आइये! खुशहाल हो जायें…

किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर…..

आइये खुशहाल हो जायें!आइये! खुशहाल हो जायें…

अक्सर सभी को बहुत सारी शिकायतें होती हैं दुनियां से… किन्तु दुनियां ऐसी क्यों है?
ये दुनियां हो या वो दुनियां… कर्म के सिद्धांत अनुसार ही फल देती आई हैं…!
और बिल्कुल सच्चा है कर्म का सिद्धांत…!
किसी संत का एक उद्धरण है कि-
एक खुशहाल इंसान घूमते फिरते आम के बाग में पहुंच गया… बड़े बड़े रसीले आमों से लदे पेड़ों को केवल देखकर ही उसे बड़ा सुख मिला! फिर मन हुआ कि एकाध आम तोड़ लें… इधर उधर देखा माली पेड़ के नीचे सोया पड़ा था…. चौकीदार था नहीं … ना ही और… ‘कोई भी नहीं देख रहा था(?)’…. एक आम तोड़ लिया… चखा तो मन हुआ एक और… फिर एक और… फिर एक और…. इतने में ‘सदा सब कुछ देखते रहने वाले’ नेे एक आम माली पर टपकाया… माली जागा… डंडा लेकर पीछे भागा… दो चार जड़ दिए पीठ पर….! दर्द और बेइज्जती! आंसू आ गए आंखों में…! यह आंख ही थी जिसने देखकर पैरों को पेड़ तक पहुंचाने का, हाथों को आम तोड़ने का, जीभ को स्वाद ले-लेकर खाने का दोषी बनाया..!’

संतश्री के उक्त उदाहरण जैसा ही है कर्म का सिद्धांत!

… सरल करना चाहें तो जिस प्रकार आंख, कान, नाक, हाथ, पैर सब अंगों में से कोई भी, किसी भी प्रकार का कर्म करे, वह अकेले उस अंग पर नहीं समूचे शरीर पर, सभी अंगों पर कुछ ना कुछ, प्रभाव डालता है…! फल सबको प्राप्त होना / भुगतना होता है…!

इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर असर पड़ता ही है… और अगर किसी मोहल्ले में एक संभ्रांत परिवार हो तो मोहल्ले पर भी असर पड़ता है…! मोहल्ले की तरह शहर, देश-दुनियां पर भी!

आज सबसे खुशहाल देश फिनलैंड, नार्वे, डेनमार्क हैं! सर्वाधिक सामाजिक मूल्यों के पालक डेनमार्क, न्यूजीलैंड सबसे सभ्य देश हैं! जापान सबसे समर्पित नागरिकों वाला, चीन सबसे जुझारू… और… और…. और भारत…? आधी से अधिक दुनियां के लिए भारत; आज भी सांप-संपेरों, टोने-टोटकों, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी आस रखने वाले निठल्लों का देश है!

आइये अपने आप से सदाचरण “कराना” शुरू करें… कल परसों में सब सदाचारी हो जायेंगे…! सब खुशहाल!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

फिर करें एक नई शुरुआत…

बस वक्त बचा हो जिसका साथी, उसका वक्त नहीं कटता, तू वक्त लेना मुझको या मेरा वक्त बना देना…

फिर करें एक नई शुरुआत…

आते जाते वर्ष, साल

बदला कितना क्या अपना हाल!

कई प्रश्न उठे

कई जश्न हुए

कई जाम पिए

कई काम किये!

नाम हुआ
बदनाम हुए!

कुछ खास हुए

कई आम हुए!

गैरों में अपने पहचाने
अपनों में अपने आन मिले

कोई अपना गैर नहीं होता,

अपनों से अपना मान बने

कई टूट गए, कई रूठ गये,

कई संगी साथी छूट गये

इच्छाओं के अंकुर निकले!
कई-कई सपनों को पंख मिले!

आगाज हुए
परवाज हुई
साज बजे
और तान खिली!

अवसर ने गाये राग सभी

आ पहुँचा बैराग कभी!

