लाइफस्टाइल सुधारें !स्वस्थ रहें!!

बंदर कभी बीमार नहीं होता

क्यों नहीं होता बीमार ?

शोधकर्ताओं ने विभिन्न बीमारियों के जीवाणु बंदर के शरीर में डालकर देखें लेकिन बंदर फिर भी ठीक!

शोधकर्ताओं में से एक का मानना है कि बंदर भी चिड़ियों की तरह ही सुबह सुबह, सोकर उठते से खाना खाना शुरू कर देता है यह बड़ा कारण है उसके स्वास्थ्य का !

किन्तु मुझे लगता है कि

शोधकर्ताओं ने 2-3 तथ्यों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया…
जैसे – बंदर, खरगोश और चिड़ियां आदि जीव-जंतु जन्म से मृत्यु तक रोज सोकर उठने से  लेकर रात को फिर सोने तक पूरी तरह प्राकृतिक जीवन जीते हैं… प्रकृति के अनुरूप वे स्वयं को ढाल लेते हैं जबकि हम मानव; प्रकृति को अपने अनुरूप बनाने का मूर्खता करते आए हैं…!

बंदर आजीवन सजग व सक्रिय रहते हैं… बंदर, मछलियां और चिड़ियां सर्वाधिक सक्रिय रहने के कारण बाहरी /मानवीय हस्तक्षेप या बड़े जीवों का भोजन ना बनें तो, अकाल मृत्यु और बीमारी से सुरक्षित रहते हैं… बंदर सर्वाधिक मानव समान, सर्वाधिक प्राकृतिक आहार बिहार के साथ साथ सर्वाधिक सक्रिय रहने वाला बंदर सबसे अधिक प्रतिरोधक क्षमता से युक्त है..! क्यों है?

उसी तरह के इंसान जो प्रकृति के सर्वाधिक अनुरूप जीते हैं यथा सूर्योदय से पहले उठने वाले, सूर्यास्त के थोड़े ही बाद सोने वाले, क्या क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए पर ना विचारने वाले मजदूर (शारीरिक सक्रियता से युक्त इंसानों) को देखिए वे और उनके परिजन ही सर्वाधिक स्वस्थ भी पाये जाते हैं…. !
इसीलिए बिना दवाओं या बिना परहेज के स्वस्थ और सबल रहना है तो अपनी लाइफ स्टाइल प्रकृति के अनुरूप बनाने की दिशा में आज ही बढ़ना शुरू कीजिए! आहार में अधिक से अधिक चीजें प्राकृतिक स्वरूप में लेना शुरू कीजिए… हर मौसम की हर प्रकार की सलाद, सब्जियां और फल खाने की कोशिश कीजिए!
स्वस्थ रहिए !
मस्त रहिए!!

टीज़र-टीचर-शिक्षक!

* मेरे माता-पिता और शासकीय प्राथमिक शाला जमुनियां, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में पदस्थ ‘प्राइमरी टीचर्स’ परम-आदरणीय माननीय श्री रामेश्वर सोनी जी, और माननीय श्री राम नारायण शर्मा जी जैसे ‘साधारण से लोगों ने’ बड़ी मेहनत और मुश्किल से, मुझे डांट-मार-कूट कर सिखाया था…! तब कहीं आज मैं सुबुद्ध कहलाया!*

मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से नहीं हूं
जिन्हें समझदारी के खिताब मिलते रहते हों..


मैं तो निपट अज्ञानी पैदा हुआ था…
मुझे तो खुद मां ने सिखाया कि वो मेरी मां हैं और ये मेरे पिता हैं… नहीं तो मैं तो पहचान भी नहीं पाया था…. मुझे पढ़ना-लिखना, दौड़ना-कूदना तो छोड़िए बोलना और चलना तक नहीं आता था…! मां-पिता, भाई-बहिनों ने बड़ी मुश्किल से सिखाया….!

