पर उपदेश…

पर उपदेश…

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे ….
जे आचरहिं ते नर ना घनेरे
– (गोस्वामी तुलसीदास जी)” ने कहा है …
इस चौपाई में वर्णित में से केवल दो तीन
 तथाकथित धर्मगुरु जेल  जा सके हैं
शेष स्वच्छंद कार्यरत हैं…
उन्होंने धर्माडम्बर को ही विलासिता पूर्ण जीने का व्यवसाय बना रखा है…!
आम जन भी धर्माचरण से अधिक धर्माडम्बर,
और उनके पक्षधरों के पीछे चलने में विश्वास रखते हैं !
अधिकांश आमजन, वास्तविक धर्म से अपरिचित रह,
 स्वयं धर्माडम्बर में स्वयं को नष्ट-भ्रषट करने में लगे हैं…
 सभी धर्मों का एकरूप,
संक्षेप में धर्माचरण जनना चाहें तो बस इतना है कि
“कभी किसी प्राणी को
अपरिहार्य हुए बिना
शारीरिक या मानसिक
कोई भी कष्ट देने का कारण मत बनो ! “
यही सन्मार्ग है !
में लिखित शब्द अक्षरशः सत्य हैं!
मैं भी मानता हूँ कि सामाजिक जीवन में रहते हुए,
सन्मार्ग का अनुसरण बहुत कठिन है….
किन्तु क्या हम लोग केवल सरल मार्ग पर चलने को ही
जीवन की सफलता मान प्रसन्न हो सकते हैं?
मैंने कठिनाइयों से सामना कर सन्मार्ग पर बने रहने का दृढ़ निश्चय किया
थोड़े ही समय जूझने के बाद,
हर कठिन सहज होता गया!
अब कठिनतम के स्वागत को सदैव तत्पर हूँ !
#सत्यार्चन
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मुझे उपदेश का अधिकार नहीं?

मुझे उपदेश का अधिकार नहीं?

 मेरे सुझावों/ संदेशों को अव्यवहारिक मान सकते हैं ..

इसीलिये यह अग्रिम स्पष्टीकरण देना अपना कर्त्तव्य समझ प्रस्तुत कर रहा हूँ } –

साथ ही एक निवेदन भी कि –

“उपदेशक के व्यक्तित्व से अधिक सन्देश की उपयोगिता को महत्त्व देना चाहिए ”
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –
पर उपदेश कुशल बहुतेरे …
हममें से अधिकांश
किसी उपदेश की प्रतिक्रिया में
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखित
उक्त पंक्तियाँ दोहरकर
उपदेशक पर अव्यावहारिक होने का दोष मढ़ते रहते हैं .
मजेदार बात यह है कि
आधी चौपाई ही प्रचलित है
पूरी चौपाई कम ही लोगों को याद आ पाती है –

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर ना घनेरे ”
पूरी चौपाई मालूम भी हो जाए तो
यही समझा जाता है कि
खुद अपने उपदेशों पर आचरण करने वाले कोई नहीं होते !
किन्तु ऐसा समझना कितना ठीक है ?
सन्देश तो यह है कि 

“दूसरों को उपदेश देना तब ही ठीक है जब उनका अनुपालन उपदेशक स्वयं करता हो!”

आमजन सोचता है  हम आम हैं , खास नहीं !
और हमें खास होने की आवश्यकता ही क्या है ?
आप अपने आदर्शों का पालन करने स्वतंत्र हैं 

किन्तु मुझे आदर्श आचरण करने की क्या आवश्यकता है !

आज का उपदेशक स्वयं को विशिष्ट मानकर

सामान्य जन से अनुपालन की अपेक्षा में उपदेश देता है

और आमजन स्वयं को किसी आदर्श के अनुपालन का अधिकारी ही नहीं मानता !

इसीलिये जानने वालों की, लिखाने वालों की संख्या तो

दिनों दिन बढ़ रही है !

मगर मानने वाले ढूढ़़ना कठिन हो गया है!

