आओ हों स्थितप्रज्ञ!

आओ हों स्थितप्रज्ञ!

उत्सव है अनवरत•••! सत का! सत्कर्म का! न्याय का! सदाचार का! शुभ का! ममता का•••समता का••• वास्तविक क्षमता का•••!
क्योंकि #नियतिअबन्याय_पर है!

और

ब्रम्हानंदमय जीवंत का तो प्रतिपल ही उत्सव है!

इस स्थिति को पाने के बाद सब सम•••

“हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ”
और
“कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः”

दोनों ही कथन एक तो हैं•••
इसका पूरे मन से स्वीकार में रुकावट ही क्या है••• जीवन में घटित सभी प्रकार के दुख-सुख इन 6 (हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश) में ही तो समाहित हैं••• इनमें से प्रत्येक की प्राप्ति का प्रयास मात्र ही तो है हमारे अधिकार में••• परिणाम तो सदैव मूल्यांकनकर्ता के अधिकार में है••• यही तो “कर्म ही कर्त्ता (करने वाला) के अधिकार में है उसका फल कदाचित (अर्थात कुछ भी) हो सकता है, किन्तु फल पर अधिकार ना होने के विचार मात्र से भ्रमित (भयभीत) हो कर्त्ता का कर्म से ही विरक्त हो जाना तो उचित नहीं हो सकता ना!” के रूप में कहा है••• !
समस्या यह है कि हम जीवन में स्वयं ही विद्यार्थी, स्वयं ही परीक्षार्थी, स्वयं प्रश्नकर्त्ता, स्वयं पर्यवेक्षक, स्वयं निरीक्षक, स्वयं मूल्यांकक, स्वयं अंकेक्षक बनना चाहते हैं••• वह भी तटस्थता और निरपेक्षता की क्षमता बिना? कितना हास्यास्पद है ना?
(परीक्षार्थी के अधिकार में परिणाम की शिरोधार्यता या पुनर्मूल्यांकन की ‘प्रार्थना’, के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता••• फिर अंतिम परिणाम के बाद तो बिलकुल भी नहीं! या तो मूल्यांकन कर्त्ता से निराश हो भावी परीक्षाओं से पलायन कर या पुनः जुट जा और अधिक समर्पण के साथ •••! दोनों में से जो चुनना है चुन!)
स्वयंभू होने के भ्रम से उपजा अहंकार त्यागकर अपनी सीमितता के सच्चे अंगीकार में ही तो है स्थितप्रज्ञता!
और
स्थितप्रज्ञ स्वतः ही सर्वदा, सर्वथा ब्रम्हानंदमयी ही होगा!
बहुत कठिन नहीं है स्थितप्रज्ञता को पाना•••!
-सुबुद्ध

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जाग जरूर जाइये!

मेरे शोधों को सविस्तार जानने या मेरे इस कथन  की पुष्टि करने के लिए वेब सर्च पर मेरे नाम “SathyaArchan”  को ही खोज कर देख लीजिये ! कुछ लिंक्स भी अगले संदेशों में दे रहा हूँ•••  पुष्टि कर लीजिए किन्तु निवेदन है कि जाग जरूर जाइये!