*पढ़ना-लिखना, जोड़ना-घटाना मेरे माता-पिता और शासकीय प्राथमिक शाला जमुनियां, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में पदस्थ ‘प्राइमरी टीचर्स’ परम-आदरणीय माननीय श्री रामेश्वर सोनी जी, और माननीय श्री राम नारायण शर्मा जी जैसे ‘साधारण से लोगों ने’ बड़ी मेहनत और मुश्किल से, मुझे डांट-मार-कूट कर सिखाया था…! तब कहीं आज मैं सुबुद्ध कहलाया!*


इतना बड़ा गधा था मैं…!
फिर जैसे जैसे बड़ा होता गया कुटता-पिटता, हंसता-खेलता सीखते गया! कालेज से निकलते-निकलते सारी पढ़ाई लिखाई ही बेकार लगने लगी… इसी बीच नौकरी मिल गई… अफसर भी हो गये…. मगर सबसे उपयोगी और जरूरी व्यवहारिक ज्ञान में स्नातक हो पाना तो बहुत ही अधिक कठिन था… यह व्यवहार विज्ञान इतना कठिन था कि मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान, व्यवहार प्रबंधन, प्रभावोत्पादकता पर दुनियां भर के जाने-माने लेखकों की कई कई किताबें पढ़ डालने पर भी माता-पिता और प्राइमरी टीचर्स के सिखाये उचित-अनुचित को जानने की जिज्ञासा, पहचान करने, स्वीकारने और अपनाने की मिली शिक्षा के आगे सब छोटा लगा…! उचित व्यवहार सीखने  की चाह है तो सीखना जारी है अभी भी…!  जिससे भी जब भी जहां भी मिलता हूं, बतियाता हूं उसमें अच्छा क्या-क्या  है…  खोजता हूं… और वो जो मुझमें नहीं उसमें से उठा लेता हूं … मांग लेता हूं … कभी कभी चुरा भी लेता…  दूसराें में बुराई खोजने में समय नष्ट नहीं करता…  वो तो मुझमें ही ढेर हैं..!
बस इसी तरह धीरे-धीरे सीखते जा रहा हूं …. क्योंकि मैंने बताया ना कि मैं निरा अज्ञानी जन्मा था .. अब प्रत्येक सुबह जागकर नये जन्म सा अनुभव होता है… जिसमें सबकुछ पिछले की अपेक्षा और बेहतर करने, जानने-सीखने,  की जरूरत मेहसूस होती है…
बताया ना कि मैं उन भाग्यवानों में से नहीं हूं जिन्हें सबकुछ आता है.. वो जो समझदार ही जन्मते हैं..  कुछ तो इतने बड़े ज्ञानी भी अवतरित होते हैं इस धरती पर कि वे जिस विषय में जितना जानते हैं…. उस विषय में सारी दुनियां में, उनसे अधिक जानने समझने वाला ना तो कभी हुआ है, ना आज है और ना ही आगे कभी हो पायेगा!


इन महाज्ञानियों के ऐसे अद्भुत ज्ञान के बड़े चर्चे होते हैं.. और ऐसे चर्चे करने वाले भी वे खुद ही होते हैं … !  ऐसे  ज्ञानवान का गुणगान भला अज्ञानी आमजन कर भी कैसे सकता है…!
हां तो मैं बता रहा था कि मैं सीखा हूं आप सब से, सीख रहा हूं आपसे और सदा सीखता रहूंगा क्योंकि मुझे मेरे मूर्धन्य गुरुजनों से सीखने की सीख शुरु में ही मिल गई थी…!  आज उन योग्यतम शिक्षकों को, आप सबको सादर नमन जिनसे मुझे कुछ ना सीखने मिला है… और मिल रहा है!
-सत्यार्चन सुबुद्ध

सुहाग चिह्न, पूजा,व्रत कितने व्यर्थ ?

