जग जीत लो!

कलयुग के चरम उपरांत सतयुग के आगमन की संसूचना भी वर्णित है शास्त्रों में…!
आज असत, अनैतिक, अराजक (अधर्म) के स्थान पर सत, सन्मार्ग यानी धर्म का पथ चयन करने वाले दैनंदिन बढ़ते दिखते हैं! जिससे वर्तमान काल के कलयुग और सतयुग के संधिकाल होने की अवधारणा को बल मिलता है!
फिर संधिकाल हो या कलयुग का कोई भी चरण … मैं स्वयं को सन्मार्ग पर चलाये रखने की सफलता के असीमानंद से आनंदित हूं… और सभी अपनों से, सभी से, इस अलौकिक आनंद की प्राप्ति की दिशा में प्रयाण का अनुरोध करता हूं!
अधिकांश पौराणिक कथाओं में सत्य को भार लादे हुए दर्शाया गया है किन्तु कष्टमय नहीं… जैसे वायुमंडल का, परिवार के भरणपोषण का भार किसी को भी भार जैसा अनुभव नहीं होता… उस जैसा ही … बस स्वजन/ परिजन में सबको सम्मिलित करते जाना है … सब अपनों को … परायों को… समर्थकों को… विरोधियों को….. मित्रों को…. शत्रुता रखने वालों को…. सबको…. सारे संसार को…. स्वजन ही तो मानना है…. स्वजन के वृत को ही तो, विस्तार देना है ! स्वयं को सबकी तरह और सबको स्वयं की तरह देखने का अभ्यास करना है….! फिर स्वयं के शारीरिक कष्ट सहित, किसी का भी, किसी भी तरह का, कैसा भी व्यवहार, कम पीड़ादायक लगने लगेगा… फिर नगण्य … फिर शून्य… और पीड़ा ना होगी तो शेष सब आनंदमय ही तो होगा!
शुभकामनायें!
-सुबुद्ध सत्यार्चन

सुख चाहिए? ये लीजिए! -11 आम या खास…

सुख चाहिए? ये लीजिए! -11 आम या खास…

दुनियाॅं 2 तरह के लोगों से बनी है…
आम और खास!
पहली तरह के लोग “चल पड़ने वाली ट्रेन के बंद दरवाजे मिन्नतों, गालियों या लातों से खुलवाने और अंदर घुसते ही बंद कर फिर किसी के लिए ना खोलने का फरमान सुनाने वाले होते हैं!”
दूसरी तरह के लोग “वैसी ही ट्रेन के पहले से अंदर बैठे / खड़े वो लोग होते हैं जो बाहर छूट गये को अंदर आने देने की आवश्यकता समझते हैं और अंदर से दरवाजा खोलते-बंद करते रहते हैं!”

पहले वाले अमूमन, आजीवन अपने तरीकों से ही अंदर घुसते रह पाते हैं किन्तु दूसरी तरह के लोगों का प्रभामंडल (Oaura/ नूर) विकसित होने लगता है फिर दूर से ही नजर भी आने लगता है और तब उनको बाहर देखते ही ट्रेन के अंदर से लोग दरवाजे खोलने लगते हैं!

अब यह आप पर है कि प्रभामंडल विकसित होने पर विश्वास रख, विकसित होने तक अतिरिक्त कष्ट सहें या आजीवन मिन्नतों, गालियों, लातों से काम निकालते रहें! किसे चुनना है ये निर्णय तो आपको ही करना है…! आम रहना या खास बनना है!
-सुबुद्ध सत्यार्चन

बदला बदला चाँद — The REKHA SAHAY Corner!