जबकि मेरे किसी भी ब्लॉग पर कहीं भी लिखा गया

कोई भी व्यक्तिगत या सामाजिक सुझाव
ऐसा नहीं है जिसका अनुपालन मैं स्वयं नहीं करता !


कारण मेरे कुल के आदर्शवादी संस्कार होंगे शायद !

निश्चय ही आसान नहीं होता कि
जिन आदर्शों का हम समर्थन करें
उन्हें अपनाएँ भी
किन्तु
सरल तो कुछ भी नहीं!
जो जितना कठिन कार्य होगा
उसका प्रतिफल भी उतना ही सुखकर होगा !

मेरी जीवनचर्या के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ .
इस उद्देश्य के साथ कि मेरे जैसा “आम आदमी” भी ऐसा है .
तो हर कोई हो सकता है !

मैं मेरे देश से प्रेम करता हूँ इसीलिये
क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता का खुलकर विरोध करता हूँ !

.

{मेरे लिए भारत देश मेरा बहुत बड़ा मकान है जिसमें
मेरा निवास भी है, कार्यालय भी, बगिया भी ,खेती – बाड़ी भी
केरल,कर्नाटक , तमिलनाडु, आन्ध्र और महाराष्ट्र, गुजरीत मुख्यद्वार से लगे कार्यालय एवं बैठक हैं,
दक्षिणी प्रदेश में लान, बाग़, बगीचे और जलनिधि हैं ,
पूर्वोत्तर पिछवाड़े का कछवारा है,
पंजाब, हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड आदि मेहमानखाने { गेस्टरूम }
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान , बिहार आदि प्रदेश
शयन कक्ष ,भोजन कक्ष ,रसोई आदि जरुरी हिस्से हैं .}
.

जितने उपलब्ध हो सके विभिन्न धर्म के ग्रंथों को पढ़ने / समझने का प्रयास किया
किसी भी भारतीय {हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई , बौद्ध, जैन आदि } धर्म में
एक भी असंगत बात नहीं मिली सभी में उचित आदर्शों के पालन के सन्देश मात्र
किसी धर्मं में एक भी शब्द मानवता विरोधी नहीं मिला .
.
इसीलिये सभी धर्मों का सामान रूप से आदर करता हूँ
.

मेरा परिवार

– जातपात पूछकर किसी से किसी तरह का व्यवहार नहीं करता !
– ना ही जाति के आधार पर व्यवहार परिवर्तन !
– दीपावली पर दीपमालिका तो सजाता है मगर
पटाखों पर खर्च करने के स्थान पर अनाथालयों , वृद्धाश्रमों में सामर्थ्यानुसार फल आदि पंहुचाता है !
– भिखारी को नकद भीख ना देकर भोजन सामग्री ही देता है !
– किसी भी धार्मिक समारोह {गणेशोत्सव , दुर्गोत्सव जैसे } में चंदा नहीं देता किन्तु
श्रद्धानुसार / सामर्थ्यानुसार पूजन /हवन /प्रसाद सामग्री का योगदान करता है !
– होलिकोत्सव पर कोई भी रासायनिक रंगों का प्रयोग नहीं करता !
– रेलवे स्टेशन आदि सार्वजानिक जगहों पर कचरा पेटी थोड़ी दूर पर भी हो तो भी प्रयोग करने पूरा प्रयत्न करता है !
– देवी देवताओं की तस्वीरों सहित पैकिंग वाले उत्पाद ,अगरबत्ती/ धूपबत्ती आदि पूजन सामग्री भी, खरीदने से बचता है !
– आर्थिक असमर्थता के वर्ष छोड़कर प्रतिवर्ष किसी योग्य निर्धन छात्र /छात्रा को शिक्षा सामग्री, फीस आदि की सहायता करता है !
– परनिंदा रस परिचर्चा में योगदान नहीं करता !
-अपनों की प्रगति में अपनी प्रगति सा प्रसन्न होता है !