मान मिला, अपमान मिला
ऊँची उड़ानों के बीच कभी
भटका हुआ तूफ़ान मिला!
पंख छिने, तन घायल भी
मन रोया, हुए हम पागल भी!

आया था ऐसा कुछ अट्ठारह
आकर आते ही बीत गया!
अब आया है ये उन्निस
आशायें अपनी अपरिमित!

ओ आने वाले, आना दिल से
छूकर लौट नहीं जाना…
थामके मेरी बांहें दोस्त
संग अपने मुझे भी ले जाना!
या बीते दिनों के संगी साथी
फिर से मुझ तक ले आना!

बस वक्त बचे साथी जिसका
उसका वक्त नहीं कटता!
तू वक्त बना लेना मुझको
या मेरा वक्त बना देना!!

.

अट्ठारह भी गया बीत,
वर्तमान हो गया अतीत!
हँसा, रुला हो हृदयांकित
मान जताकर हुआ व्यतीत!

आया है नूतन अब उन्निस
हों स्वप्न सजीव सब अपूरित
आओ बिसराकर बीती बात
फिर करें एक नई शुरुआत!

फिर करें एक नई शुरुआत!!
फिर करें एक नई शुरुआत!!!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

चिर तरुण सागर जी महाराज 

चिर तरुण सागर जी महाराज  

मेरी, मुझसे और जग से पहचान कराने के वास्तविक अधिकारी परम पूज्य मुनि श्रेष्ठ श्री श्री तरुण  सागर जी महाराज को श्रद्धांजलि!

  आदरांजलि!

 उनके चिर तरुण हो सकल ब्रम्हाण्ड में व्याप्त होने पर समझ नहीं पा रहा हूँ कि शोक करूँ? 

क्यों करूँ? 

वे अनंत थे! 

अमर हैं! 

अमर रहेंगे! 

आपके हमारे आडम्बररहित  सदाचारों में विद्यमान रहें••• सदैव आप••• हे मुनि श्रेष्ठ!  

“परमादरणीय के साथ का संस्मरण” 

‘चिर’ तरुण सागर जी महाराज के  सान्निध्य में एक दिन••• एक उपलब्धि! 

मैं भोपाल के अपने किराये के घर के लाॅन में बेमन से पौधों की देखभाल की कोशिश कर रहा था••• तभी मेरे दोस्त का बेटा (और बेटे का दोस्त भी) म• बघेल, रायसेन से आ पहुँचा••• अभिवादन आदि के बाद  बातचीत में पता लगा कि उनके रायसेन के नवनिर्मित मकान में मुनिश्री तरुण सागर जी विश्राम हेतु पहुँचने वाले हैं! उस वर्ष (2009 में)  मुनिश्री भोपाल में चातुर्मास करने वाले थे भोपाल से पहले का अंतिम पड़ाव रायसेन में  था! उन दिनों मैं अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे स्वीकृति की प्रतीक्षा में कठिनाई भरे दौर से गुजर रहा था! लेखन से भी 20 साल से नाता तोड़ रखा था मैंने किन्तु अपने 1989 के एक लेख “मेरा राज देश पर तो देश का दुनियाँ पर” (इसी ब्लाॅग पर संक्षिप्त रूप में  “हमारा राज देश पर तो देश का दुनियाँ पर”) की बिषयवस्तु से देश के वर्तमान योग्य कर्णधारों को अवगत कराना चाहता था! बीते दिनों कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेता, ऋषि, मुनि भोपाल पधारे थे, उन सबसे मेरा मिलने का प्रयास विफल रहा था! मुझे लगा जैसे मेरी लाॅटरी ही निकल आई है! मुनिश्री तरुण सागर जी महाराज से अधिक उपयुक्त कोई हो ही नहीं सकता था जो मेरी मानवता को पुकार को स्वर दे  आगे बढ़ाये! मैंने तुरंत बाइक में पेट्रोल की व्यवस्था की और रायसेन (55 कि मी दूर) मुनिश्री के समक्ष जा पहुँचा!

