अनंतिम क्षण

Waited, waiting n waiting!

कहीं
किसी के लिये
कोई प्रतीक्षारत
आजीवन
आशान्वित
कभी तो होगी
अवतरित असामान से
आत्मा उसकी
जगाने फिर से
ह्रदय में स्पंदन
फूंकने फिर
देह में प्राण
आतुर, अनवरत , अनगिनत
पल, क्षण , घड़ी, दिन
मास, वर्ष, जन्म, व्यापित!
अथक , अनंतिम ,अविराम
हॆ कहीं कोई
प्रतीक्षित!
#सत्यार्चन

मैं था, हूँ…, रहूँगा सदा!

मैं सदैव से था,

मैं हूँ – – –

रहूँगा भी सदा – – – –
यह वर्तमान चेहरा मात्र है!

मैं तो वह चेतना हूँ – – –

जो तुम्हारे चेतन में भी है!

मैं बोलता हूँ

तुम सुनते हो – – –

तुम बोलते हो

मैं सुनता हूँ!

चेतना ही कहती है,

चेतना ही सुनती है!

अचेतन ना कहता है

ना कुछ सुनता!!!

#सत्यार्चन

 #SathyArchan

 #SatyArchan

(खोज इंजन सक्षम नाम ऒर हॆशटॆग)

Save Dying Humanity …बचायें मरती मानवता…-1

Save Dying Humanity …बचायें मरती मानवता… -1 Save! Dying Humanity … बचायें! मरती हुई मानवता…-1

तीनों में से क्या सबसे अच्छा ?
तीनों ही का अर्थ तो एक ही है
फिर तीनों बराबर हुए ना?मजहब मेरा-तेरा
जब ये एक जैसे हैं
तो इनके प्रतीक
आदि कालीन आदर्श जीवन के
प्रतिमान स्थापित करने वाले
आदर्शों की मूर्तियों वाले मंदिर,
नेक बंदों (पीरों/ फकीरों) की कब्र / मझार
नेकियों के शहन्शाह उस सर्वोपरि की इबादत वाली मस्जिद,
सबके भले की सीख देते उस सर्वव्यापी को
सर्वस्व समर्पण की प्रार्थना करते
गिरजाघर, गुरुद्वारे,चैत्य, मठ, आदि-आदि
छोटे बड़े तो नहीं हो सकते ना???
ना अच्छाई के समर्थन में प्रयुक्त
अलग-अलग तरीकों में से कोई छोटा बड़ा हो सकता है!
जो भी भ्रम है वह इन अलग-अलग पथ से
एक ही लक्ष्य को पाने का प्रयास करने वालों की
अज्ञानता जनित संकीर्णता के कारण है,
जो केवल अपने ही पथ को
लक्ष्य तक पहुँचने में सक्षम
मानने की भूल कर रहे हैं….
हालाँकि, लक्ष्य भेदने में
किसी के सफल होने का
आज तक कोई प्रमाण नहीं मिला है …!
फिर केवल मार्ग के चुनाव पर द्वेष?
क्यों???

वास्तव में लक्ष्य पाना ही जिनका उद्देश्य है
उन्हें अपने-अपने लक्ष्य और मार्ग के अतिरिक्त
दूसरे के लक्ष्य और चुने हुए मार्ग पर
विचार और विवाद करने की अपेक्षा
अमन, शांति और खामोशी से
अपने-अपने मार्ग पर पर बढ़ते रहना चाहिए!
शायद इस तरह
अपने लक्ष्य पर ही ध्यान देने से
लक्ष्य प्राप्त हो सके!