कुछ दिनों पहले चाँद ने किया कुछ वायदा और बादलों में खो गया . आया इस हफ़्ते सामने बदला बदला सा रूप ले कर , नया नया सा चाँद . रोज़ रोज़ रूप बदलते किस चाँद से पूछूँ उसका पुराना वायदा ? लोग भी ऐसे ही बदलते हैं। समझना मुश्किल है , ऐसे बदलते लोगो […]

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ज़िंदगी — स्पंदन

ज़िंदगी एक दिन मिली थी राह में मैंने कहा , आ बातें करें तनहाई में बेवफ़ा है तू बड़ी हर बात में , चलती कहाँ है तू मेरे जज़्बात में !! छोड़ दिया था साथ मेरा , बीच राह में !! थक गया हूँ , मैं तेरी हर चाल में कैसे फँस गया हूँ , […]

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Hindi Poem on Human Life-Manav — Hindi Poems|हिंदी कविता संग्रह

मानव यह ज़िन्दगी तेरी मनुष्य,मुसीबतों से भरी है,यह किसीऔर ने नहीं,बस, तूने स्वंय ने ही भरी है। करता अगर संघर्ष ज़िन्दगी में,तो होते न तेरे सपने दफन,यूं न चला जाता दुनिया से,ओढकर असफलता का कफन।।-राजप्रीत हंस

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आइये! खुशहाल हो जायें…

किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर…..

आइये खुशहाल हो जायें!आइये! खुशहाल हो जायें…

अक्सर सभी को बहुत सारी शिकायतें होती हैं दुनियां से… किन्तु दुनियां ऐसी क्यों है?
ये दुनियां हो या वो दुनियां… कर्म के सिद्धांत अनुसार ही फल देती आई हैं…!
और बिल्कुल सच्चा है कर्म का सिद्धांत…!
किसी संत का एक उद्धरण है कि-
एक खुशहाल इंसान घूमते फिरते आम के बाग में पहुंच गया… बड़े बड़े रसीले आमों से लदे पेड़ों को केवल देखकर ही उसे बड़ा सुख मिला! फिर मन हुआ कि एकाध आम तोड़ लें… इधर उधर देखा माली पेड़ के नीचे सोया पड़ा था…. चौकीदार था नहीं … ना ही और… ‘कोई भी नहीं देख रहा था(?)’…. एक आम तोड़ लिया… चखा तो मन हुआ एक और… फिर एक और… फिर एक और…. इतने में ‘सदा सब कुछ देखते रहने वाले’ नेे एक आम माली पर टपकाया… माली जागा… डंडा लेकर पीछे भागा… दो चार जड़ दिए पीठ पर….! दर्द और बेइज्जती! आंसू आ गए आंखों में…! यह आंख ही थी जिसने देखकर पैरों को पेड़ तक पहुंचाने का, हाथों को आम तोड़ने का, जीभ को स्वाद ले-लेकर खाने का दोषी बनाया..!’

संतश्री के उक्त उदाहरण जैसा ही है कर्म का सिद्धांत!

… सरल करना चाहें तो जिस प्रकार आंख, कान, नाक, हाथ, पैर सब अंगों में से कोई भी, किसी भी प्रकार का कर्म करे, वह अकेले उस अंग पर नहीं समूचे शरीर पर, सभी अंगों पर कुछ ना कुछ, प्रभाव डालता है…! फल सबको प्राप्त होना / भुगतना होता है…!

इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर असर पड़ता ही है… और अगर किसी मोहल्ले में एक संभ्रांत परिवार हो तो मोहल्ले पर भी असर पड़ता है…! मोहल्ले की तरह शहर, देश-दुनियां पर भी!

आज सबसे खुशहाल देश फिनलैंड, नार्वे, डेनमार्क हैं! सर्वाधिक सामाजिक मूल्यों के पालक डेनमार्क, न्यूजीलैंड सबसे सभ्य देश हैं! जापान सबसे समर्पित नागरिकों वाला, चीन सबसे जुझारू… और… और…. और भारत…? आधी से अधिक दुनियां के लिए भारत; आज भी सांप-संपेरों, टोने-टोटकों, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी आस रखने वाले निठल्लों का देश है!

आइये अपने आप से सदाचरण “कराना” शुरू करें… कल परसों में सब सदाचारी हो जायेंगे…! सब खुशहाल!

-सुबुद्ध सत्यार्चन