*मैं आश्चर्यचकित था कि विश्व प्रसिद्ध चिंतक व समाज सुधारक से मिलना इतनी सहजता से हो सकता था!*

विगत 20 सालों से मैं अपना लिखा हुआ 10 पन्नों  का आलेख जिम्मेदारों तक पहुँचाने परेशान हो रहा था आज महाराज जी से उस पर आशीष की प्रार्थना करने वाला था!

मैं उनके सामने उनके आभामंडल   के अति प्रभाव में सम्मोहित सा बैठा हुआ था! 3-4 घंटे उनके कक्ष में साथ था! “मनोवार्तालाप” (निःस्वर संदेश प्रेषण व ग्रहण करना/ टेलीटाॅक) से तब मैं थोड़ा बहुत ही परिचित  था! उन्होंने मुझसे मंतव्य पूछा तो मैंने अपने आलेख के टाइप किये हुए 8-10 पन्ने उनके चरणों में रखते हुए (सस्वर) निवेदन किया

“आप धर्म, समाज, मानवता के मार्ग दर्शन के लिये सम्पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं राष्ट्र को भी उचित दिशा देने भी अपना आशीष दीजिएगा! मैंने इन पन्नों में राष्ट्र के दिग्भ्रमित होकर दुर्दशा में पहुँचने के कारण व सम्भावित  निवारण लिखे हैं आप एक दृष्टि डाल आशीषित कर दीजिए!”

मुनि श्रेष्ठ ने पूछा

“आपका नाम पता नंबर लिखा है इसमें?”

“केवल उपनाम लिखा है•••(“चर्चित चित्रांश”) पता नहीं••• प्रसिद्धि की कामना भी नहीं है! केवल जनोत्थान में योगदान की आकांक्षा है!”  

मुनिश्री ने आदेश दिया

” फिर भी लिख दो और वहाँ रख दो हम बाद में  देखेंगे!”

पर्यावरण समर्पित होने के कारण  मैं हर तरह की छपाई के विरुद्ध हूँ! अपनी कोई पुस्तक भी प्रकाशित नहीं कराई••• ना कराना है! समूचा स्थानीय प्रिंट मीडिया आमंत्रित भी करता रहता है! किन्तु  मैं केवल डिजिटल प्रकाशन को ही उचित मानता हूँ! हाँ लेकिन तब  मेरे पास अस्थाई विजिटिंग कार्ड था, उसे नत्थी कर  मैंने वो पन्ने वहीं उनके तख्तापलट पर रख दिये जहाँ उन्होंने कहा था! थोड़ी देर और ठहरकर मैं   वापस आ गया ! 

3 रे दिन मुनि श्रेष्ठ भी भोपाल आ पहुँचे थे! 10वें दिन शायद (8 जुलाई 2009 को) किरण वेदी जी महाराज जी के दर्शनार्थ आ पहुँची ! फिर अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित जन महाराज जी के दर्शन को आते जाते रहे!

अगस्त के पहले सप्ताह में मुझे *“सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल”* के दिल्ली कार्यालय से प्रेषित पत्र द्वारा मेरे गैर सरकारी *“राष्ट्रीय रतन अवार्ड”* हेतु नामांकित किये जाने की सूचना सहित 26 अक्टूबर को दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय युवा सम्मेलन में सम्मिलित होकर उद्बोधन का आमंत्रण भी मिला! हालाँकि व्यक्तिगत कारणों से मैं नहीं जा सका••• 

किन्तु मेरी मुझसे पहचान हो चुकी थी! 

मेरेे जीवन की अनौखी घटना जो  घट चुुकी थी

मेरे ज्ञान व विश्वास के अनुसार  केवल मुनिश्रेष्ठ के आशीर्वाद के ही कारण!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

कट्टर नौ दिन उदार सौ दिन! 

हम हमारी धार्मिक नियमावलियों के अनुपालन में इतने सजग हैं कि भले धर्म रहे ना रहे नियम जरूर साधे रखना है!

