रिश्ता -1

 

रिश्ता 1

रिश्ता-1 रिश्तों पर आने वाली पुस्तक का आवरण पृष्ठ है यह …

 

 

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रिश्ते! Relationships !

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रिश्ते! Relationships !

रिश्ते आपकी परछाईं या प्रतिबिम्ब की तरह हैं…

Relationships are alike your shadows or mirror images…

आपके प्रतिबिम्ब का सौंदर्य आपकी स्थिति पर निर्भर है

आपके रिश्तों का भी…!

Your mirror image looks as you are…

Similarly your relationships do …

 जितने आप सुदृढ़ होंगे उतना आपका प्रतिबिम्ब होगा…

आपके रिश्ते भी…!

As Stronger you are as your images …

Similarly your relationships do…

यदि आपका रुख ऊगते सूर्य की ओर है/ रोशनी की ओर है तो आपकी परछाईं आपका पीछा कर रही होगी…

और यदि आपकी गति सूर्य/ रोशनी की विपरीत दिशा में है तो आप परछाईं का पीछा कर रहे होंगे…

किन्तु यदि आप सूर्य़/ रोशनी से दूर अंधेरे में हैं तो परछाईं कहीं नजर नहीं आयेगी….।

आपके रिश्ते भी….

@सत्य+अर्चन

If you are moving towards Sun / lights your shadow would follow you….

If you you are moving opposit to Sun / lights you would be following your shadows …

If you are away of Sun / lights,  (in dark) you won’t find any shadow of yours …

Similarly your relationships do …

@sathyarchan

क्या पत्रकारिताहीन देश हैं हम

क्या पत्रकारिताहीन देश हैं हम

मेरा सवाल है भारत के सभी मीडिया हाउसेस से कि-

राम रहीम जी, आसाराम जी के दोषी प्रमाणित होने से पहले आपके जैसे मीडिया हाउस क्या कर रहे थे??? क्या आप सब मीडिया हाउस दोषी नहीं हैं…. भ्रमित देश को भ्रम में बनाये रखने के … भ्रम को बढ़ावा देने के … भ्रम का महिमा मंडन करने के….. ऐसा हो ही नहीं सकता कि समूचा मीडिया अब तक अंजान हो …. उन सच्चे लोगों से जो नि:स्वार्थ समर्पित हैं समाज के लिये… देश के लिये…. मगर आपका इंट्रेस्ट केवल गरमागर्म खबरों में है…. ऐसा लगता है मूढ़ जनों की तरह ही आप सब भी,  विशिष्ट विचारकों के… दलों के …. समूहों के संस्थाओं के प्रति … समर्थन या विरोध का पूर्वनिर्धारण कर …. योजना पूर्वक, समर्थन या विरोधी केम्पेन चलाते रहते हैं…  

मैं मेरे कथन को नीचे लिखे तथ्यों से सिद्ध करना चाहूंगा-

2013 से अब तक सत्ताधारी दल को छोड़ शेष सभी नेताओं के वाणी / विचार अचानक…. एकदम से …. इतने पंगु कैसे हो गये कि सभी के वक्तव्य केवल मखौल के योग्य ही बचे हैं ….. सारे नेता एकसाथ मतिभ्रम का शिकार तो नहीं हो सकते ना! तब से किसी भी विपक्षी का, कोई भी वक्तव्य उल्लेखनीय / सम्माननीय नहीं रहा ….

ऐसे ही  रामरहीम, आसाराम, नित्यानंद जैसे दरबारों में उनके दोषी प्रमाणित होने से पहले कभी भी…. कुछ भी…. प्रश्न उठाने जैसा नहीं दिखता आप लोगों को…. किस बात डर है …. ?  मिलने वाले चंदे के कम होने का …. या गिरने वाली टी आर पी का… या गौरी लंकेश की तरह मारे जाने का…?  टी आर पी का डर है तो आपकी आंकलन क्षमता ठीक नहीं है…. शेष कोई भी डर है तो तो मुझे दुख है कि जिस देश का गौरवांवित वासी हूँ उस देश में एक भी मीडिया हाउस “पत्रकारिता धर्म” के निर्वाह में सक्षम नहीं है…. 

जनता को दोष देकर अपने कुकृत्यों को अधिक दिन ढँका नहीं रख पाओगे ….. जनता जाग रही है… वह सोशल मीडिया प्रस्तुतियों में से झूठ और सच अलग-अलग करना सीख रही है…   शीघ्र ही जनता पारंगत भी हो जायेगी …. तब आप सब बगुलों की दुकानों पर कौए उड़ेंगे!  चेत जाओ! ….. जाग जाओ !!……… सत्य को सबल करने साहसपूर्वक सत्य के साथ खड़े होना शुरु तो करो ….   व्यक्ति हो या संस्थान-

केवल सत्य के साथ ही स्थायी सफलता संभव है!”

