कुर्बानी- नेकी के लिए!

अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…! जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें!

सभी मजहबों/ धर्मों की किताबों में लिखे वाकये (घटनाएं) वो नजी़रें हैं जिनको वक्ती हालात के हिसाब से आज, और आज से 1000 साल बाद भी, अमल में लाया जाना मुनासिब है और रहेगा …

इस्लामिक आस्था से जुड़ी, “कुर्बानी” भी एक ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है!

इस्लाम में कुर्बानी की शुरुआत का जिक्र, सर्वोपरि “हुजूर” के दरबार में उनके नबियों (फालोअर्स) के बीच सबसे काबिल होने / “हुज़ूर” के सबसे अजीज ओ करीब होने के दावे पर बहस चल रही थी! उन काबिलियत का दम भरने वालों की मौजूदगी में ही “हुजूर” ने एक उचित को चुनकर उनकी वफादारी साबित करने उन्हें एक इम्तेहान से गुजरने का मौका दिया! जिसके लिए उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने का हुक्म दिया गया…. बाकी नबियों ने गर्दनें झुका लीं मगर वे नबी पिता अपने बेटे की कुर्बानी देने, और उनके बेटे कुर्बान होने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गये!
हुजूर के दरबार में घटी इस घटना के दृश्य में पिता की आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की तलवार से कुर्बानी दी जाना और कुर्बानी के बाद पट्टी खुलने पर बेटे की जगह गर्दन कटे हुए बकरे का देखा जाना, बताया गया है!

इस बेहतरीन वाकये में एक से अधिक सीखें समाहित हैं…

1- तुम्हारे खैरख्वाहों /सरपरस्तों को जानो! उनके हुक्मों की, बिना किसी शक-ओ-शुबहा के बस तामील करो…! “
“जिनमें खैरख्वाही दिखती हो उनमें शुबहे कैसे देखे जा सकते हैं?”

2- अगर तुम सच्चे हो, ईमान पर हो और कभी भी, कहीं भी तुम्हें तुम्हारी सच्चाई का इम्तेहान देने कहा जाये, तो बड़े से बड़े इम्तिहान से गुजरकर दिखा दो कि तुम सच्चे हो!

3- नेकी की राह पर चलकर ही कबूल होने लायक इबादत की जा सकती है… नेकी की राह बेहिसाब कुर्बानियां चाहती है… इसीलिए नेकी के लिए कोई भी कुर्बानी छोटी है…!

रमजान में ईद-उल-फितर पर खूब जलसे किये फिर कुर्बानी मांगने वाली “ईद-उल-जुहा” आ रही है ! तो क्या हुजूर की नजरों में खुद को साबित नहीं करशा चाहोगे? क्यों! अब से हर “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम, नेकी के लिए, अपने आपकी कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! आज के हालातों में रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी से अच्छी और बड़ी कुर्बानी और क्या होगी? दीजिए…! रक्त बहाने के लिए नहीं… सहेजने के लिए हो…. आपकी कुर्बानी…. किसी की जान लेने नहीं ज़िन्दगी देने के लिए हो आपकी कुर्बानी…!

जरूरी होने पर जब औरों से आंखें, लीवर, किडनी, ब्लड, बांह, मांस, होंठ आदि लिए जाने में मज़हब आड़े नहीं आता है…. तो इत्मीनान रखिये… इनके दिये जाने में भी मज़हबी बंदिशें नहीं हो सकतीं!

चाहें तो अपने हाफ़िज़/ मौलवी/ मौलाना साहिबों से मशविरा करें… और अगर जायज़ पायें तो आगे बढ़ जायें… दीन के काम आकर मुस्लिम समुदाय को इज्जत बख्शने की वजह बन जायें!

जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की, दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनाने के काम आयें! अमन की तन्दुरुस्ती बढ़ाने के लिए इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर अपनी

इंसानियत साबित करें! अपने इंसान होने का सबूत दें! इंसानियत के काम आयें! इस्लाम का रुतबा ऊंचा बनाए रखने, ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम, अपनी जाती कुर्बानी देकर सच्चा मुसलमां होकर दिखायें!