सुहाग चिह्न, पूजा,व्रत कितने व्यर्थ ?

क्या आज के युग में भी सुहाग जैसा विषय विचारणीय है या होना चाहिए?

पढ़िए इसी विषय पर किरण सिंह जी की मनोरम व उत्कृष्ट कहानी में… लिंक –

https://kiransingh.blog/2019/08/29/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/

आपने कितना किया विषपान?

आपने कितना किया विषपान?

अपनी अपनी नज़र है और अपना अपना नजरिया…
मुझे तो बिषपान के नाम से, सौम्य शांत किंतु क्लांत …. भोले भाले त्रिनेत्र शिव-शंभु… ही दिखते हैं…!
विषपान करने वाले बाबा शिव शंभू ने समुद्र मंथन में भयंकरतम, महाविष/ हलाहल से भरे घड़े को पूरा का पूरा कंठस्थ कर लिया था और शेष देव-दानवों को महाविष के प्रभाव से बचा लिया था… !

क्या ऐसा चमत्कार कहीं और भी दिखता है…?
मुझे लगता है कि हर कहीं दिखता है हलाहल को अपने कंठ से बाहर ना आने देने वाले अनेक अनीलकंठ रहते हैं हमारे आसपास, हमारे साथ, हमारे बीच, हममें से ही बहुतेरे इसी तरह के बिषपायी हैं…

महर्षि बाल्मीकि को भी इसी प्रकार के समुद्र मंथन के से समय ज्ञान प्राप्त हुआ था। जब, आगत हलाहल में भागीदारी करने से परिजनों ने भी मना कर दिया था… किसी भी साझीदार के ना मिलने पर प्राप्त ज्ञान ने बाल्मीकि जी को महर्षि बनने का कारण उपलब्ध कराया था….!

क्या सम्पूर्ण जीवन चलने वाला संघर्ष समुद्र मंथन सा नहीं… और जीवन के संघर्ष में प्राप्त शुभाशुभ / अमृत बिष, रत्न, कामधेनु, आभूषण, शस्त्रास्त आदि ठीक समुद्र मंथन के उत्पाद सदृश नहीं होता ?

समुद्र मंथन के समय विवेकातिरेक (चालाकी) से बासुकी की फुंफकारों का सामना करने तो देवों ने दानव दल को मना लिया किन्तु नियति ने न्याय कर पुनः देवों की ओर ही महाविष पहुंचाया..! साथ ही.. रत्न निकले तो लालच भी… सबसे मूल्यवान अमृत ने तो समझौते का अंत ही कर दिया … अमृत छीनने, धैर्य त्याग द्वंदोत्यत तक हो गये थे दोनों ही दल…
ऐसा ही तो है जीवन संग्राम जहां हर मुखिया चाहे वह स्त्री हो या पुरुष…. समुद्र मंथन से निकलते रत्नों, व्यंजनों आभूषणों को सहर्ष सबको बांटता रहता है किन्तु जब-जब बिषकुम्भ निकलता है उसे अकेले ही कंठस्थ करना होता है…!
कहीं ना कहीं संसार के हर बड़े-बुजुर्ग को, कभी ना कभी शिव-शंभु भोले बाबा के आदर्श, ‘महाबिष पात्र’ को अकेले कंठस्थ करने पचाने का पालन करना ही होता है…!
आपने कितना किया विषपान ?
-सत्यार्चन सुबुद्ध

काश्मीर पर विवाद? कैसा विवाद!

काश्मीर पर विवाद? कैसा विवाद!
कश्मीर ना विवाद का विषय था ना है….
1947-48 तक
काश्मीरी राजा की उच्चाकांक्षा /अनिर्णय की स्थिति कारण काश्मीर का विलय भारत या पाकिस्तान में से किसी में भी होने से रोके रखा… भारत बातचीत के रास्ते काश्मीर को अपने साथ लाना चाहता था कि उग्रवादी पाकिस्तानी सोच के पहले दुष्परिणाम के रुप में, काश्मीर पर कबाइली आक्रमण हुआ … तब विवश होकर काश्मीर ने भारत के साथ होना स्वीकार किया….! अलग पहचान और अलग निशान की मांग के साथ…! दोनों मांगें अस्थाई रूप से, लिखित बताकर मान ली गईं…!