-विरोधियों की प्रगति से आहत नहीं !
– केवल कार्यों का विरोध करता है व्यक्तियों का नहीं !
– हमारा कोई दुश्मन नहीं !
– किसी अन्य के ज्ञात गुप्त प्रकरणों / शर्मिंदगी के कारकों का प्रचार प्रसार नहीं करता !
– पानी के दुरूपयोग को निरुत्साहित करने प्रयासरत रहता है !
– बेटा – बेटी – बहु की समानता का समर्थक है !
(मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर बेटी नहीं जन्मीं तब किसी अनाथ को गोद लेने का २० वर्षों तक असफल प्रयास किया
अनाथालयों ने या तो एक संतान के होते हुए दूसरी को गोद ना दे पाने की कानूनी मजबूरी कह टाल दिया या
बड़ी राशी के योगदान की शर्त रखी. मैं दोनों तरह से अयोग्य था. अब बच्ची की जिम्मेदारियां पूरी कर सकने योग्य
उम्र शेष नहीं लगती . इसीलिये इस कमी के साथ रहने की आदत डाल ली है .
हाँ बेटे और सजातीय/ विजातीय बहु दोनों हमारे लिए एक समान मान्य हैं)
.

कैसे किया ? क्या खोया ? क्या पाया ?

.

एक दिन में नहीं हुआ सबकुछ .
मैं शुरुआत से ऐसा ही नहीं हूँ
मैंने भी अपरिपक्वता की आयु में पिताजी से असहमति जताई है .
मैं भी पिताजी के आदर्शवादिता वश आर्थिक अभावों से आक्रोशित रहा हूँ
किन्तु समय के साथ साथ पुस्तकों और परिचर्चाओं से परिपक्वता बढ़ती जा रही है,
और ईमानदारी से परिपूर्ण आदर्शों भरा जीवन जीने का वास्तविक सुख उठाकर
मेरे साथ साथ मेरी पत्नी, मान्य बेटियाँ और बेटे भी गौरवान्वित हैं !
मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे आदर्शों के पालन में
मेरी पत्नी और बेटों के साथ साथ नवसम्मिलित बेटियों का भी समर्थन और सहयोग प्राप्त है .

पत्नी वैवाहिक जीवन कि प्रत्येक वर्षगाँठ के साथ साथ और अधिक अनुसारी होते होते
२३ वे वैवाहिक वर्ष तक आदर्शवादिता में मुझसे आगे निकल चुकी हैं .
यही हाल बेटों का है .

जैसे मैंने मेरे पिताजी के सिद्धांतों को पाला
मेरे बेटे मुझसे अधिक अच्छी तरह
मुझसे अपेक्षाकृत बहुत कम आयु में
उन्हीं आदर्शों को प्रसारित कर रहे हैं .

क्या खोया ? क्या पाया ?

-मेरे स्कूल में दाखिले के समय मैं बहुत शर्मीला था
जैसे तैसे पहली कक्षा में दाखिला हुआ
छोटे से गाँव के छोटे से सरकारी प्राइमरी स्कूल में .
वहां के हेड मास्टर भी सिद्धांतवादी ही थे
साल भर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद
परीक्षा में जाने क्या हुआ था मुझे
मास्साब के बार बार कहने पर भी कि “कहानी सुनाओ नहीं तो फेल हो जाओगे ”
मैंने कहानी नहीं सुनाई तो नहीं सुनाई ,
और मैं फेल हो गया
पिताजी के साथियों ने बहुत कहा
“बड़े बाबू आप जाकर मिल लो,

मास्साब आपकी बात रखेंगे,

बच्चे का साल बच जाएगा ”
मगर पिताजी को पढ़ाई में पक्षपात पूर्ण परिणाम पसंद नहीं था
अगले ही वर्ष से मुझे स्वयं भी घर पर पढ़ाई में मदद करने लगे
और तब से ही हर साल हर कक्षा में मेरा परीक्षा परिणाम सर्वप्रथम रहने लगा था .
मैंने एक साल खोया था किन्तु जो पाया वह तो वर्णनातीत है …

– मेरे विवाह के बाद पत्नी से पहले संवाद में
पत्नी ने पूछा “मुझसे कितना प्यार करते हो ?”
मेरा उत्तर था