सबसे अच्छी वो कुर्बानी, जो दे किसी को जिंदगानी!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

आइये! खुशहाल हो जायें…

किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर…..

आइये खुशहाल हो जायें!आइये! खुशहाल हो जायें…

अक्सर सभी को बहुत सारी शिकायतें होती हैं दुनियां से… किन्तु दुनियां ऐसी क्यों है?
ये दुनियां हो या वो दुनियां… कर्म के सिद्धांत अनुसार ही फल देती आई हैं…!
और बिल्कुल सच्चा है कर्म का सिद्धांत…!
किसी संत का एक उद्धरण है कि-
एक खुशहाल इंसान घूमते फिरते आम के बाग में पहुंच गया… बड़े बड़े रसीले आमों से लदे पेड़ों को केवल देखकर ही उसे बड़ा सुख मिला! फिर मन हुआ कि एकाध आम तोड़ लें… इधर उधर देखा माली पेड़ के नीचे सोया पड़ा था…. चौकीदार था नहीं … ना ही और… ‘कोई भी नहीं देख रहा था(?)’…. एक आम तोड़ लिया… चखा तो मन हुआ एक और… फिर एक और… फिर एक और…. इतने में ‘सदा सब कुछ देखते रहने वाले’ नेे एक आम माली पर टपकाया… माली जागा… डंडा लेकर पीछे भागा… दो चार जड़ दिए पीठ पर….! दर्द और बेइज्जती! आंसू आ गए आंखों में…! यह आंख ही थी जिसने देखकर पैरों को पेड़ तक पहुंचाने का, हाथों को आम तोड़ने का, जीभ को स्वाद ले-लेकर खाने का दोषी बनाया..!’

संतश्री के उक्त उदाहरण जैसा ही है कर्म का सिद्धांत!

… सरल करना चाहें तो जिस प्रकार आंख, कान, नाक, हाथ, पैर सब अंगों में से कोई भी, किसी भी प्रकार का कर्म करे, वह अकेले उस अंग पर नहीं समूचे शरीर पर, सभी अंगों पर कुछ ना कुछ, प्रभाव डालता है…! फल सबको प्राप्त होना / भुगतना होता है…!

इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर असर पड़ता ही है… और अगर किसी मोहल्ले में एक संभ्रांत परिवार हो तो मोहल्ले पर भी असर पड़ता है…! मोहल्ले की तरह शहर, देश-दुनियां पर भी!

आज सबसे खुशहाल देश फिनलैंड, नार्वे, डेनमार्क हैं! सर्वाधिक सामाजिक मूल्यों के पालक डेनमार्क, न्यूजीलैंड सबसे सभ्य देश हैं! जापान सबसे समर्पित नागरिकों वाला, चीन सबसे जुझारू… और… और…. और भारत…? आधी से अधिक दुनियां के लिए भारत; आज भी सांप-संपेरों, टोने-टोटकों, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी आस रखने वाले निठल्लों का देश है!

आइये अपने आप से सदाचरण “कराना” शुरू करें… कल परसों में सब सदाचारी हो जायेंगे…! सब खुशहाल!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

फिर करें एक नई शुरुआत…

बस वक्त बचा हो जिसका साथी, उसका वक्त नहीं कटता, तू वक्त लेना मुझको या मेरा वक्त बना देना…

फिर करें एक नई शुरुआत…

आते जाते वर्ष, साल

बदला कितना क्या अपना हाल!

कई प्रश्न उठे

कई जश्न हुए

कई जाम पिए

कई काम किये!

नाम हुआ
बदनाम हुए!

कुछ खास हुए

कई आम हुए!

गैरों में अपने पहचाने
अपनों में अपने आन मिले

कोई अपना गैर नहीं होता,

अपनों से अपना मान बने

कई टूट गए, कई रूठ गये,

कई संगी साथी छूट गये

इच्छाओं के अंकुर निकले!
कई-कई सपनों को पंख मिले!

आगाज हुए
परवाज हुई
साज बजे
और तान खिली!

अवसर ने गाये राग सभी

आ पहुँचा बैराग कभी!

मान मिला, अपमान मिला
ऊँची उड़ानों के बीच कभी
भटका हुआ तूफ़ान मिला!
पंख छिने, तन घायल भी
मन रोया, हुए हम पागल भी!