तब के और आज के वैश्विक परिदृश्य में बड़ा परिवर्तन आ चुका है अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, आस्ट्रेलिया सहित विश्व के लगभग सभी देशों में किसी भी देश के टेलेंट और निवेशकों को बसाने की होड़ मची है तब अगर कश्मीर में शेष विश्व आना भी चाहे और वहां के लिए बनाया गये अस्थाई, ‘भारतीय’ विधान से रास्ता रोक लिया जाये तो भारत काश्मीरियों का हितैषी तो नहीं कहला सकता था …

अतः आज की पारिस्थितिकी के अनुरूप अस्थाई व्यवस्था समाप्त कर काश्मीर को वैश्विक बनाया गया तो इसमें काश्मीर का ही हित है… जहां तक बाहरी लोगों के आने से काश्मीरियों के टूरिज्म व्यवसाय पर प्रतिकूल असर का प्रश्न है वह उस नुकसान से बहुत कम है जितना पाकिस्तानी दुष्प्रचार के बहकावे आकर काश्मीरी अभी तक अपने आपको मटियामेट कर चुके हैं…!

जहां तक पाकिस्तानी दखल का प्रश्न है तो पाकिस्तान को 1947 से अब तक के काश्मीर में दखल के अधिकार का आधार ही क्या है?

1947 पूर्व के काश्मीरी राजा ने मुसीबत के समय स्वत: पाकिस्तान की जगह भारत में विलीन होना चुना था…

तब तक अंतरराष्ट्रीय समझौतों के आधार जनमत संग्रह तो नहीं थे…. पाकिस्तान ‘वर्षों के दुष्प्रचार के बाद’ जनमत संग्रह की मांग उठाते आया है…. अब पाकिस्तानी दुष्प्रचार पर लगाम लगा दी गई है … तो शायद अब 10 साल से अधिक नहीं लगने वाले आम काश्मीरियों को भारत पाक को तौलने की समझ आने में फिर भारत स्वयं जनमत संग्रह कराकर वैश्विक पटल पर रखने की स्थिति में होगा… !

तब तक खिसियानी बिल्लियां चाहें तो खम्भे नोंचते हूए अपने पंजे लहूलुहान करती रहें या शांति से अपने विकास पथ पर बढ़ती जायें!

हर भारतीय की तरह काश्मीरियों को दुर्दशा से उबारने वाले इस कदम से मैं भी अत्यंत हर्षित हूं!
-सत्यार्चन सुबुद्ध

डिजिटल इंडिया के पथ गढ़ता…

आज के डिजिटल इंडिया, यूआईडी (आधार कार्ड), बिचौलिए हटाकर सीधे हितग्राही तक सब्सिडी पहुंचाने (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर), स्वनियंत्रित स्वतंत्र चुनाव आयोग, दल-बदल निरोधक व्यवस्था, राष्ट्रीय संस्कारों की रीढ़, शिक्षा प्रणाली, में
आजादी से अब तक हुए एक मात्र परिवर्तन जिससे राष्ट्रीय एकरूप व स्तरीय शिक्षा संभव हुई… इन स्वप्नों के सर्वप्रथम पोषक, प्रस्तोता व आधार शिला स्थापक, स्वर्गीय राजीव जी ही थे… बस तब नाम कंप्यूटरीकरण (जिसके विरोध में समूचा तत्कालीन विपक्ष था), विशिष्ट पहचान संख्या / आधार कार्ड/ नन्दन नीलकणि प्रोजेक्ट (जिसका प्रबल विरोधी भी तत्कालीन विपक्ष 2014 तक रहा).

