सुबोध और समरसता

“हल करने की चाह और सक्षम प्रयास की निरंतरता दोनों हों तो हर एक समस्या को हल किया जा सकता है… लक्ष्य कोई भी हो पाया जा सकता है.” 

1- सामाजिक वैमनस्य का सबसे बड़ा कारण है अर्ध सुबोध!
2- “सामर्थ्य केवल मुझमें” – अर्ध सुबोध है!
3- जितने भी भ्रम हैं सभी अर्धज्ञान हैं और अर्धसत्य से घातक भी!
4- भ्रमनिवारण उपरांत परिकलित (प्राप्त) का परिष्कृत स्वरूप ज्ञान है!
5- ज्ञान से अन्वेषण, अन्वेषण से रचना- से सुविधा- से सुख की प्राप्ति संभव!
6- सामाजिक सुख (पारिवारिक व राष्ट्रीय भी) समरसता में निहित है!
8- समाज में सुबुद्ध सब तो नहीं किंतु अनेक हैं, जितने सुबुद्ध हैं वे विशिष्ट भी हैं!
9- विशिष्ट की अन्य विशिष्ट के वैशिष्ट्य के सम्मान में अक्षमता, सहकार विरोधी है!
10- सफल सहकार के लिये सर्वजन समभाव आवश्यक है!
11- सहकार ही मानवता के सच्चे विकास का उपयुक्त मार्ग है!
12- स्वयं सहित प्रत्येक के वैशिष्ट्य को उचित सम्मान ही सुबोध है!

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अकृत की गवाह

अकृत की गवाह

जानते हो 
जिंदगी क्यों दर्द है?
क्योंकि जो हासिल है
वो ऊब हुआ
जो बाकी है
वो है प्यास!

कभी कहीं किसी जगह
हासिल से हटकर
प्यास सा
प्यास से मिलता-जुलता
मिल जाता है
तो
प्यासा तोड़ने की
नैतिकता व्रत, उपवास, आस, विश्वास
कर बैठता है भूल
और
भूल को भुलाने की कोशिश में
भूल पर भूल
करता चला जाता है!
भूला सोचता है
भूलते तो
किसीने देखा ही नहीं
तो
कोई क्या जाने ?
जो
मैं बताऊं
वही तो सब मानें! 
एक भूल भी भूल है
दस बीस भूल भी भूल
मेरी एक भूल भी मुझ तक है
और भूल भी मुझ तक ही!
पर भूला भूल ही जाता है
मौजूदगी एक गवाह की
जो होती है हमेशा
हर जगह
उसके अपने भीतर बैठी
उसकी अपनी ही आत्मा! 
और आत्मा
अनैतिक को
कहाँ स्वीकारती है?
मौके बेमौके
कचोटती है•••
दुत्कारती है!
तेरी आत्मा का
आत्मिक संबंध है
और आत्माओं से भी
वे भी जल उठती हैं
तेरी आत्मा की धधकती
गुनाहों की आँच से
तपती हुई आत्मायें
तब होती हैं सब
आसपास!
फिर
ना भूला भूल पाता है
ना
भुलाना चाहकर भी
भूल पाता है
उसका परिवेश! 
इसीलिए
सर्वोत्तम है स्वीकार !
अकृत कर्म का परिहार
प्रायश्चित
और
अपुनरावृत्ति के प्रयास का प्रण!
तुझपर है अब
तू करे सच का सामना
या
आजीवन बुनते रह
अकृत की
अनहोनी का
अनदेखी का
अनसुनी का
तानावाना !
-सुबुद्ध सत्यार्चन

वो सफल मैं क्यों नहीं ?-1

वो सफल मैं क्यों नहीं ?-1

धीरूभाई अंबानी जी जैसी सफलता किसी अन्य तत्कालीन नवोदित व्यवसायी को ना मिल सकी ! उनकी तब की सफलता आज के बाबा रामदेव जी( पतंजलि), मार्क जुकरबर्ग, आईफोन, गूगल, अमेजन, ओला, उबर, क्विकर के जैसी सफलता थी!
सभी एन्टरप्रन्यर चाहते तो पर सबको नहीं मिल पाती !
क्यों नहीं मिल पाती?