आया था ऐसा कुछ अट्ठारह
आकर आते ही बीत गया!
अब आया है ये उन्निस
आशायें अपनी अपरिमित!

ओ आने वाले, आना दिल से
छूकर लौट नहीं जाना…
थामके मेरी बांहें दोस्त
संग अपने मुझे भी ले जाना!
या बीते दिनों के संगी साथी
फिर से मुझ तक ले आना!

बस वक्त बचे साथी जिसका
उसका वक्त नहीं कटता!
तू वक्त बना लेना मुझको
या मेरा वक्त बना देना!!

.

अट्ठारह भी गया बीत,
वर्तमान हो गया अतीत!
हँसा, रुला हो हृदयांकित
मान जताकर हुआ व्यतीत!

आया है नूतन अब उन्निस
हों स्वप्न सजीव सब अपूरित
आओ बिसराकर बीती बात
फिर करें एक नई शुरुआत!

फिर करें एक नई शुरुआत!!
फिर करें एक नई शुरुआत!!!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

चिर तरुण सागर जी महाराज 

चिर तरुण सागर जी महाराज  

मेरी, मुझसे और जग से पहचान कराने के वास्तविक अधिकारी परम पूज्य मुनि श्रेष्ठ श्री श्री तरुण  सागर जी महाराज को श्रद्धांजलि!

  आदरांजलि!

 उनके चिर तरुण हो सकल ब्रम्हाण्ड में व्याप्त होने पर समझ नहीं पा रहा हूँ कि शोक करूँ? 

क्यों करूँ? 

वे अनंत थे! 

अमर हैं! 

अमर रहेंगे! 

आपके हमारे आडम्बररहित  सदाचारों में विद्यमान रहें••• सदैव आप••• हे मुनि श्रेष्ठ!  

“परमादरणीय के साथ का संस्मरण” 

‘चिर’ तरुण सागर जी महाराज के  सान्निध्य में एक दिन••• एक उपलब्धि! 

मैं भोपाल के अपने किराये के घर के लाॅन में बेमन से पौधों की देखभाल की कोशिश कर रहा था••• तभी मेरे दोस्त का बेटा (और बेटे का दोस्त भी) म• बघेल, रायसेन से आ पहुँचा••• अभिवादन आदि के बाद  बातचीत में पता लगा कि उनके रायसेन के नवनिर्मित मकान में मुनिश्री तरुण सागर जी विश्राम हेतु पहुँचने वाले हैं! उस वर्ष (2009 में)  मुनिश्री भोपाल में चातुर्मास करने वाले थे भोपाल से पहले का अंतिम पड़ाव रायसेन में  था! उन दिनों मैं अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे स्वीकृति की प्रतीक्षा में कठिनाई भरे दौर से गुजर रहा था! लेखन से भी 20 साल से नाता तोड़ रखा था मैंने किन्तु अपने 1989 के एक लेख “मेरा राज देश पर तो देश का दुनियाँ पर” (इसी ब्लाॅग पर संक्षिप्त रूप में  “हमारा राज देश पर तो देश का दुनियाँ पर”) की बिषयवस्तु से देश के वर्तमान योग्य कर्णधारों को अवगत कराना चाहता था! बीते दिनों कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेता, ऋषि, मुनि भोपाल पधारे थे, उन सबसे मेरा मिलने का प्रयास विफल रहा था! मुझे लगा जैसे मेरी लाॅटरी ही निकल आई है! मुनिश्री तरुण सागर जी महाराज से अधिक उपयुक्त कोई हो ही नहीं सकता था जो मेरी मानवता को पुकार को स्वर दे  आगे बढ़ाये! मैंने तुरंत बाइक में पेट्रोल की व्यवस्था की और रायसेन (55 कि मी दूर) मुनिश्री के समक्ष जा पहुँचा!

*मैं आश्चर्यचकित था कि विश्व प्रसिद्ध चिंतक व समाज सुधारक से मिलना इतनी सहजता से हो सकता था!*

विगत 20 सालों से मैं अपना लिखा हुआ 10 पन्नों  का आलेख जिम्मेदारों तक पहुँचाने परेशान हो रहा था आज महाराज जी से उस पर आशीष की प्रार्थना करने वाला था!