“हम आज पहली बार मिल रहे हैं… अभी तो एक दुसरे को ठीक तरह देखा भी नहीं…
अभी तो प्यार का जन्मना भी शेष है ”

उन्हें अच्छा नहीं लगा  “क्या यह काफी नहीं कि हम पतिपत्नी हैं ? ”

मैंने समझाने का प्रयास किया “हम पति पत्नी हैं यह हमारा रिश्ता है

किन्तु किसी भी रिश्ते में प्यार का पल्लवन एक दूसरे के प्रति किये जाने वाले व्यवहार से होता है ,

आप मेरी पत्नी हैं जिस तरह मैं आपसे और आप मुझसे व्यवहार करेंगी उसी तरह प्रेम बढ़ेगा ”
उन्हें इस बात पर मुझसे सहमत होने में २० वर्ष लग गए किन्तु
आज हम दोनों मिलकर ही पूर्ण हैं , एक दूसरे के बिना, दोनों ही आधे हैं .
वो एक विदुषी महिला हैं किन्तु मेरी और उनकी विचारधारा ठीक विपरीत थी
दोनों ही अपूर्ण , दोनों ही दोष सहित किन्तु
दोनों के विचारों के मेल से एक नयी विचारधारा का जन्म हुआ

और आज दोनों मिलकर एक सशक्त दंपत्ति !
-जब जिसके लिए जो कर सकते थे
हम करते रहे
परिणामतः हमारे नाम किसी बैंक में कोई फिक्स डिपाजिट नहीं ,
कोई और नगद निवेश भी नहीं !
किन्तु इस रास्ते पर चलते ,

हममें से हर एक के पास, अपने-अपने सम्पर्कों के, अपनेपन की अनेकीनेक फिक्स डिपाजिट हैं.
इनका पता तब चला जब विगत २ वर्ष (
2008-09) अस्वस्थता वश अवैतनिक अवकाश पर रहा !
मैं मेरे माता पिता का एकमात्र पुत्र और ३ बहनों का अकेला भाई ‘ था ‘
किन्तु आज मेरे कम से कम ५० ‘सगे भाई’ तो होंगे ही !
इतनी ही बहनें और बेटियां भी !
भले मैं धन संपन्न नहीं ,
किन्तु सुखी-समृद्ध अवश्य हूँ !
मुझ सी समृद्धि धन से नहीं मिलती !
धन की चाह
“साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ , साधू ना भूखा जाय ”
जितनी ही है!
यानी प्रभु इतना अवश्य दे देते हैं जिसमें
कुटुंब की आज के समय की आवश्यकताओं की पूर्ती हो जाती है.
और कितना चाहिए ?
क्योंकि
“पूत सपूत तो क्यों धन संचय
पूत कपूत तो क्यों धन संचय”
अति प्रासंगिक है .
मैं और मेरे परिजन
स्वयं को समृद्ध ही मानते हैं !
जिस तरह मैं स्वयं सुखी हो पाया हूँ ,
जिस मार्ग पर चलकर हो पाया हूँ
केवल वही अनुभूत उपदेश / सलाहें / सन्देश
मेरे लेखों के माध्यम से देने संकल्पित हूँ !
जिन्हें भी अन्यथा प्रतीत हो उनके लिए यह लेख लिखा है
फिर भी प्रश्न शेष हों तो प्रतिक्रिया खंड में स्वागत है .
मेरा स्पष्टीकरण या क्षमा याचना अवश्य वहां मिलेगी !

आशायें

आशायें

क्यों इतना सीमित सोचते हो ….
अंदाजों की / आशाओं की/ आकांक्षाओंं की सीमा छोटी क्यों हो ….
हो सकता है कोई दीप दृढ़ विश्वास लिये प्रतीक्षित हो तुम्हारे लिये…
तुम से आगंतुक पथिक की राह जगमग करने…
कहीं कोई बादल आल्हादित हो रहा हो
केवल अंक में भर नखसिख स्नेहशिक्त करने का सोचकर.. ….
कोई समुद्र बांहें फैलाये बैठा हो …
महावेग से आते दरिया का वेग ….
अपने में समाहित करने को आतुर ….
क्यों ना सजायी जायें वे आशायें …
जिनका एक कतरा भी मिल जाये
तो जीवन सम्पूर्ण हो जाये
जिसके पूरे होते ही ..
विगत की समस्त न्यूनतायें
मिल-मिलाकर भी …
नगन्य ही रह जायें…. ….
अनंत…
हाँ अनंत तक बिछी हैं
सम्भावनायें…..
-सत्यार्चन

अंधेरों पर हँसता हूँ!