कट्टर नौ दिन उदार सौ दिन!  

                           

       मेरी टेबल पर कागजात और मेकेनिकल टूल्स बिखरे पड़े रहते हैं अकसर••• उन्हीं के बीच "इस्काॅन" वालों से प्राप्त "श्रीमदभग्वद्गीता" की सुंदर लेमिनेटेड सजिल्द पुस्तक रखी थी! किसी काम से माँ मेरे कमरे में आईं थीं तो देखकर बोलीं "ये गीता जी यहाँ पर क्यों रखे हो••• पूजा में रखो" 

मेरे अंदर के फिलासफर को गुस्सा आया••• मगर माँ थीं तो तो बस इतना ही बोला कि 

“पूजने के अलावा पुस्तकें पढ़ने के लिये भी होती हैं••• कई पीढ़ियों से पूजा में ही रखी थी••• पाठ करते रहे••• पूजते रहे••• जीवन जीने पर क्या लिखा है••• किसी ने पढ़ा? मैं पढ़ता हूँ••• और उपहार में देकर पढ़ाने का प्रयास करता हूँ! किसी को गिफ्ट करनी है!”

माँ, माँ थीं•••• बात समझी या नहीं समझी मगर बिना प्रतिकार लौट गईं!


किन्तु आप पाठक/पाठिका जी, आपका प्रतिकार कहाँ रोके रुकने वाला है!

क्या आप जानते हैं श्रीकृष्ण वचनावली “श्रीमदभग्वद्गीता”,  विवेकानंद जी, रजनीश जी, के अर्जित ज्ञान का सर्वाधिक सदुपयोग किस/किन देश ने किया?


अमेरिका ने!



क्योंकि टाॅमस अल्वा एडिसन के गुरू कहते थे

*“मेरे कहे पर आंख मूंदकर विश्वास मत करो! शक करो! परखो! फिर असंगत लगे तो भुला दो और अनुकरणीय लगे तो अपना लो!”*

अमेरिका यही करता आ रहा है!

विवेकानंद जी के शिकागो उद्बोधन से आज तक उस उद्बोधन व उनके व्यक्तित्व पर शोध कार्य किया जा रहा है! विवेकानंद जी की तरह वहाँ के वैज्ञानिक फोटो रीडिंग कर पुस्तकों को मिनटों में पढ़ने का अभ्यास कर रहे हैं! ध्यान योग करते हैं!
••••और हम विवेकानंद जी को अगरबत्ती लगा, प्रणाम कर उनसे हमारे भाग्य की लाॅटरी खोलने की आशा पाले बैठे हैं!

      हम हमारी धार्मिक नियमावलियों के अनुपालन में इतने सजग हैं कि भले धर्म रहे ना रहे नियम जरूर साधे रखना है!

सर्वाधिक कठिन नियमावलियों वाले यहूदी, पारसी जैसे विशालकाय धर्म विलुप्ति  के निकट हैं••• अगला कौनसा••• क्या आपका? जिन सर्वाधिक उदार धर्मों का बाद में उद्भव हुआ उनके धर्मावलंबी दुनियाँ में  आज सर्वाधिक हैं!
अब आप ही करें कि कट्टरता में कट कर खत्म होना है या उदारता  में फलते फूलते रहना है!



यही बात हिन्दी साहित्य के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती है!  

दिल की सुन•••

दिल की सुन••• 

नर्म सिरहाने पे सर ,
हाथ दिल पर रखकर, 
सुन धड़कनों की सदा,
बस झुठलाना छोड़ दे,
तस्वीर दिल में बसी है,
देख ले और चूम ले,
आ तोड़ दायरे सारे,
अब शरमाना छोड़ दे,
ऐ दोस्त; जी ले कुछ पल,
मर-मर कर जीना छोड़ दे,
भरोसा कर अपने,
मनवा की पुकार पर,
बढ़ा हाथ, खुशी को थाम ले,
नाहक घबराना छोड़ दे!
#सत्यार्चन 

हे भारत! जागिये!