मैं उनके सामने उनके आभामंडल   के अति प्रभाव में सम्मोहित सा बैठा हुआ था! 3-4 घंटे उनके कक्ष में साथ था! “मनोवार्तालाप” (निःस्वर संदेश प्रेषण व ग्रहण करना/ टेलीटाॅक) से तब मैं थोड़ा बहुत ही परिचित  था! उन्होंने मुझसे मंतव्य पूछा तो मैंने अपने आलेख के टाइप किये हुए 8-10 पन्ने उनके चरणों में रखते हुए (सस्वर) निवेदन किया

“आप धर्म, समाज, मानवता के मार्ग दर्शन के लिये सम्पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं राष्ट्र को भी उचित दिशा देने भी अपना आशीष दीजिएगा! मैंने इन पन्नों में राष्ट्र के दिग्भ्रमित होकर दुर्दशा में पहुँचने के कारण व सम्भावित  निवारण लिखे हैं आप एक दृष्टि डाल आशीषित कर दीजिए!”

मुनि श्रेष्ठ ने पूछा

“आपका नाम पता नंबर लिखा है इसमें?”

“केवल उपनाम लिखा है•••(“चर्चित चित्रांश”) पता नहीं••• प्रसिद्धि की कामना भी नहीं है! केवल जनोत्थान में योगदान की आकांक्षा है!”  

मुनिश्री ने आदेश दिया

” फिर भी लिख दो और वहाँ रख दो हम बाद में  देखेंगे!”

पर्यावरण समर्पित होने के कारण  मैं हर तरह की छपाई के विरुद्ध हूँ! अपनी कोई पुस्तक भी प्रकाशित नहीं कराई••• ना कराना है! समूचा स्थानीय प्रिंट मीडिया आमंत्रित भी करता रहता है! किन्तु  मैं केवल डिजिटल प्रकाशन को ही उचित मानता हूँ! हाँ लेकिन तब  मेरे पास अस्थाई विजिटिंग कार्ड था, उसे नत्थी कर  मैंने वो पन्ने वहीं उनके तख्तापलट पर रख दिये जहाँ उन्होंने कहा था! थोड़ी देर और ठहरकर मैं   वापस आ गया ! 

3 रे दिन मुनि श्रेष्ठ भी भोपाल आ पहुँचे थे! 10वें दिन शायद (8 जुलाई 2009 को) किरण वेदी जी महाराज जी के दर्शनार्थ आ पहुँची ! फिर अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित जन महाराज जी के दर्शन को आते जाते रहे!

अगस्त के पहले सप्ताह में मुझे *“सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल”* के दिल्ली कार्यालय से प्रेषित पत्र द्वारा मेरे गैर सरकारी *“राष्ट्रीय रतन अवार्ड”* हेतु नामांकित किये जाने की सूचना सहित 26 अक्टूबर को दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय युवा सम्मेलन में सम्मिलित होकर उद्बोधन का आमंत्रण भी मिला! हालाँकि व्यक्तिगत कारणों से मैं नहीं जा सका••• 

किन्तु मेरी मुझसे पहचान हो चुकी थी! 

मेरेे जीवन की अनौखी घटना जो  घट चुुकी थी

मेरे ज्ञान व विश्वास के अनुसार  केवल मुनिश्रेष्ठ के आशीर्वाद के ही कारण!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

कट्टर नौ दिन उदार सौ दिन! 

हम हमारी धार्मिक नियमावलियों के अनुपालन में इतने सजग हैं कि भले धर्म रहे ना रहे नियम जरूर साधे रखना है!

कट्टर नौ दिन उदार सौ दिन!  