अंधेरों पर हँसता हूँ!

अंधेरे सारी रात
बेसुरे गीत गाते
सूरज की आहट से
कौनों में छुप जातेे
सूरज का ऊगना ही,
याद रखा करता हूँ
ऊधमी अंधेरों पर,
मैं अक्सर हँसा करता हूँ
ये शैतान अंधेरे क्यूँ
बाज नहीं आते
जुगनूओं के सामने तक
जो ठहर नहीं पाते
सूरज के ऊगने को
रहते हैं झुठलाते !
-सत्यार्चन

नोटबंदी एक धर्मयुद्ध -साप्ताहिक विचार- 2

नोटबंदी एक धर्मयुद्ध (साप्ताहिक विचार- 2)

अपने ही कुलपुरुषों के विरुद्ध धर्मयुद्ध /अधिकार युद्ध/वर्चस्व युद्ध लड़ने

तत्पर फिर भ्रमित होते अर्जुन को

श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश से प्रेरित कर

सदाचार को पुनर्प्रतिष्ठित कराया!

.
श्रीकृष्ण ने इतने विस्तृत कर्मयोग, ध्यान योग, ग्यान योग के वर्णन में

व्यर्थ समय और ऊर्जा नष्ट की!

वे अर्जुन से सगे संबंधियों को छोड़

उनकी सेना और समर्थकों का संहार करा सकते थे!

सगे सम्बन्धी सेना/समर्थक बिना,

बलहीन होकर शरणागत हो ही जाते!

..

मेरे श्रीकृष्ण की आलोचना करने से आप आक्रोशित हो रहे होंगे ना!

किन्तु भारत के सत्ताधारी दल विगत 70 वर्षों से यही करते आ रहे हैं!

वर्तमान धर्मरक्षक सत्ताधारी दल हो या पूर्व धर्मविहीन सत्ताधारी दल

सब जनहित नामक धर्मयुद्ध का उद्घोष कर

 अधर्मियों पर कार्यवाही का  प्रदर्शन करते आ रहे हैं!

ऐसे उद्घोष के समय भी वे  अपने-अपने सगे को छोड़कर

शेष पर ही कार्यवाही होना सुनिश्चित करते आये हैं!

वर्तमान में अधर्म से अर्जित  काले धन वालों के महलों में

दिखा-दिखाकर हैंडग्रेनेड्स और सुतली बम दोनों डाले जा रहे हैं

अपने सगे / समर्थक/अनुबंधितों  के बाड़े में उछाले जा रहे

सभी हैंडग्रेनेड्स के पिन नहीं खींचे गये हैं,

आंगनों में सुतली बमों की आवाज गूंज रही है

दूर से देखती जनता इस दृश्य को देख गदगद है!!!

….

लेखक सकारात्मकता का प्रबल समर्थक होने के कारण

इन सब विसंगतियों के बाद भी अत्यंत प्रसन्न है!

क्योंकि मुट्ठीभर सगे संबंधियों को छोड़ शेष तो काले से सफेद हो रहे हैं!

और साथ ही  इस तथ्य से कि

भारत का

“जन-जन जाग रहा है!”

“भारत जाग रहा है!!!”

-सत्यार्चन

चक्रवर्ती सम्राट!

चक्रवर्ती सम्राट!