आपके अभिमत आधारित निष्कर्ष अगले भागों में•••

मेरी अपनी नजर से जो देखा मैंने अपना नजरिया•••

मेरी अपनी नजर से जो देखा मैंने अपना नजरिया•••

कभी कभी सभी, अपने आपसे भी बातें करते हैं••• किन्तु मैं अकसर अपने आपसे ही बातें करता हूँ••• क्योंकि अपनों को बात करना नहीं भाता •••• और गैरों से बात करना मुझे नहीं सुहाता••••! कल ही किसी का भेजा वीडियो खोला तो “मीत ना मिला रे मन का” ओरीजनल वीडियो था! तो बातचीत शुरू हो गई••• अपने आप से••••
कितना प्रसिद्ध रोमांटिक  गाना है मगर मैं तो भूल ही चुका था कि अमिताभ बच्चन जी पर फिल्माया गया है!
कमाल है!

अमिताभ बच्चन तो  एक एक्सन हीरो थे••• उनपर ये रोमांटिक गाना भी फिल्माया गया है? वैसे उनपर ज्यादा जंचता भी नहीं है! वो तो कुली, जंजीर, देशप्रेमी के विजय वाले रोल में ही अच्छे लगते हैं!
उनपर रोमान्टिज्म कहाँ सूट करता है ••• या तो वो फिलाॅसफी या एक्सन करते ही अच्छे लगते हैं! ••• यही उनसे उनके फिल्म निर्माताओं ने कराया भी••• तभी तो एंग्री यंग मेन इमेज में वो इतने फेमस हुए •••! उनकी सूरत शक्ल  कदकाठी पर रोमांटिज्म अजीब सा ही लगता••• इसीलिए उन्हें रोमांटिक फिल्में ना तो मिली और ना वो उनमें सफल हुए•••• “ये मीत ना मिला रे मन का” भी एक शायर का रोल निभाते हुए है शायद••• रोमांटिक  कहाँ है? 
अमिताभ जी की शुरुआती असफलताओं का कारण भी यही लगता है••• बाद के  महानायक शुरुआती फ्लाॅप!   शुरू शुरू में रोमांटिक फिल्में ही तो मिली थीं उनको फ्लाॅप रहे•••• फिर एक्शन फिल्में मिलीं तो कहाँ से कहाँ पहुँच गये वो••• मैंने तो उनकी लगभग सारी ही फिल्में देखी हैं•••  और कौनसे रोमांटिक रोल किये हैं उनने?
  शुरु-शुरू कौनसी फिल्में आई थीं उनकी? ‘सौदागर’, ‘बाम्बे टू गोआ’, ‘बाबर्ची’ ‘मजबूर’, ‘आनंद’, ‘गुड्डी’, सत्ते पे सत्ता, फिर आईं “जंजीर” “शोले” वगैरह•••• पर “अभिमान”, “मिली”, ‘त्रिशूल’, “मुकद्दर का सिकंदर”, “सिलसिला”, “कभी कभी”, “बागवां” भी तो उन्हीं की थीं••• सभी नामी गिरामी और सभी रोमांटिक फिल्में!

मेरे खयालों का कारवाँ आगे बढ़ रहा था आवारगी के साथ••• जैसा अकसर होता है अपने आप से बातें करते हुए•••

अमिताभ जी की अभिमान से सिलसिला तक सभी में एक खास तरह का रोमांटिज्म तो था! शोले का वीरू साइलेंट लवर था तो मुकद्दर का सिकंदर का उग्र और मुखर••• उसमें उनका डायलाग “जोरा दरवाजा खोल••• दिलजला हूँ दुनियां को जला के राख कर दूंगा” तब के जवां दिलों को झकझोरने वाला था•••

शायद हम लोग ही भुला देते हैं किसी शख्स की शख्सियत के सुहाने रंग••• बदनुमा दाग तो कितने भी पुराने हों यादों में ताजा बने रहते हैं•••• हम वही मान बैठते हैं किसी कलाकार को जो उसके निर्देशक अभी हाल के दिनों में उसे दिखा रहे हैं!

इसी तरह तो हम हर किसी शख्स को भी देखते हैं जैसा हमारे दोस्तों नजरिया कहता हो••• हम सभी में; दूसरों के नजरिए का रंगीन चश्मा हटाकर, सीधे-सीधे अपनी नजर से, साफ साफ देखने की काबिलियत तो है! मगर अकसर हम अपनी इस काबिलियत को भुलाये रखते हैं••• और जिंदगी में ज्यादातर चीजें रंगीन नजरिए वाले चश्मे से ही देखते चले जाते हैं••• कई बार तो कई बेशकीमते हीरों सी शख्सियतें हमारे करीब से दूर बहुत दूर चली जाती हैं••• और शख्सियतें ही क्यों••• कितने ही रास्ते••• कितनी ही सफलतायें••• कितनी तरक्की छूट जाती है हाथों में आते-आते•••!