                           

       मेरी टेबल पर कागजात और मेकेनिकल टूल्स बिखरे पड़े रहते हैं अकसर••• उन्हीं के बीच "इस्काॅन" वालों से प्राप्त "श्रीमदभग्वद्गीता" की सुंदर लेमिनेटेड सजिल्द पुस्तक रखी थी! किसी काम से माँ मेरे कमरे में आईं थीं तो देखकर बोलीं "ये गीता जी यहाँ पर क्यों रखे हो••• पूजा में रखो" 

मेरे अंदर के फिलासफर को गुस्सा आया••• मगर माँ थीं तो तो बस इतना ही बोला कि 

“पूजने के अलावा पुस्तकें पढ़ने के लिये भी होती हैं••• कई पीढ़ियों से पूजा में ही रखी थी••• पाठ करते रहे••• पूजते रहे••• जीवन जीने पर क्या लिखा है••• किसी ने पढ़ा? मैं पढ़ता हूँ••• और उपहार में देकर पढ़ाने का प्रयास करता हूँ! किसी को गिफ्ट करनी है!”

माँ, माँ थीं•••• बात समझी या नहीं समझी मगर बिना प्रतिकार लौट गईं!


किन्तु आप पाठक/पाठिका जी, आपका प्रतिकार कहाँ रोके रुकने वाला है!

क्या आप जानते हैं श्रीकृष्ण वचनावली “श्रीमदभग्वद्गीता”,  विवेकानंद जी, रजनीश जी, के अर्जित ज्ञान का सर्वाधिक सदुपयोग किस/किन देश ने किया?


अमेरिका ने!



क्योंकि टाॅमस अल्वा एडिसन के गुरू कहते थे

*“मेरे कहे पर आंख मूंदकर विश्वास मत करो! शक करो! परखो! फिर असंगत लगे तो भुला दो और अनुकरणीय लगे तो अपना लो!”*

अमेरिका यही करता आ रहा है!

विवेकानंद जी के शिकागो उद्बोधन से आज तक उस उद्बोधन व उनके व्यक्तित्व पर शोध कार्य किया जा रहा है! विवेकानंद जी की तरह वहाँ के वैज्ञानिक फोटो रीडिंग कर पुस्तकों को मिनटों में पढ़ने का अभ्यास कर रहे हैं! ध्यान योग करते हैं!
••••और हम विवेकानंद जी को अगरबत्ती लगा, प्रणाम कर उनसे हमारे भाग्य की लाॅटरी खोलने की आशा पाले बैठे हैं!

      हम हमारी धार्मिक नियमावलियों के अनुपालन में इतने सजग हैं कि भले धर्म रहे ना रहे नियम जरूर साधे रखना है!

सर्वाधिक कठिन नियमावलियों वाले यहूदी, पारसी जैसे विशालकाय धर्म विलुप्ति  के निकट हैं••• अगला कौनसा••• क्या आपका? जिन सर्वाधिक उदार धर्मों का बाद में उद्भव हुआ उनके धर्मावलंबी दुनियाँ में  आज सर्वाधिक हैं!
अब आप ही करें कि कट्टरता में कट कर खत्म होना है या उदारता  में फलते फूलते रहना है!



यही बात हिन्दी साहित्य के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती है!  

दिल की सुन•••

दिल की सुन••• 

नर्म सिरहाने पे सर ,
हाथ दिल पर रखकर, 
सुन धड़कनों की सदा,
बस झुठलाना छोड़ दे,
तस्वीर दिल में बसी है,
देख ले और चूम ले,
आ तोड़ दायरे सारे,
अब शरमाना छोड़ दे,
ऐ दोस्त; जी ले कुछ पल,
मर-मर कर जीना छोड़ दे,
भरोसा कर अपने,
मनवा की पुकार पर,
बढ़ा हाथ, खुशी को थाम ले,
नाहक घबराना छोड़ दे!
#सत्यार्चन 

हे भारत! जागिये!

 हे भारत! जागिये! आइये भारत! राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता के संग्राम में सम्मिलित होकर अपने आपको जिताइये! साथ
आइये या हमसे बहुत आगे बढ़ चढ़कर इसे साकार करने के यज्ञ में अपनी यथासंभव आहूति दीजिए!

-सुबुद्ध सत्यार्चन 

 हे भारत! जागिये!

आइये भारत! 

राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता के संग्राम में सम्मिलित होकर अपने आपको जिताइये! 

‘SathyaArchan/  सत्यार्चन/ सत्य अर्चन’ नाम,  किसी भी सर्च एंजिन पर खोज लीजिए हमारे राष्ट्र हित को समर्पित प्रयासों का इतिहास प्रमाणित हो जायेगा! 