सफल चक्रवर्ती सम्राट जैसे राजनीतिज्ञ होने के गुर-
1- “किसी अकमनीय अकोमलांगी का कमनीया दिखने जैसा,
किसी भी तरह, सबके आकर्षण का केंद्र होना !”
2- ऐसी (अ)कमनीया के जिसके अनेक प्रेमियों में से प्रत्येक को उस कमनीया का केवल अपने प्रति समर्पित होने का स्थायी भ्रम बनाये रखने जैसा सफल छल कर सकने की योग्यता पाना!
3- ऐसी (अ)कमनीया जिसके प्रेमियों में से किसी को कभी उसका विवाहित (स्वार्थ नामी पति के साथ) और संतान सहित (लालसा, कामना, आराधन-प्रिय आदि का) होना पता ना लग सके जैसी गोपनीयता बनाये रखने की कला में सिद्धहस्त होना!
4- ऐसी (अ)कमनीया, जिसके हर एक प्रेमी को, उसके साथ स्वप्निल मधुर मिलन के किये पिछले अनेक वचनभंग के बहानों में विश्वास स्थिर रहे, और इसके पश्चात वह प्रेमी अगले वचन पर पहले से अधिक बढ़चढ़कर स्वप्न सँजोने लगेे ! ऐसी उच्चस्तरीय बहलाव की कला में पारंगत होना!
( पिछले क्रियांवयन का हिसाब देने की आवश्यकता ही आन पड़े तो असंभव से दिखते अगले वादों को इतनी वजनदारी से सामने रखना कि लोग पिछले
किये-अनकिये की चर्चा करना ही भुला दें! )
5- अगर आप अपने आपको यहाँ तक विकसित कर पहुँचा सकें तो इस क्षेत्र में सफल होने के लिये आवश्यक ‘सद्गुण’ निश्चय ही आपमें नैसर्गिक रूप से पहले से विद्यमान होंगे ही और दुनियाँ की कोई ताकत आपको चक्रवर्ती सम्राट होने से नहीं रोक सकेगी!!!!

#SatyAlert -2

#SatyAlert -2

मैं आप  सबके उत्साह और समर्पण का सम्मान करता हूँ मित्र ….

किन्तु मुझे भविष्य के दर्पण में इसके साथ-साथ और भी बहुत कुछ स्पषट सा दृष्टिगत है यथा-

1 – माननीय नरेन्द्र मोदी जी 2021 तक निर्विध्न भारत की सत्ता की बागडोर सम्हाले रखेंगे!

2- सन् 2021 में वर्तमान मुद्रा परिवर्तन जैसे किसी विशेष निर्णय से उनके निकटजन ही उनके प्रबल विरोधी हो जायेंगे!

3- 2021 में मोदीजी राजनैतिक जीवन से स्वयं को सदा के लिये दूर कर लेंगे!

4- इसी वर्ष भाजपा का अंतर्विरोध भाजपा का विघटन करायेगा !

5-  2022 के प्रारंभ में मध्यावधि चुनाव दिख रहे हैं ! जिनमें  मोदी विहीन भाजपा का हश्र आज की कांग्रेस सा होगा!

6- कांग्रेस, या आआपा, या सपा, बसपा, जद, आदि वर्तमान बड़े दलों से अलग कोई नई पार्टी जिसका अभी अस्तित्व भी नहीं है सत्तासीन होगी!

7-  उस नवोदित शक्ति के नेतृत्व में, मोदीजी जैसी तेजी से सत्ता-संचालन की भूख होगी जिससे 2027 तक भारत विश्व की सर्वोपरि शक्ति के रूप में स्थापित होगा!

मेरी अन्य, विगत सत / असत प्रमाणित, जैसे 2014 के चुनावों में भाजपा का अकेले स्पष्ट बहुमत पाना,  ओबामा के बाद अमेरिका का पतन होना जो 2012-13 में लिखा था, होता दिख रहा है, चीन में आंतरिक विद्रोह होने को है, आदि

भविष्यवाणियां मेरे अन्य ब्लाग https://swasaasan.blogspot.com के ‘सत् दरबार’ पृष्ठ पर उपलब्ध हैं!

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हमारे सभी ब्लागर मित्र भी ध्यान दीजिये … इस मंच का भी लाभार्जन कर सकते हैं…

नियुक्ति… फिर पदोन्नति में आरक्षण!