तब देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाना है, (जाने योग्य बनाना) जैसे जुमले चलते थे … आज 2014 में जिस डिजिटल इंडिया, डीबीटी, की बात चल रही है उस पर राजीव जी 1985 में काम करना शुरू कर चुके थे…. वे बने रहते तो 2004 तक हम आज से भी 25 बर्ष आगे निकल चुके होते ….!

देश का दुर्भाग्य अब फिर सौभाग्य में बदला है… आज वैसी ही प्रगतिवादी सोच रखने वाले प्रधानमंत्री, माननीय नरेन्द्र मोदी जी, पद पर सुशोभित हैं शायद 2024 तक भारत सभी वांछित लक्ष्य प्राप्त कर ले…! शुभाकामनाएं!!!
-‘SathyaArchan’

मनयोग भगाये रोग! -1

मनोरोग जो भावनाओं के भंवर से जन्मते हैं… उनका भावनात्मक उपचार ही स्थाई निदान हो सकता है ना…

मनयोग भगाये रोग!-1

क्या आप जानते हैं कि वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक युग में विकसित देशों में 10 में से 1 तथा हमारे देश में 10 में से केवल 2 व्यक्ति ही मानसिक स्वस्थ की श्रेणी में आते हैं….!
अर्थात 10 में से 8 भारतीय भी या तो मानसिक अस्वस्थ हैं / अवसाद ग्रस्त हैं या अवसाद ग्रस्त होने के बहुत निकट हैं…. दुर्भाग्य से हमारे देश में मानसिक रोगी को आवश्यक मानसिक उपचार का अभाव है… चिकित्सक काउंसिलिंग में समय खर्चने के स्थान पर सीधे दवायें लिखकर मष्तिष्क में रासायनिक परिवर्तन करा केवल एक प्रकार की अस्वस्थता को दूसरी और दूसरी को तीसरी अस्वस्थता में बदलने से अधिक कुछ और नहीं करते देखे जाते…! जिससे चिकित्सकों को मरीज की खर्चते रहने की क्षमता तथा धैर्य की सीमा तक के लिए एक निरंतर व स्थाई ग्राहक तो मिल जाता है किन्तु मरीज को स्वास्थ्य नहीं…! तब लम्बे उबाऊ उपचार से हताश निराश मरीज व उसके अवसाद ग्रस्त होते परिजन पूजा-पाठ, झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, मंदिर, दरबार, दरगाह के चक्कर में पड़ने लगते हैं…. मजेदार तथ्य यह है कि इन विभिन्न दरबारों में किसी ना किसी / किसी किसी दरबार से अधिकांश मरीजों को थोड़े-बहुत दिनों के लिए चिकित्सकों की अपेक्षा अधिक आराम मिल जाता है…. *किन्तु यह आराम भी एक तरह का भ्रम ही होता है यह वास्तविक उपचार नहीं होता…!फिर तो सोचने वाली बात है ना…. कि मरीज और उसके परिजनों को ऐसा अल्पकालिक आराम क्यों और कैसे अनुभव होता है?
क्या ऐसा आराम का भ्रम वास्तविक व स्थाई आराम पाकर मानसिक स्वास्थ्य नहीं पाया जा सकता?
इन प्रश्नों का उत्तर जितना सरल और सहज है उतना ही इन बीमारियों से मुक्ति का मार्ग भी…
और उत्तर सकारात्मक भी हैं-
मानसिक रोगों का प्रारंभ अवसाद है… अवसाद का आधार मूलतःअसहज, अव्यवस्थित जीवनचर्या के कारण उपजता मानसिक असंतोष होता है… जिससे मरीज अपने आप से या/ और अपनों से विभिन्न प्रकार की असंतुष्टि, असामंजस्य, अविश्वास, अव्यवहार, असहजता, असहायता का अनुभव करने लगता है…. येही इस बीमारी के मूल हैं…