मेरी प्रार्थना है कि ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करें!- “सुबोध ऋषि”
मैं सबके शुभ की कामना और प्रार्थना तो कर सकता हूँ किन्तु इस कामना की पूर्ति आपकी योग्यता पर निर्भर है•••! यदि आपमें प्राप्त सूचनाओं में से निरपेक्ष रह सत निकाल उपयोग करने की क्षमता है तो ठीक है अन्यथा भ्रामक  अपुष्ट सूचनाओं पर आपका अकारण विद्वेष, भ्रम, दर्प पालना भी प्रकृति  को रुष्ट करने के लिये पर्याप्त है और आप संकट में हैं! इसीलिए समय कुछ व्यवस्था बनाये रखने की विवशता से तो कुछ आदत से मजबूर मूर्ख, ऐसे संकटकाल में भी, अपने या अपनों के अज्ञान, अधर्म, असमर्थता को दूसरों पर मढ़ने में व्यस्त हैं ••••!
आप सबसे मेरी सविनय प्रार्थना है कि यह  समय अभिमान के परित्याग का है!  निरभिमान होने का है! अंतरदर्शन का है! आत्मावलोकन का है!अपने अकृत के स्वीकार का है! पश्चाताप का है! अपनी भूल सुधार की वचनबद्धता सहित क्षमायाचनाओं का है!  कीजिए क्योंकि आप वोरिस जानसन जी से अधिक सावधानी पूर्ण (मानव रचित) सुरक्षा चक्र में नहीं रहते••• यदि उन्हें कोरोना पीड़ित कर सकता है तो••• आप वोरिस जाॅनसन जी से अच्छी स्वास्थ्य सुविधायें नहीं पा सकते••• नियति के आगे वे भी विवश हैं••• उनके या  प्रिंस चार्ल्स के ऊपर खांसने/ छींकने की धृष्टता किसने  की होगी? किसकी क्षमता रही होगी   उन तक असंक्रमित किए बिना दूषित भोजन या वस्तुएँ पहुँचाने की?
यदि आपको लगता है कि आप उनसे अधिक अच्छे सुरक्षा चक्र में हैं तो अपने अधर्म,  अनाचार, दष्टतायें आगे भी करते रहिये या फिर कीजिये प्रायश्चित!
मेरे अपनों के अर्थात आप सबके हित में, मैं  जागृत अंतर्चेतना से प्राप्त संदेशों/ संकेतों को  सार्वजनिक करते आया हूँ! विगत सन् 2006 से प्राकृतिक प्रकोपों की पूर्वचेतावनी भी ट्विटर      #सतचेतक, #सत्यालर्ट, #SathyaAlert, #SathyAlert, #Satyalert पर  देते आ रहा हूँ••• प्रलय की आहट की चेतावनी व चिंता जताते आ रहा हूँ•••  आकृत के परित्याग एवं अनुकृत के अंगीकरण पर मेरा यू ट्यूब चेनल है! ‘ब्रम्हाकुमारी’ संस्था व फेसबुक के सहयोग से भ्रमित/  पीड़ित जनों का मार्गदर्शक हूँ!  रेकी के ग्रेट ग्रेंड मास्टर हमीरसिंह जी के मित्र वत सानिध्य से समृद्ध हुआ हूँ! सनातन के अतिरिक्त, सिख, जैन, बहाई, इस्लामिक, ईसाई व बौद्ध धर्माचार्यों से अनेक चर्चाओं से निकले निष्कर्षों को समेटे हुए हूँ! निज धर्म, कर्म व योग पर एवं वर्तमान पर मेरे शोधों को सविस्तार जानने या मेरे इस कथन  की पुष्टि करने के लिए वेब सर्च पर मेरे नाम “SathyaArchan”  को ही खोज कर देख लीजिये ! कुछ लिंक्स भी अगले संदेशों में दे रहा हूँ•••  पुष्टि कर लीजिए किन्तु निवेदन है कि जाग जरूर जाइये!
आज अभी बस इतना ही निर्देश अर्थात विनय  है कि-
1- यज्ञ, अग्निहोत्र या हवन या लोभान कीजिये! (24 घंटे में एक बार घर के आगे, पीछे, अगल-बगल जहाँ  जहाँ खुला है, तथा प्रत्येक कक्ष में एक साथ 5 से 10 मिनट धूपबत्ती से भी हवन का प्रभाव पाया जा सकता है!)
2- सर्दी जुकाम होते से प्राकृतिक चिकित्सा साधनों से शीघ्र से शीघ्र स्वस्थ होने का प्रयास कीजिये! अनार के 20 पत्ते+ बिही के 10 पत्ते+ 10 लोंग (यदि तीनों उपलब्ध हों तो उत्तम अन्यथा 2 या कोई 1 भी उपयोगी है) पानी में उबालकर इसकी भाप लीजिए और इसी पानी को गुनगुना होने पर इससे गरारे (गर्गल्स) कीजिए! इन तीनों में से कुछ भी ना हो तो विक्स, पुदीना, पिपरमिंट, काली मिर्च, हल्दी नीलगिरि के पत्ते में  से किसी भी एक को उबलते पानी में डालकर इसकी भाप ली जा सकती है नहीं  तो सादा पानी की ही सही भाप लीजिये!
3- कैसी भी अस्वस्थता होने पर सबसे बेहतर होगा कि आप अपने डाॅक्टर से इलाज लीजिए!
– सुबुद्ध सत्यार्चन 

UK PM Boris Johnson moved to ICU as coronavirus symptoms ‘worsen’
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Source : “Hindustan Times” via Dailyhunt

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बुद्धिहीन तनु जानिकै….


“बुद्धिहीन तनु जानिकै सुमिरों पवन कुमार…
बल बुधि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार!”

“अर्थात हे प्रभु मेरे भीतर बसे क्लेशों के कारक विकारों को दूर करने, औषध सवरूप मुझे;  बल, बुद्धि और विद्या प्रदान कीजिए!”

तो ले लीजिए ना आपके माता-पिता, गुरु- सज्जन, बंधु-बांधव, मित्र-सहपाठी, संगी-साथी, सहयात्री-सहचर अनेक रूपों में, समय समय पर विराजमान होकर प्रभु आपके पास आकर अनेक अवसरों पर अनेक प्रकार से आपका शुभ करना चाहते हैं••• आपको देना चाहते हैं!

