सुबोध और समरसता

“हल करने की चाह और सक्षम प्रयास की निरंतरता दोनों हों तो हर एक समस्या को हल किया जा सकता है… लक्ष्य कोई भी हो पाया जा सकता है.” 

1- सामाजिक वैमनस्य का सबसे बड़ा कारण है अर्ध सुबोध!
2- “सामर्थ्य केवल मुझमें” – अर्ध सुबोध है!
3- जितने भी भ्रम हैं सभी अर्धज्ञान हैं और अर्धसत्य से घातक भी!
4- भ्रमनिवारण उपरांत परिकलित (प्राप्त) का परिष्कृत स्वरूप ज्ञान है!
5- ज्ञान से अन्वेषण, अन्वेषण से रचना- से सुविधा- से सुख की प्राप्ति संभव!
6- सामाजिक सुख (पारिवारिक व राष्ट्रीय भी) समरसता में निहित है!
8- समाज में सुबुद्ध सब तो नहीं किंतु अनेक हैं, जितने सुबुद्ध हैं वे विशिष्ट भी हैं!
9- विशिष्ट की अन्य विशिष्ट के वैशिष्ट्य के सम्मान में अक्षमता, सहकार विरोधी है!
10- सफल सहकार के लिये सर्वजन समभाव आवश्यक है!
11- सहकार ही मानवता के सच्चे विकास का उपयुक्त मार्ग है!
12- स्वयं सहित प्रत्येक के वैशिष्ट्य को उचित सम्मान ही सुबोध है!

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