जब स्वास्थ्य पुनर्स्थापना में लम्बे इलाज के बाद भी चिकित्सकों से निराशा ही मिलती तो बड़े बड़े नाश्तिक भी पूजा-पाठ, दरबारों की शरण लेकर आस्तिकता को आजमाने तैयार हो जाते हैं…! वहां दरबार/पूजास्थल में पहुंच कर दूसरों के ठीक होने के भ्रम को ही ठीक होना मानकर उन्हें उनका आजमाने का निर्णय बुद्धिमता पूर्ण लगने लगता है और पहली बार दरबार (पूजा-स्थल) में पहुंचे व्यक्ति की उस दरबार में आस्था दृढ़ हो जाती है…! यह दृढ़ विश्वास आधारित गहरी आस्था ही, आशा को पुनर्जीवित करने वाले चमत्कारी प्रभाव को उत्पन्न करती है जिससे विश्वास की पतली‌ सी परत के नीचे अविश्वास दब जाता है…! स्वयं में या अपनों में अविश्वास के ऊपर चढ़ती विश्वास की यह परत, नगण्य संख्या तक व्यक्तियों में ही इतनी दृढ़ हो पाती है कि वह नीचे दबे अविश्वास को आजीवन फिर से ऊपर ना आने दे…! इस दरबार थ्योरी से एक बात तो सुनिश्चित है कि मनोरोग जो भावनाओं के भंवर से जन्मते हैं… उनका भावनात्मक उपचार ही स्थाई निदान हो सकता है…

मैं एक ऐसे ही स्वास्थ्य संरक्षण केंद्र (रिहेबिलिटेशन सेंटर) से आपका परिचय कराने जा रहा हूं *जहां की सुविधाएं, प्रारंभिक स्तर के मनोरोगी को पूर्व प्रस्तावित दवाओं से शीघ्रतम मुक्ति व स्थाई उपचार का मार्ग प्रशस्त करा सकती हैं…!

जहां की सेवाएं किसी को मनोरोगों से आजीवन बचाये रखने योग्य बना सकती हैं…!
यह केन्द्र भी विश्वास आधारित है किन्तु किसी दरबार, पूजा-स्थल, पीर या देवी-देवता के स्थान पर स्वयं में ही उसके विश्वास जगाने के रूप में.…!
उपरोक्त अन्य उपचार विधियों, सहजयोग, विपश्यना, रेकी आदि से भी हम लगभग पूरी तरह सहमत हैं किन्तु सहजयोग से भी सरल, सुगम, साधारण व घर बैठे, चलते फिरते कार्यरत रहते हुए भी, अनिद्रा, मोटापे सहित हर प्रकार के स्वास्थ्य लाभ को शीघ्रतम पाने का कोई मार्ग है तो वह है मनयोग!

(शेष मनयोग भगाये रोग! के भाग -2 में…)

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कुर्बानी- नेकी के लिए!

अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…! जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें!

सभी मजहबों/ धर्मों की किताबों में लिखे वाकये (घटनाएं) वो नजी़रें हैं जिनको वक्ती हालात के हिसाब से आज, और आज से 1000 साल बाद भी, अमल में लाया जाना मुनासिब है और रहेगा …

इस्लामिक आस्था से जुड़ी, “कुर्बानी” भी एक ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है!