हमारे बहुत सारे ग्रुप्स व पेजेज फेसबुक आदि स्वतंत्र मीडिया पर  हैं जो कहे गये उद्देश्य को ही समर्पित हैं! 


“जब हम लुटेरे / बलात्कारियों / जघन्य अपराधियों को अपना मत देकर हमारे प्रतिनिधित्व का अधिकार देते हैं तो हम हमारे/ हमारे अपनों / हमारे परिचितों/ हमारे समाज के साथ वैसे ही जघण्य अपराध करने के लिए / होते रहने देने के लिए,  अधिकार पत्र सौंपकर असामाजिक तत्वों को आमंत्रित कर रहे होते हैं! अपराधियों /अपराधी पृष्ठभूमि वालों को चुनकर कौनसा जनहित होगा? इनके अतिरिक्त किसी भी अधिक योग्य को ही अपना मत दें! आप अपराधियों को वोट देकर चुनना बंद करेंगे; तो सभी राजनैतिक दल अपराधियों से दूरी बनाने मजबूर हो जायेंगे!”

आपके गांव /शहर /कस्बे / नगर के आपके मोहल्ले में का 1 ही गुण्डा सामाजिक सौहार्द स्थापित होने देने में शेष सबपर भारी पड़ता है वह अपने मुट्ठी भर साथियों के  साथ मिलकर आपके क्षेत्र में प्रशासन को अपनी जेब में रख कानून व्यवस्था को तहस नहस करते रहता  है! जब हजारों रहवासियों के बीच 1 गुण्डा ही इतनी बड़ी समस्या है तो लगभग 33% अपराधियों से युक्त संसद से आप कानून व्यवस्था बनाये रखने की आशा कर ही कैसे सकते हैं???



इतनी सी बात जिस दिन  जनसाधारण को समझ आ जायेगी देश सकारात्मक सामाजिक प्रगति की  दिशा में दौड़ना शुरू कर देगा! 

हमारा प्रयास 1989 से इसी उद्देश्य को समर्पित है! हम किसी राजनैतिक दल या विचारधारा के समर्थन या विरोध में नहीं! हम ‘भारत’ हैं और सकारात्मक प्रागत राष्ट्र होने का स्वप्न ही नहीं संजोये हैं  इसे साकार करने की दिशा में अपने सीमित साधनों के साथ निरंतर प्रयासरत हैं! 

आपको, आपके मित्रों को और सबको आमंत्रण है आइये स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि स्वरूप उनके इस स्वप्न के साकार की दिशा में हमारे साथ आइये या हमसे बहुत आगे बढ़ चढ़कर इसे साकार करने के यज्ञ में यथासंभव आहूति दीजिए!
-सुबुद्ध सत्यार्चन 

अनुभव 

बीते कल व आने वाले कल में आज के स्वयं का 10% से अधिक  वैचारिक व्यय करने वाला, जीवन में बड़ी सफलताओं से दूर ही रहता है! 

अनुभव 

            सामान्यतः बड़े बूढ़े अपने जीवन भर में देखे सुख-दुख  के अनुभव के आधार पर, बूढ़े होने तक, अच्छे-बुरे, सही-गलत को ठीक-ठीक  समझ पाते हैं! अपने जीवन भर का यही हासिल वे उन सबसे साझा करना चाहते हैं जिनकी आयु उनसे कम है! इस उद्देश्य के साथ कि उनके युवा,  जीवन के  बहुत सारे वर्ष व्यर्थ करने के स्थान पर उनके कनिष्ठ अल्प आयु में ही, उनके प्राप्त  अनुभव के लाभ जान सकें / ले सकें!  

              जिन्दगी में अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता और अनुभव बीते दिन के बीतते ही उसे विगत बनाने से आता है!
              विगत से मिली सीख को याद रखने, गाँठ बाँध लेने में और असंगत को नकारकर बिसारने में ही हित है!

          कहा गया है कि- 


“बुद्धिमान वह है जो दूसरों के अनुभव से सीखता है!”