         अभी-अभी,  दो-दो माननीय उच्च न्यायालयों के,  एक जैसे विषय पर,  दो महत्वपूर्ण  निर्णय,  दोनों राज्यों के शासन के विरुद्ध आये! पहला आज राजस्थान उच्चन्यायालय ने राजस्थान सरकार को संविधान में आरक्षण का 50% तक सीमित किये जाने का हवाला दे गुर्जर/ पाटीदार आरक्षण को अवैध करार दिया… ! दूसरे में, विगत दिनों, मध्यप्रदेश शासन के पदोन्नति में आरक्षण को अनुचित ठहराया गया है!
इन  निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में कुछ बातें स्पष्ट हुईं और कुछ पर  विचारना आवश्यक हो गया है!
इन निर्णयों से स्पष्ट है कि या तो, 70 सालों के अनुभवी विचारविमर्ष के बाद,  उच्च न्यायालय, पहली बार संविधान की व्याख्या में सक्षम हुए हैं या फिर समर्थ को संविधान की धाराओं की व्याख्या अपने अनुरूप करने / कराने से रोकना संभव नहीं है (दोनों प्रदेश की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय में यही करने का प्रयास कर रही हैं / करने जा रही हैं) !
माननीय न्यायालय के निर्णय से पता चला कि सरकारें,  चुनावी तुष्टीकरण के लिये,  संविधान के विरुद्ध सामयिक आचरण करती रहती हैं … क्योंकि शासकीय  विधाई योजनाकारों में सर्वोत्तम कानूनविद सलाहकर्ता भी होते हैं जो सांवैधानिक सीमाओं को जानते तो अवश्य हैं किन्तु अपने शासक को उनमें बँधने की सलाह से शायद दूर ही रहते होंगे…!
कुछ भी हो लेकिन आरक्षण अधिनियम को पुनर्व्याख्यायित करना /  इसपर पुनर्विचार करना आवश्यक हो गया है!
 विचारणीय है कि यदि वर्तमान आरक्षण प्रणाली उन्हीं वंचित आरक्षितों के हित-सम्वर्धन में असक्षम हो चुकी है, जिनके उन्नयन के लिये इसे लागू किया गया था, तो इसे निरंतर जारी रखने का क्या औचित्य है!
क्या यह राजनैतिक तुष्टिकरण का वीभत्स उदाहरण मात्न शेष नहीं रह गया है???
सविनय अनुरोध है कि शासन एक सर्वेक्षण कराकर देख ले कि-
1 – आरंभ से अब तक कितने प्रतिशत आरक्षित वर्ग के परिवार पहले पहल वर्तमान आरक्षण नीति से लाभान्वित हुए हैं!
2- कितने प्रतिशत गैर सुविधा भोगी आरक्षित परिवार के सदस्यों, को विगत ३ दशक में, वर्तमान आरक्षण नीति का लाभ मिल सका !
3- दूसरे ऐसे जरूरतमंदों के लाभार्जन के प्रतिशत का ग्राफ प्रति वर्ष किस तेज़ी से नीचे गिरते जा। रहा है!
मेरा दावा है कि सर्वेक्षण के परिणाम में, विगत वर्ष तक ही वास्तविक दलित / वंचित लाभार्थी १ प्रतिशत से भी कम परिलक्षित होंगे‍!
और
99% सुविधाभोगी आरक्षित कुल में जन्मने के कारण मात्र, निर्लज्जता पूर्वक वंचितों के अधिकार को लूटने वाले निकलेंगे!
साथ ही वर्तमान आरक्षण प्रणाली से क्या यह परिलक्षित नहीं होता कि –
1- आरक्षण व्यवस्था का आधार, आरक्षितों की अनारक्षितों के समकक्ष योग्य होने में नैसर्गिक अक्षम मान लेना है!
और यदि ऐसा है तो भारत के अतिमहत्वपूर्ण एवं महत्वपूर्ण शासकीय पदों पर कार्यान्वयन का दायित्व स्वयं शासन द्वारा
अ-सक्षम  निष्पादकों द्वारा कराया जाना सुनिश्चित किया गया है!