खुद भी वही देखने लगते हैं! अकसर और

गुरु-शिष्य!

गुरु-शिष्य!


जिस समय प्रश्न, या शंका प्रस्तुत की जा रही हो और जब इनका समाधान प्रस्तुत किया जा रहा हो या प्रतिप्रश्न किया जा रहा हो दोनों ही स्थितियो में  प्रस्तोता गुरु और श्रवणकर्ता शिष्य है! अतः सभी वार्तालापों में सभी गुरु और सभी शिष्य हो सकते हैं / होते हैं!

रेत हैं हम!

दरिया की गीली रेत
हो गये थे हम
होकर तेरे हवाले
जैसा जी चाहे आकार दे•••
बना ले बदले
तेरी खुशी में थी
खुशी अपनी भी
मगर रेत से खेलने के शौकीन
कभी सोचते क्यों नहीं
रेत के दर्द पर•••
जब तक भाया
एक रूप सजाया
फिर मिटाया
बनाया
मिटाया फिर बनाया
जब जब जैसे जैसे
उनके मन को भाया !
-सत्यार्चन सुबुद्ध (facebook 28012016)

सत्यार्चन

एक और लघुकथा

आज खाने वाली ने, रोज की तरह, सुबह के नाश्ते में दलिया परोसा!
नमक ठीक था पर मिठास ना थी। मैंने पूछा “गुड़ नहीं डाला? आज नमकीन बनाने को बोला था क्या माँ ने?” वो बोली “शायद में गुड़ डालना भूल गई! अच्छा हुआ अभी दादी को नहीं भेजा और आपने बता दिया•••”
मैंने कहा “इसीलिए पूछा नहीं तो मालूम है ना अम्मा कितना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर देती•••” बोलते बोलते मुझे मेरी एक्स की याद आ गई•••• कहीं वो होती और उसने बनाया होता तो? उसको टोकने से और बड़ा बखेड़ा होने के डर से उसे तो टोकता ही नहीं••• तब••• अम्मा का छोटा बखेड़ा तो झेलना ही पड़ता•••
फिर भी•••
उसका होना और था
बखेडों का कुछ और!

ख्बाव की ताबीर

अनायास सड़क पर आज एक खिलता सा गुलाब देखा!
नजर पड़ी कि सुलग उठे जैसे हमने आफताब देखा!
खयाल बोला पढ़ ही दीजिए कुछ कसीदे उनकी शान में•••
रोका किया होश दिल ने मगर उनमें आब-ए-शराब देखा!
करता है कौन गुनाह ए इश्क कभी होशो हवास में•••
कितने ही नायाब नाजनीनों का तभी होते बड़ा खराब देखा! 
जता देते जो दिल में था••• कि चाहत है साथ चाय की •••
डिनर आफर हुआ होता••• कुछ ऐसा पड़ता रुआब देखा!

भारत भ्रमित क्यों?

सरकार पूरे देश जिस एनआरसी को लागू करने वचनबद्ध है किन्तु उसका ढांचा अभी तैयार नहीं  किया गया है… और भ्रमित भारत की सबसे बड़ी दुविधा भी यही है….! एन आर सी में भारतीय होने का क्या प्रमाण स्वीकार्य होगा सरकार बताने तैयार भी नहीं!

भारत भ्रमित क्यों?