“समझदार अपने अनुभव से 
सीखता है!”  (अपनी गलतियों/  भूलों को समझकर स्वीकार कर) 


“नासमझ अपने अनुभव में से ना तो अपनी भूलों को समझ पाता है ना ही किसी अन्य के इंगित किये जाने पर स्वीकार ही पाता है तो सीखने का तो प्रश्न ही नहीं उठता!”

 

             समझदार व्यक्ति पिछले दिन के स्वयं से, आज के स्वयं को, उत्तम मानने/ बनाने/ गढ़ने हेतु प्रयत्नशील रहता है! 

            नासमझ विगत के स्वयं को आज के स्वयं से उत्तम मानने/  बताने/ जताने में आज और आने वाले कल दोनों का सर्वनाश कर रहा होता है! 

           बीते कल व आने वाले कल में आज के स्वयं का 10% से अधिक  वैचारिक व्यय करने वाला, जीवन में बड़ी सफलताओं से दूर ही रहता है! 

जीवन में सफलता पाने के लिए व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाना ही हितकर होता है! (“Success Needs a Professional Approach”) क्या और क्यों कारगर  होती है यह प्रोफेशनल अप्रोच? प्रोफेशनल अप्रोच यानी किसी कार्य/ समस्या का, मुख्य रूप से लाभ-हानि को दृष्टिगत रख, समापन सुनिश्चित करना! अधिकांश पाठक कहीं ना कहीं कार्यरत हैं ही!  निजी जीवन की कार्रवाइयों को समरूप व्यावसायिक परिदृश्य में रखकर योजना बनानेे और उसपर योजनानुसार क्रियान्वयन करनेे की आदत बना लेें तो समय का सर्वोत्तम प्रयोग सफलता की सीढ़ियों को सहज बना देगा!

चलिये अनुभव से लाभ लेने की ओर चलें! 

मेरा देश बदल रहा है? 

मेरा देश बदल रहा है? 

विगत वर्षों में, सोशल मीडिया पर अर्धसत्य युक्त अफवाहों से हंगामा फैलाकर, दुनियाँ के 6 बड़े देशों में युगों से सत्ता पाने  को संघर्षरत कट्टरपंथी ताकतों ने सत्तासीन होने में सफलता  पा ली! 

 कुछ देशों के नव सत्ताधीश,  सत्तासीन होने के बाद भी इस अर्धसत्य आधारित अफवाह तंत्र रूपी शस्त्र का मोह त्याग नहीं सके!

 जबकि सत्तासीन होते ही यह शस्त्र आत्मघाती हो चुका था!

सोशल मीडिया की इस छुपी हुई घातक शक्ति का आपराधिक मनोवृत्ति के लोगों ने सदा की भाँति दुरुपयोग करना शुरू कर दिया! पिछले कुछ ही वर्षों में कितने ही लोगों की हत्या भीड़ द्वारा कराई जा चुकी है और ऐसी हत्या की घटनाओं में वर्ष प्रति वर्ष तीव्र वृद्धि होते जा रही है! 

अफवाह तंत्र की महाघातक आत्मघआत्मघाती  क्षमता का अनुमान लगाने में जाने क्यों शासन-प्रशासन उदासीन है! भारतीय सामाजिक वृत्ति के इस वीभत्स पतन की किसी को कोई चिंता होती नहीं दिखती! ऐसा ही उदासीन प्रतिरोध चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब शासन-प्रशासन के हाथ करने के लिए कुछ शेष नहीं रह जायेगा! जिसकी लाठी उसकी भैंस से भी बदतर पूर्ण अराजकता का साम्राज्य होगा! 

इस निष्कर्ष तक पहुँचने का कारण विभिन्न राज्यों में बच्चा चोर,  गौ चोर, दवा चोर, मोबाइल चोर, मुर्गी चोर, रोटी चोर जैसे आरोपों में भीड़ द्वारा मारे गए लोगों में से अधिकांश निर्दोष नागरिकों की मौत के बाद भी अफवाहों पर रोक लगवाने किये गये प्रयासों से कई गुनी अधिक सक्रियता विरोधियों को बदनाम करने में  दिख रही है! 

अंधेरा सबल हुआ है! 

उल्टी दिशा में चल रहा है!

 मेरा देश बदल रहा है!