2 – पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था से यह प्रमाणित किया जाने का प्रयास है कि, संदर्भित आरक्षित वर्ग,  सुविधा पाकर भी स्वयं को सुयोग्य बनाने में अक्षम है और साथ ही भारत की संसद सहित समस्त महत्व के शाशकीय पदों पर उपलब्ध अधिक योग्य व्यक्तियों की अपेक्षा बहुत कम योग्य व्यक्तियों से दायित्व निर्वहन कराया जा रहा है!
साथ यह भी ध्यान देने योग्य है कि ऐसा किया जाकर राजनैतिज्ञों ने राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि में स्वयं माननीय बाबा साहब अंबेडकर के सुझाव को तोड़मरोड़ डाला है! माननीय बाबा साहब के सुझाव में केवल तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग के शासकीय पदों पर 33% नियुक्तियां आरक्षित श्रेणी से की जाने का प्रस्ताव था! यह भी ध्यान देने योग्य है कि उस समय ऐसी भर्तियों के लिये लिखित या मौखिक परीक्षा का प्रावधान ना होकर सक्षम अधिकारी द्वारा, योग्यता मानदंड पूरे करने वालों की सीधे  नियुक्ति ही की जाती थी!
 3- आरक्षण की मूल अवधारणा के अनुरुप प्रतियोगिता होने पर,  विशिष्ट अनुसूची में वर्गीकृत जातियों के, सफल प्रत्याशियों की संख्या का एक निश्चित प्रतिशत तक होना, सुनिश्चित करना प्रस्तावित था,  इसमें अनारक्षित के अंतिम सफल प्रत्याशी के समकक्ष या अधिक योग्यता अंक लाने वाले को, आरक्षित में ना मानने संबंधी, कोई निर्देश नहीं था!  किंतु निहित राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि की प्यास ने आरक्षण सूची में सम्मिलित रहने के लिये अनारक्षित से कम योग्य सिद्ध  होने को आवश्यक बना दिया!
इसी कारण आरक्षित वर्ग, आज भी अनारक्षित के समकक्ष योग्य होने में, आरक्षण का लाभ छिनने के भयवश आनाकानी कर रहा है!
4- अनारक्षित से न्यून योग्यता की इसी आवश्यकता की अवधारणा के चलते अनुसूचित जाति/ जनजाति, ओबीसी, महिला, पूर्व सैन्य कर्मी / आश्रित, तलाकशुदा / परित्यक्ता महिला, स्व.सं.सै. आदि के बाद सर्वथा योग्य और पूर्ण निर्दोष सवर्णों को 10%  एवं सवर्ण पुरुषों को 5%  से भी कम संख्या में अवसर उपलब्ध हो पा रहे हैं…!
5- भारतीय आरक्षित वर्ग के आरक्षण का लाभ छिनने के भय से अयोग्य, एवं अनारक्षित अवसर की अनुपलब्धता से  कुंठित कंधों पर भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का दायित्व है!
 “हमारे योग्य कर्णधारों को मातृभूमि के प्रति समर्पण का मूल्य स्वयं से कम / बहुत कम  योग्य के अधीन रहकर जैसे-तैसे जीवनयापन करने या अपनी (अ/न्यायी?) मातृभूमि के प्रति समर्पण को भूल योग्यता का उचित मान करने वाले देश में रोजगार तलाशने की विवशता हो गई है!”
आज आरक्षित वर्ग के मेरे परिजनों के उचित उत्थान पर विचार की आवश्यक हो गया है. मुझे लगता है कि जिन जातियों / जनजातियों को वंचित माना गया है उनमें से वास्तविक वंचितों को चिन्हित कर उनका सर्वांगीण उन्नयन करने प्रारंभ से ही  उनकी  निःशुल्क स्तरीय आवासीय अतिरिक्त समर्पित व्यवस्था की जानी चाहिये जिससे वे अनारक्षितों से प्रतियोगिता में बड़े अंतर से और ससम्मान आगे निकल सकें! ना कि जातिप्रमाण के आधार पर अयोग्य रहते हुए भी, योग्य अनारक्षितों का अधिकार छीनकर !
#सत्यार्चन