  • आइये समझने का प्रयास करें कि देश दिग्भ्रमित क्यों???
    यदि वास्तव में भ्रम है तो क्यों है?
    विश्वसनीय तथ्य प्रदर्शित कर भ्रम का निवारण किया जा सकता है ना?
    रखे गये तथ्यों पर प्रतिप्रश्न और संदर्भों के उल्लेख को नकारकर भ्रम निवारण के प्रयास कितने सार्थक होने चाहिये?
    देश के विचरवान भारतों को (कुमारी और कुमार भारत को) “जैसा हम कह रहे हैं वही सही है!” से संतुष्ट किया जा सकता है? या उन्हें संतुष्ट हो जाना चाहिये?
    क्या अंधविश्वास से संदेहयुक्त अविश्वास उत्तम नहीं?
    हमारे देश में सरकारी लीपापोती का इतिहास पुराना है…. अनेक प्रश्नों के उत्तर अप्राप्त हैं …. कुछ बड़े प्रश्नों के उत्तर खोजने के प्रयास ही नहीं होते…. जैसे
  •  
  • कांग्रेस ने कभी आंतरिक आपातकाल, सिख विरोधी दंगों से हुई क्षति पर कोई मंथन नहीं किया…. कभी स्वीकार नहीं किया …और कोई सुधार भी नहीं किया… तो आज वे वहाँ पहुँचे जहाँ अपनी भूलों की ओर ना देख पाने वाले अहंकारी को होना चाहिये!
  • कंधर विमान अपहरण की फिरोती में आतंकियों को छोड़े जाने के निर्णय की समीक्षा भाजपा में हुई हो ऐसा लगता नहीं!
  • मालेगांव ब्लास्ट की एक जांच एजेंसी की जाँच को दूसरी एजेंसी द्वारा पलटा जाना और फिर कोर्ट से मुक्त आरोपियों को सर आँखों पर बिठाने के निर्णय से क्या प्रदर्शित करना चाहती है भजपा?
    उनमें से एक जो अब माननीय हैं तो अक्सर हिंसा के, हत्यारों के समर्थन में खड़ी दिखती हैं!
  • भाजपा, महात्मा गाँधी पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती…. यदि गोडसे के समर्थन में आना है तो खुल के आने में कौनसा भय है… क्या दोनों तरह की सोच का राजनैतिक लाभ उठाने के लिये? यदि ऐसा नहीं तो स्पष्ट कहने भर से काम नहीं चलेगा उन्हें अपने समर्थकों को गोडसे के कृत्य को उचित ठहराने से रोकने का प्रबंध भी तो करना चाहिये!
  • भाजपा के राजीव कुलश्रेष्ठ जैसे अनेक अंध समर्थक (या गुप्त शत्रु)अपने आडियो/ वीडियो/ लेख संदेशों में खुलकर आम जन से कानून और गैर हिंदुओं को तोड़ने की अपील करते हुए कहते हैं कि संवैधानिक पद पर बैठे लोग तो कानून के अनुसार चलने विवश हैं पर आम आदमी को कानून को, कोर्ट की परवाह ना करते हुए कानून को अपने हाथ में लेकर न्याय अर्थात गैर हिंदुओं का जीवन दूभर करना चाहिये… ऐसे संदेश प्रतिदिन प्रसारित होते हैं! भाजपा के जिम्मेदारों का इसपर मौन इसका समर्थन क्यों ना समझा जाये?
  • संसद हमले में अभियुक्त अफजल के पत्र में उल्लेखित देविंदर सिंह जैसे अन्य बिंदुओं को केवल इसलिये अनदेखा किया जाना कि वह एक अभियुक्त का उल्लेख है, कितना तार्किक निर्णय था?
    पुलवामा हमले में 40 से अधिक सेनिकों की शहादत में कहाँ क्या चूक हुई,(तब देविंदर भी वहीं नियुक्त था) पर कोई जाँच हुई तो उसका कोई निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं?
  • पठानकोट हमले में एस पी सतविंदर के अगुवा किये जाने की कथा को जांच एजेंसी द्वारा सच मान लेना और उसी एस पी की अपराधिक प्रवृत्ति की पुष्चि दूसरे प्रकरणों में हुई सजा के बाद उसके आज सजायाफ्ता होने से, क्या जांच एजेंसियों की विशवसनीयता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगता?… (वही जाँच एजेंसी अब देविंदर की जाँच भी कर रही है)