एक थी छुनछुन

एक थी छुनछुन

छुनछुन को डाक्टरों से बड़ी एलर्जी थी… मगर बीमार होती तो ले जाना ही पड़ता था… परसों भी ले गये … गाड़ी से डाक्टर के केबिन तक, गोद में ले जाकर वजन तौला, छुनछुन  वेइंग मशीन से उतर दौड़ लगाकर कम्पाउंड से बाहर पहुँच गई…. उसकी मम्मी पीछे-पीछे…. मनाकर अंदर लाये… आब्जर्वेशन टेबल पर लिटाया…. डाक्टर ने देखा. देखकर सहायकों से तुरंत आपरेशन की तैयारी करने को कहा और मुझसे कहा कि जो दवायें लिख रहा हूँ तुरंत ले आयें….  मैंने छुनछुन की ओर शिकायत भरी नजर से देखा, माँ ने गले से लिपटा रखा था … वो रो रही थी …  छुनछुन भी लिपटी रो रही थी….  तभी एक-दो हिचकी ली और छुनछुन चली गई…. मैं अवाक था … अच्छी भली चलकर आई थी वो ….और चली गई!

  दुनियाँ में कोई ऐसा तो हो ही नहीं सकता …जिसने जीवन में कभी-किसीसे प्यार ना किया हो…. ना कोई ऐसा हो सकता जिसे कभी-किसी ने प्यार ना किया हो? अक्सर सभी को लगता है कि मेरा प्यार जितना गहरा है , सामने वाले से उतना पलटकर नहीं मिलता…. फिरभी कई बार इसका उलट होता है…. मेरे साथ भी है… मेरे जीवन में कुल 5 व्यक्ति ऐसे हैं … नहीं-नहीं …. थे… धीरे-धीरे कम होते जा रहे वो….  जो मेरे प्रेम से बहुत अधिक, मुझसे प्रेम करते थे…. इन्हीं में से एक थी छुनछुन!  मेरी प्रियतम…  सबसे अधिक विश्वसनीय… बिल्कुल मेरी बेटी की तरह ….  हद से ज्यादह समर्पित और आज्ञाकारी…. पहले भी एक बार लम्बी बीमारी 8-10 महीने की झेल चुकी थी वो…. तब उसकी और हम लोगों की परेशानी देख डाॅक्टर ने दया-मृत्यु के सम्बंध में बताया था…  तो मैंने कहा जब परेशानियों से मजबूर हो जाउंगा तब भी इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ेगी …. बस उससे कह दूँगा कि छुनछुन अब ‘मर जाओ’ तो वो मर जायेगी… !  और सभी लोगों से भी यही कहता था … सबको मजाक लगता …. मगर यही सच था… वो मेरे केवल मनोभाव पढ़कर सहमने, उछलने, खेलने लगती थी और मर भी गई …!

केवल पालने वाले ही जान सकते हैं कि पालतू कितने खास होते हैं ये …  कुछ साल पहले,  पत्नी को दो तीन दर्दनाक तकलीफें हो गईं थीं …. पत्नी जी की तकलीफों से मुझे और छुनछुन को भी, बड़ी परेशानी होती थी… मैंने छुनछुन को अलग बुलाकर बोला … “देख छुनछुन… मम्मी अकेले इतनी बीमारियों से जूझ रही है …. वो अकेले थक जायेगी तो हमारे खाने-सोने का क्या होगा … चल अपन थोड़ी-थोड़ी अपन बाँट लेते हैं….”   दो-तीन दिन बाद से ही पत्नी जी का जोड़ों का दर्द और छुनछुन का चलना फिरना कम होते गया… फिर तो जब भी पत्नी जी, कोई छोटीमोटी से लेकर मझोली बीमारी से भी पीड़ित  होतीं तो,  बीमारी तुरंत ट्रांसफर होकर छुनछुन में पहुँच जाती…. पिछले ही सप्ताह … इनको वायरल हुआ … तीसरे दिन छुनछुन को हो गया पत्नी जी का ठीक हो गया…! किसी समय मुझसे किसी संत ने बताया था कि उन्होंने किसी की बीमारी अपने ऊपर लेने की प्रार्थना ईश्वर से की थी जो सुन ली गई थी…  बस मैंने भी वही किया … कुछ खुद के लिये माँगी कुुछ छुनछुन के लिये ट्रांसफर करने की प्रार्थना की … सभी सुनी गईं! आपको अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक लग रहा होगा मगर यही सही है…