इस तरह वांछित लक्ष्य प्राप्त होगा या ना होगा
मैं नहीं जानता ….किंतु
इतना अवश्य दावे से कह सकता हूँ
कि इस से जीवन यात्रा
अवश्य माधुर्यमयी हो सकेगी!
अनंत काल से निरंतर चलायमान,
सांसाारिक रथ की इस जीवन यात्रा का,
अंत तो सुनिश्चित है ही…
गंतव्य अज्ञात !!!
केवल पँहुचने वाला ही जान सकता है…
तब तो सभी मार्गों को सबके लिये
सहज / सुगम उपलब्भ रहने देना
ही श्रेयस्कर होगा ना!
जिसे जो सुरम्य लगे वो उस मार्ग पर चल पड़े!
दूसरे की राह में गड्ढे खोदे बिना
या खोदने की सोचे बिना….!
हरि ओम्!!!
#सत्यार्चन

 मैं हूँ या मैं नहीं हूँ!!!

-: मैं हूँ या मैं नहीं हूँ!!! :-
ONS के हीरो की तरह

सब लोग मुझे ही दोष दिए जा रहे हो !

समझा करो!

जोड़े सारे वही बनाता है!

बस किसी-किसी को किस्मत में

पूरा कुछ भी नहीं ही मिलना लिख देता है वो —-

मुझे भी,

कभी कभी बहुत स्वादिष्ट भोजन

टुकड़ों टुकड़ों में देता है!

अब तक, जो भी हक मिले

लड़ झगड़ कर हथियाने से

टूटे फूटे टुकड़ों में…

मेरी लहूलुहान हालत में मिले !

मेरे अपनों की

दुलार भरी देखभाल ने

जिस्म पर चोटों के निशान तक

बाकी ना रहने दिये !

बस मेरे या

किसी अपने के भी जेहन में

दिल की देखभाल का

खयाल ही ना आया!

कतरा कतरा रिसते रहा दिल —

आब एक भरे पूरे बेदाग शरीर में

पेसमेकर से दिल वाला

मैं

समर्पित हूँ उनके प्रति

जिनका मुझपर अधिकार है!

कहना मुश्किल है

कि

 मैं हूँ

या

 मैं नहीं हूँ!!!

#सत्यार्चन

आइये अपने देश की खातिर कुछ लिखें !!!

आपको हमको सब हिन्दी जनों को सोचना है तय करना है कि अलग-अलग प्रयासों को मरते देखना है…जिससे लेखक और पाठक दोनों को वांछित की प्राप्ति नहीं हो पाती …. या एक दूसरे का साथ देकर हिन्दी को सश…

स्रोत: आइये अपने देश की खातिर कुछ लिखें !!!

One day, a couple of decades back, I was watching a Bollywood movie at a neighbor’s place. The story was of an estranged couple and their son who is diagnosed with a terminal illness. When the man, with whom the child lives, learns of his son’s illness, heartbroken, he goes to convey the same to his ex-wife, who by the way, […]

via Disconnect — Shail’s Nest

ऐ दिल…!

ऐ दिल…!
काश ! कोई होता—
जिस से ,
मैं भी कह लेता
दर्द अपने —
तो जी लेता !

भीड़ में अकेले
यूँ ही जीते हुए
अपने अश्क आप ही
पीते हुए
तो जिया नहीं जाता ना !

संघर्ष जीवन का
करते सभी हैं
प्रयासों में घायल
होते सभी हैं
पर अपने जख्म आप ही
सहलाते हुए
दर्द में अपने आपको
बहलाते हुए
कोई कब तक जिये ?
क्यों कर जिये?

ऐ दिल !
पागल!
पन्ख पसार अपने
उड़ान भर
मनचाहे नीड़ के मिलने तक
या अपनी सांसो के थमने तक
लम्बी ऊँची उड़ान भर——
जा भुला दे
जो पीछे छूट गया
अन्धेरी रात का दुःस्वप्न
जो टूट गया

प्रतीक्षित होगा
कहीं तो कोई
तेरे लिए !
कहीं तो
कभी तो
होगा

नवविहान!

‪#‎सत्यार्चन

Foto Friday 128: The perfect spot

Here, beneath this tree Luci beside me Kindle full of unread books What more could I ask…? < < < < Well, maybe a bird or two singing on the branch above?  😉 ©Shail Mohan 2016

स्रोत: Foto Friday 128: The perfect spot