  • पूर्वोत्तर के राज्य असम में पिछली सरकार के समय से चले आ रहे एन आर सी में बड़ी संख्या में घुसपेठिये पाये गये…! इनमें से 2 शौर्य के लिये पदकों से सम्मानित  भारतीय सुरक्षाबलों से सेवानिवृतों के नाम मीडिया में उछले…. और ये 2 उस धर्म से हैं जो सीएए में सम्मिलित नहीं हैं! ये 2 तो विशिष्ट थे तो चर्चा का विषय बन गये…! इससे उन भारतीय मजदूरों की दुर्दशा का स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है जिनके दादे-परदादे भी भारत में जन्मे किंतु जो एनआऱसी में घुसपेठिये प्रमाणित हुए… ! उनमें से उन गैर सनातनी भारतीय किंतु प्रमाणित घुसपेठिये मजदूरों की बात करने का विचार क्या किसी मीडिया को आया भी होगा? सोशल मीडिया पर इस विषय पर लिखने वाले पूर्वोत्तर के ब्लागरों को जेल में डाल दिया गया… सरकार ने भी मान लिया कि कई लोगों को राष्ट्रीयता प्रमाणित करना मुश्किल है… तब क्या स्थिति का लाभ उठाने के लिये पूरे देश में एनआरसी लागू करने की हड़बड़ी दिखाते हुये सीएए नहीं लाया गया? 
  • यह संकल्प अनेक अवसरों पर दोहराया गया कि एनआरसी पूरे देश में लाया जायेगा…. पूरी तरह असम के जैसा नहीं होगा किंतु काफीकुछ वैसा ही होगा… ! इसी बीच सीएए लागू कर दिया गया! 
  • अब गणेशजी की मूर्ति को दूध पिलाने, नीम के पेड़ से दूध निकलने के चमत्कारों को स्वीकारने वाले भारतीय अधिक नहीं बचे, यानी पर कोई समझ रखता है…
  • सरकार पूरे देश जिस एनआरसी को लागू करने वचनबद्ध है किन्तु उसका ढांचा अभी तैयार नहीं  किया गया है… और भ्रमित भारत की सबसे बड़ी दुविधा भी यही है….! एन आर सी में भारतीय होने का क्या प्रमाण स्वीकार्य होगा सरकार बताने तैयार नहीं! पासपोर्ट, ड्राइविंग लायसेंस, समपत्ति पर आधिपत्य प्रमाण,   मतदाता पहचान पत्र, आधार, राशनकार्ड, नरेगा वगैरह वगैरह में से कौन कौन से दस्तावेज माने जायेंगे? कोई दस्तावेज माने भी जायेंगे या नहीं ?
  •  यह भी स्पष्ट है कि इससे  केवल मुस्लिम समुदाय ही प्रभावित होगा क्योंकि सीएए लागू कर अन्य धर्म के मानने वाले भारतीयों को पहले ही आश्वस्त कर दिया गया है!
  • माननीय गृहमंत्री व प्रधानमंत्री जी सहित सरकार, बड़े स्तर पर किसी भी भारतीय की नागरिकता ना छीने जाने और किसी भी घुसपेठिये को भारत में ना रहने देने के लिये आश्वस्त तो कर रही है किंतु किसे भारतीय और किसे घुसपेठिया मानेंगे यह स्पष्ट करने तैयार नहीं….! तो विगत वर्षों के मुस्लिम विरोधी झड़पों, मुस्लिम विरोधी प्रचार को देखते हुए मुस्लिम  समुदाय निश्तिंत कैसे हो सकता है???  
  • अब यदि सरकार वास्तव में वो नहीं करना चाह रही जिससे मुस्लिम समुदाय भ्रमित या भयभीत है, या आऱएसएस के हिंदूराष्ट्र तथा मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने पर आमादा नहीं है, सरकार गतिरोध से देश को पर दिन होती उत्पादकता हानि से रोकना चाहती है, वास्तव में गतिरोध दूर करना चाहती है तो प्राथमिकता के आधार पर राष्ट्रीय एनआरसी का मसौदा तैयार कर 20% से अधिक भारत को आश्वस्त करे! अन्यथा  सरकार और मुस्लिम समुदाय दोनों में से किसी का भी या दोनों का या भारतवर्ष का ही हाल “दुविधा में दोनों गये माया मिली ना राम!” वाला हो सकता है!

स्वर्णिम भारत

ना भाजपा के भरोसे रहें ना कांग्रेस के
केवल और केवल हम ‘भारत’ / ‘भारती’ भारतवर्ष को स्वर्णिम स्वरूप देने दृढ़प्रतिज्ञ हों! 

हम दूसरे की प्रगति में बाधक बने बिना, दूसरे के हिस्से की रोजी-रोटी खरीदे/छीने/ लूटे / हथियाये बिना अपने हिस्से की सम्पूर्ण प्रगति का ईमानदार प्रयास करने का हर भारत/भारती प्रण करे तो सबको ससम्मान समान सफलता मिल सके!
अपना सर्वस्व समर्पण कर दो अपनी ईमानदार प्रगति में आपकी प्रगति ही राष्ट्र की प्रगति है! राष्ट्र के लिये सर्वोच्च समर्पण है होगा आपका यदि आप आपकी अपनी प्रगति के प्रति सचेत हो जायें! इतना ही कर लें फिर देखे भारतवर्ष  कैसे सोने की चिड़िया नहीं बनता!