….! नकारात्मकता से सजे भोज को ग्रहण करने सकारात्मकता कैसे आ सकती है!

जबकि; कमियों-खामियों के चिंतन में डूबे दुःखी जन, जरा से प्रयास से ही इसका ठीक उलट भी आराम से कर सकते है…!

हमारी, हमारों की और हर एक की मनभावन खूबियों पर ध्यान और खामियों को अनदेखा कर खूबियों की ही चर्चा शुरू तो की जाये….! जीवन से जो नहीं मिला या नहीं मिल रहा को अनदेखा कर जो मिला और जो मिल रहा है पर ही ध्यान देना शुरू कर, उसी की चर्चा की जाये! अप्राप्त के शोक की जगह प्राप्त के सुख का आनंद उठाना क्यों ना किया जाये! शुरू तो कीजिए, जरा से प्रयास से अभ्यास बन जायेगा फिर दिनचर्या…. फिर सकारात्मक सोच से सकारात्मक व्यक्तित्व, ओजोमय औरा, खुशहाल घर, अपने, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश और सारी दुनियां सकारात्मक और सुखमय ही दिखने लगेंगे… और जहां तक हम जायेंगे जि

हैं तो खूबियां भी होती ही हैं…! हममें से अनेक स्वयं अपनी और अपनों की तक की खूबियों को पहचानते ही नहीं…! वो अपनी, अपनों की, दूसरों की खूबियों से अनजान सबकी केवल खामियों की ही बात/ आलोचना कर रहे होते हैं! वे अपने स्वयं के व्यक्तित्व को नकारात्मक (अधोन्मुखी) बनाने के साथ साथ कहीं ना कहीं अपनों के, अपने घर, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश, दुनियां की ऊर्जा को भी नकारात्मक ही बना रहे होते हैं….! नकारात्मकता से सजे भोज को ग्रहण करने सकारात्मकता कैसे आ सकती है!

जबकि; कमियों-खामियों के चिंतन में डूबे दुःखी जन, जरा से प्रयास से ही इसका ठीक उलट भी आराम से कर सकते है…!

हमारी, हमारों की और हर एक की मनभावन खूबियों पर ध्यान और खामियों को अनदेखा कर खूबियों की ही चर्चा शुरू तो की जाये….! जीवन से जो नहीं मिला या नहीं मिल रहा को अनदेखा कर जो मिला और जो मिल रहा है पर ही ध्यान देना शुरू कर, उसी की चर्चा की जाये! अप्राप्त के शोक की जगह प्राप्त के सुख का आनंद उठाना क्यों ना किया जाये! शुरू तो कीजिए, जरा से प्रयास से अभ्यास बन जायेगा फिर दिनचर्या…. फिर सकारात्मक सोच से सकारात्मक व्यक्तित्व, ओजोमय औरा, खुशहाल घर, अपने, आसपास, अड़ौस-पड़ौस, मोहल्ला, शहर, देश और सारी दुनियां सकारात्मक और सुखमय ही दिखने लगेंगे… और जहां तक हम जायेंगे जितना देख पायेंगे उस सबमें आनंद ही आनंद दिखाई देगा!

कहीं कष्ट ना दिखेगा! ना हमें कोई पीड़ा होगी और ना अपनों को…

#औरक्याचाहिये?