                                                            सच कहूँ तो एकमात्र छुनछुन ही थी जिसने मुझमें आत्मीयता , अपनापन का भाव पैदा किया … अन्यथा मैं, जन्मजात बैरागी मानसिकता वाला व्यक्ति हूँ… मेरे लिये प्रत्येक हर्षोत्सव, सामाजिक रीत का निर्वाह अधिक रहा …. हर्ष का कारण कम… शायद मुझमें यह कमी है कि मुझे हर्ष और शोक अधिक प्रभावित नहीं करते …! मुझे याद है कि मेरी पहली भानजी के जन्म से कुछ माह पूर्व उनके दादाजी का शुभसूचना वाला पत्र आया … पढ़े जाने पर सब प्रफुल्लित थे…. मैं चुप … माँ ने पूछा “तुझे खुशी नहीं हुई” …. तब समझ आया कि खुश होना चाहिये …. जैसे तैसे मैंने शब्दों में खुशी प्रकट तो कर दी मगर समझ कुछ नहीं आया …. कि मामा बनने पर जीवन में क्या बढ़ गया  …. हालाकि उसके जन्म के बाद उसका भोला, मनोहारी बचपन मेरे लिये बहुत मनोरम था … जब भी आती … बड़े प्यार से … गोद में लिये लिये शहर भर में घूमता … उसे देख ही मन में एकल कन्या का पिता होने का स्वप्न देखा …. मगर पहला बेटा हुआ….  नर्स / डाॅक्टर ने बड़े उत्साह से खुशखबरी दी … मुझे खुश होना चाहिये था….  हुआ…. मगर चिंतित अधिक था , पत्नी के स्वास्थ्य के लिये … दूसरे बेटे के जन्म के बाद बेटी के पिता होने का स्वप्न, स्वप्न ही रह गया…. भानजी के साथ बेटी को जीने का अवसर स्वाभाविक रूप से  बहुत  अधिक नहीं मिला ….

                                             कई बर्षों बाद व्यावसायिक कारणों से …. एक गाँव में छोटे-छोटे बच्यों के साथ रस्सी में बँधी 15-20 दिन की छुनछुन दिखी…. अपने 4-5 भाई बहिनों के साथ…. बहुत प्यारी लगी वो…. एक सहकर्मी ने उसे गोद में उठा लिया और मैने भी उससे प्यार किया ….  सहकर्मी ने कहा इसे ले चलते हैं …. साथ में गांव के सरपंच भी थे वोले ले जाओ… मैंने उसे गाड़ी में साथ बिठा लिया … एक दिन आफिस में रहने के बाद छुनछुन घर आ गई…. घर में पहले से एक पामेरियन ‘मोंटी’ था ही ….  मगर छुनछुन की मासूमियत के कारण सभी ने उसे सहर्ष अपना लिया… धीरे-धीरे छुनछुन भी ‘मोंटी’ की तरह घर की सदस्य हो गई…. मेरी नई प्यारी बेटी  ….  मेरे बेटों सहित घर के लोगों के साथ-साथ जो भी, उससे मिलता,  वो सभी की चहेती हो जाती  …. स्पेशल थी वो!  उसका सिक्स्थ सेंस जबरदस्त था… घर के तीसरे कमरे से ही उसे पता होता कि गेट किसने खोला, किसी नये ने या रोज आने वालों ने , रोज आने वाले 3 कामगारों में से भी तीनों में से सबके लिये अलग अलग प्रतिक्रिया से हमें पता चल जाता कि कौन आया है…. घर में कौन बीमार पड़ने वाला है उससे संकेत मिल जाता था… आज्ञाकारी इतनी कि जहांँ बैठा दो वहीं बैठना है और उठने का मना कर दो तो दूसरे के कहने से भी नहीं उठना…. उसकी पिटाई कभी नहीं हुई… वैसे ही बहुत डरती थी वो …. जोर से डांट भी दें तो बीमार पड़ जाती थी….!  उस दिन भी उसे दो दिन से अनमनी सी होने पर सावधानी-वश दिखाने ले गये थे…. खेलते कूदते हँसी-मजाक करते गई थी…   और मिट्टी होकर लौटी थी….!