इस्लाम में कुर्बानी की शुरुआत का जिक्र, सर्वोपरि “हुजूर” के दरबार में उनके नबियों (फालोअर्स) के बीच सबसे काबिल होने / “हुज़ूर” के सबसे अजीज ओ करीब होने के दावे पर बहस चल रही थी! उन काबिलियत का दम भरने वालों की मौजूदगी में ही “हुजूर” ने एक उचित को चुनकर उनकी वफादारी साबित करने उन्हें एक इम्तेहान से गुजरने का मौका दिया! जिसके लिए उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने का हुक्म दिया गया…. बाकी नबियों ने गर्दनें झुका लीं मगर वे नबी पिता अपने बेटे की कुर्बानी देने, और उनके बेटे कुर्बान होने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गये!
हुजूर के दरबार में घटी इस घटना के दृश्य में पिता की आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की तलवार से कुर्बानी दी जाना और कुर्बानी के बाद पट्टी खुलने पर बेटे की जगह गर्दन कटे हुए बकरे का देखा जाना, बताया गया है!

इस बेहतरीन वाकये में एक से अधिक सीखें समाहित हैं…

1- तुम्हारे खैरख्वाहों /सरपरस्तों को जानो! उनके हुक्मों की, बिना किसी शक-ओ-शुबहा के बस तामील करो…! “
“जिनमें खैरख्वाही दिखती हो उनमें शुबहे कैसे देखे जा सकते हैं?”

2- अगर तुम सच्चे हो, ईमान पर हो और कभी भी, कहीं भी तुम्हें तुम्हारी सच्चाई का इम्तेहान देने कहा जाये, तो बड़े से बड़े इम्तिहान से गुजरकर दिखा दो कि तुम सच्चे हो!

3- नेकी की राह पर चलकर ही कबूल होने लायक इबादत की जा सकती है… नेकी की राह बेहिसाब कुर्बानियां चाहती है… इसीलिए नेकी के लिए कोई भी कुर्बानी छोटी है…!

रमजान में ईद-उल-फितर पर खूब जलसे किये फिर कुर्बानी मांगने वाली “ईद-उल-जुहा” आ रही है ! तो क्या हुजूर की नजरों में खुद को साबित नहीं करशा चाहोगे? क्यों! अब से हर “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम, नेकी के लिए, अपने आपकी कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! आज के हालातों में रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी से अच्छी और बड़ी कुर्बानी और क्या होगी? दीजिए…! रक्त बहाने के लिए नहीं… सहेजने के लिए हो…. आपकी कुर्बानी…. किसी की जान लेने नहीं ज़िन्दगी देने के लिए हो आपकी कुर्बानी…!

जरूरी होने पर जब औरों से आंखें, लीवर, किडनी, ब्लड, बांह, मांस, होंठ आदि लिए जाने में मज़हब आड़े नहीं आता है…. तो इत्मीनान रखिये… इनके दिये जाने में भी मज़हबी बंदिशें नहीं हो सकतीं!

चाहें तो अपने हाफ़िज़/ मौलवी/ मौलाना साहिबों से मशविरा करें… और अगर जायज़ पायें तो आगे बढ़ जायें… दीन के काम आकर मुस्लिम समुदाय को इज्जत बख्शने की वजह बन जायें!

जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी

इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें! इस्लाम का रुतबा ऊंचा बनाए रखने, ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम, अपनी जाती कुर्बानी देकर सच्चा मुसलमां होकर दिखायें!

सबसे अच्छी वो कुर्बानी, जो दे किसी को जिंदगानी!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

रावण, राम और रामभक्त!

*”#जय_श्रीराम!” के होते हुए, वर्तमान उद्घोषों को सुनकर ऐसा लगता है कि रामभक्त अन्यायी-अभिमानी-असत रावण के आदर्शों पर चल पड़े हैं!*
*आज के तथाकथित रामभक्त रावण की स्वर्ण-लंका सा आज के ‘स्वर्णिम-भारत’ को बनाने की जल्दी में… परम #पुरुषोत्कृष्ट_श्रीराम के स्थान पर रावण का अनुसरण करते अधिक देखे जा रहे हैं!*
*सत्यासत्य संग्राम चरम पर है!*
“*#सतयुगकेद्वार# खड़ी दुनियाँ आज असत के अतिरेक से आर्तनाद कर रही है!*”
-सुबुद्ध सत्यार्चन