*यही बात गोस्वामी तुलसीदास जी ने अनेक तरह समझाने का प्रयास किया है…..!
*”तुलसी या संसार में सबसे मिलिये धाय! ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाये…..!”*

*”जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!*

*जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलत ना कछु संदेहू”*
(जिसमें आपकी अनुरक्ति होगी वही आपके मानस पटल पर सदैव उस्थित रहेगा और उसकी प्राप्ति भी होगी ही होगी! शुभ का चिन्तन है तो शुभ और अशुभ का है तो अशुभ!)
हनुमान जी भी तो देना चाहते हैं… ….किन्तु आप…. लेना भी तभी चाहते हैं जब; दारासिंह जी ही, हनुमान जी के गेटअप में पूरा मेकअप करके आपके बीच उपस्थित हो आपके शीष पर आशीष का हाथ रख दें!

…  और आप आपकी अकर्मण्यता व अज्ञानता को अक्षुण्ण रखते हुए कृतार्थ होने का अनुभव लें साथ ही अपने मित्रों परिचितों में आपको प्राप्त हुई कृपा का वर्णन कर कर के लोगों से कृपा पा लें…

होता भी यही है…

अगर आप एकाध प्रमाण अटैच कर सके तो फिर तो आपके लिए आपका ढोंग ही, विलासिता सहित, सम्पूर्ण साधन आजीवन  जुटाने का कारण बन जायेगा•••

फिर अकर्मण्यता के परित्याग के विचार की भी आवश्यकता ही क्या है! ऐसी अज्ञानता भी तो कितनी सुखकर है…. कौन ऐसे ज्ञान को पाने का प्रयत्न करना चाहेगा… जिसका मार्ग कष्ट पूर्ण तथा अंत भी कष्टरहित है या नहीं पता ही नहीं?कौन करना चाहेगा?
   इसीलिए ज्ञान-व्यान छोड़िए! आडम्बर का अनुसरण ही अधिक सुखकर है… ऐसा ही तो होते आया है….  हो भी रहा है… इसीलिए हर कोई… 33सों में से किसी ना किसी आदर्श के (या उनके दायें-बायें हाथ के) गेटअप में चमत्कारी भगवान बनकर, कृपा प्राप्ति के प्रमाण साथ लिये यहां वहां प्रदर्शित करते घूम रहे हैं!

…… हवा में से प्रसाद, ताबीज, पत्थर, प्रतिमा निकाल कर दिखाने वाले बाजीगरों के कदमों में मंत्री, संतरी, राजे, महाराजे बिछते भी आये हैं और मिटते भी…. उनका दृढ़ विश्वास होता है कि
जो मिला बाबा जी की कृपा से…
जो मिट गया वह राजा जी की गलती से…( सलाह दोनों में बाबा जी की…)
दोनों के ही करने वाले राजा जी….
सभी जीतें बाबाजी की कृपावश(?)
सभी हारें राजा की मूर्खता से…(?)
और इस तरह
बाबाजी जिंदाबाद थे !
बाबाजी जिंदाबाद हैं!!
और
बाबाजी जिंदाबाद…..
.
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.
रहेंगे ही रहेंगे…!

क्योंकि बल-बुधि-विद्या मांगते मांगते बर्षों बीतने पर जब प्रसन्न हो ‘वो’ देने तत्पर हो भी जाते हैं तो पहले वाले की पहली किश्त मिलते ही तुम… बौरा जाते हो…
ऐसे बौरा जाते हो….
भूल ही जाते हो कि बल की भी यह पहली/ दूसरी ही किश्त है जो मिली …. अभी तो बल की तक प्राप्ति पूरी नहीं हुई…
बुद्धि तो शेष है ही…
इन दोनों कृपाओं के उपयोग की विद्या भी
जिसके बिना ये दोनों ही कलायें घातक होने वाली हैं!

(शनिवार 04042020)

-सुबुद्ध सत्यार्चन

जी चाहता है…

होकर यायावर
घूमूं तब तक सारा संसार
जब तक कोई दरवाजा
स्वागतेय ना खुले
मेरे लिए

जी चाहता है
खुलकर
नथुने भर सांसे भरना
दीवारों से दूर
खुले में
कहीं मिल जाये ताजी हवा
कुछ दिनों के लिए…
जी आऊँ जी भर
फिर से
ताजा दम हो
पल-पल मरने के लिए….
.
जी चाहता है
अब
उड़ना
दूर तक
उन्मुक्त गगन में
बहुत दूर तक…
अंतरिक्ष तक
या उसके भी पार कहीं
.
जी चाहता है
निकल पड़ूं घर से
होकर यायावर
घूमूं तब तक सारा संसार
जब तक कोई दरवाजा
स्वागतेय ना खुले
मेरे लिए
जहाँ
हो कोई प्रतीक्षारत
मेरे लिए….
लिए अधझुकी प्यासी आंखें
बिन खुली बाँहों से आतुर
अंक में भरने को ….
– चर्चित चित्रांश-

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