                                            डाॅक्टर ने देखकर बोला था गर्भाशय में इंफेक्शन है…  आपरेशन करना पड़ेगा आज ही… पत्नी जी और मैं दोनों चकित और दुखी! 5 सेकेंड के अंदर 500 ख्याल आकर चले गये …. मैं धम से बेंच पर बैठ गया सोचा …. 4 महीने से वेतन नहीं आया है ना पेंशन शुरु हुई है…  ऐसे में घर में जो है सब खर्च हो जाना है … फिर बूढ़े दादा-दादी को इलाज की जरूरत पड़ी और कोई कमी रह गई तो सब छुनछुन को ही कोसेंगे …. 50 रु कम पड़ने पर बेटे का इलाज ना करा पाने वाले  छत्तीसगढ़ के असहाय पिता का चेहरा सामने घुम गया ….  और फिर भी  छुनछुन तू बच तो नहीं सकती … आपरेशन टेबल पर और उसके बाद का दर्द सहन नहीं कर सकेगी तू …. इतने नाजों से पली है ….  जरूर मर जायेगी  …. सोचते-सोचते उसकी तरफ देखा …. आँखों-आँकों में उससे शिकायत की कि “क्या छुनछुन मैं इतनी परेशानी में हूँ … और तुमने जाने की तैयारी कर ली….  अगर आपरेशन में बच भी गईं तो तुम्हारी मम्मी तो दिनरात तुम्हीं को  गोद में लिये बैठी रहने वाली है …. हमेशा की तरह … वेहोश होने तक सोयेगी नहीं …. और इसी बीच तुम चल दोगी …. जाना ही है तुझे तो जा …. हम सम्भाल लेंगे खुद को …. तेरी और दुर्गत हमसे देखी ना जायेगी… (कजिन की ‘कुल्फी’ का आपरेशन के बाद,  महीनों तक तड़पता चेहरा याद आया)  छुनछुन तुझे जाना है तो जा… अभी ही चली जा….  आपरेशन से पहले…..”  तभी डाॅक्टर ने दवाओं के विषय में बात करना शुरू की,  मैं उनसे समझने लगा….  और 1 मिनट के अंदर पत्नी ने बोला देखो ये कैसे कर रही है… डाॅक्टर ने भी स्टेथैस्कोप लगाकर देखा और  देखा तो छुनछुन जा चुकी थी….

मैं जितने प्यार से उसे लाया था….  हमने जितने प्यार से उसे पाला था … जैसे  सबने साथ-साथ जिया था उसी  सम्मान से मैं,  उसकी मिट्टी को मैं दफनाकर आया….! और दूसरे दिन से फिर दुनियादारी में व्यस्त… अब हमारी छुनछुन,  हमारे अंदर जिंदा है …. उसकी यादों में  ….

‘एक थी छुनछुन!’

 

देश सोया है; कोई इसे ना जगाये !!!

देश सोया है; कोई इसे ना जगाये !!!

जिसे ‘नया भारत’ चाहिये बनाये …
हम देश हैं, सोये हैं… हमें ना उठाये !!!
हम तो मौज में रहे जब … ‘जार्ज ‘थे…
और तब भी जब पैमाने सुराही ‘लार्ज’ थे;….
देश आजाद हुआ… क्या हुआ?
नया ‘माली’ हुआ बागवाँ… क्या हुआ?
इस बाग ने कितने तो ‘माली’ आजमाये ,
जो कहते जगाना है … और रखते सुलाये….
अब 21वीं में रक्खे या 14वीं में ले जाये….
करे जिसके जो जी में आये….
देश सोया है; कोई इसे ना जगाये !!!
#सत्यार्चन

विदाई

– विदाई – .
किसी के गले से लगना था
गले से किसी को लगाना था
.
ना कोई गले से लग सका
ना गले से कोई लगा सका…
.
किसी के दिल में बसना था
किसी को बसाना था दिल में;
.
ना कोई दिल में बस सका
ना बसा सका कोई दिल में …
.
आखिर विदाई की घड़ी आई..
और हो गई उसकी विदाई!
.
#सत्यार्चन

ईश कृपा

ईश कृपा

अनेक विशिष्ट चीजें केवल सामीप्य से ही मिल जाती हैं वो भी मांगे बिना ही— जैसे बर्फ के पास शीतलता,अग्नि के पास गर्माहट,गुलाब के पास सुगंध…
इसी तरह का स्वभाव परमात्मा का है उससे मांगने की आवश्यकता नहीं होती — अगर हम निकटता बना लें तो वो हमारी हर इच्छा को जान लेता है एवं हर उचित इच्छा के पूर्ण होने का रास्ता भी बना देता है —
इसीलिए आइये उस सर्वोपरि के सानिध्य का प्रयास प्रारंभ किया जाए ताकि हम सदा के लिए सांसारिक दुख और बंधनों से मुक्त हो सकें!
प्रभु से के चरणों में निकटता की शुभकामना के साथ ही ईश्वर के विषय में एक और महत्वपूर्ण तथ्य —
वो सदा से
इसी धरती पर हमारे बीच ही है !
कृपा करने के लिये वो सज्जनों के रूप में सामने आता है —
और
कोप के लिये कुबुद्धि/ दुर्जनों / आपदाओं को माध्यम बनाता है —
*मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारों या चर्च में वह मिले या ना मिले सतत किये गये सद्कर्मों से वह जरूर मिलता है*

#सत्यार्चन