 हे भारत! जागिये! आइये भारत! राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता के संग्राम में सम्मिलित होकर अपने आपको जिताइये! साथ
आइये या हमसे बहुत आगे बढ़ चढ़कर इसे साकार करने के यज्ञ में अपनी यथासंभव आहूति दीजिए!

-सुबुद्ध सत्यार्चन 

 हे भारत! जागिये!

आइये भारत! 

राष्ट्र की वास्तविक स्वतंत्रता के संग्राम में सम्मिलित होकर अपने आपको जिताइये! 

‘SathyaArchan/  सत्यार्चन/ सत्य अर्चन’ नाम,  किसी भी सर्च एंजिन पर खोज लीजिए हमारे राष्ट्र हित को समर्पित प्रयासों का इतिहास प्रमाणित हो जायेगा! 

हमारे बहुत सारे ग्रुप्स व पेजेज फेसबुक आदि स्वतंत्र मीडिया पर  हैं जो कहे गये उद्देश्य को ही समर्पित हैं! 


“जब हम लुटेरे / बलात्कारियों / जघन्य अपराधियों को अपना मत देकर हमारे प्रतिनिधित्व का अधिकार देते हैं तो हम हमारे/ हमारे अपनों / हमारे परिचितों/ हमारे समाज के साथ वैसे ही जघण्य अपराध करने के लिए / होते रहने देने के लिए,  अधिकार पत्र सौंपकर असामाजिक तत्वों को आमंत्रित कर रहे होते हैं! अपराधियों /अपराधी पृष्ठभूमि वालों को चुनकर कौनसा जनहित होगा? इनके अतिरिक्त किसी भी अधिक योग्य को ही अपना मत दें! आप अपराधियों को वोट देकर चुनना बंद करेंगे; तो सभी राजनैतिक दल अपराधियों से दूरी बनाने मजबूर हो जायेंगे!”

आपके गांव /शहर /कस्बे / नगर के आपके मोहल्ले में का 1 ही गुण्डा सामाजिक सौहार्द स्थापित होने देने में शेष सबपर भारी पड़ता है वह अपने मुट्ठी भर साथियों के  साथ मिलकर आपके क्षेत्र में प्रशासन को अपनी जेब में रख कानून व्यवस्था को तहस नहस करते रहता  है! जब हजारों रहवासियों के बीच 1 गुण्डा ही इतनी बड़ी समस्या है तो लगभग 33% अपराधियों से युक्त संसद से आप कानून व्यवस्था बनाये रखने की आशा कर ही कैसे सकते हैं???



इतनी सी बात जिस दिन  जनसाधारण को समझ आ जायेगी देश सकारात्मक सामाजिक प्रगति की  दिशा में दौड़ना शुरू कर देगा! 

हमारा प्रयास 1989 से इसी उद्देश्य को समर्पित है! हम किसी राजनैतिक दल या विचारधारा के समर्थन या विरोध में नहीं! हम ‘भारत’ हैं और सकारात्मक प्रागत राष्ट्र होने का स्वप्न ही नहीं संजोये हैं  इसे साकार करने की दिशा में अपने सीमित साधनों के साथ निरंतर प्रयासरत हैं! 

आपको, आपके मित्रों को और सबको आमंत्रण है आइये स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि स्वरूप उनके इस स्वप्न के साकार की दिशा में हमारे साथ आइये या हमसे बहुत आगे बढ़ चढ़कर इसे साकार करने के यज्ञ में यथासंभव आहूति दीजिए!
-सुबुद्ध सत्यार्चन 

अनुभव 

बीते कल व आने वाले कल में आज के स्वयं का 10% से अधिक  वैचारिक व्यय करने वाला, जीवन में बड़ी सफलताओं से दूर ही रहता है! 

अनुभव 

            सामान्यतः बड़े बूढ़े अपने जीवन भर में देखे सुख-दुख  के अनुभव के आधार पर, बूढ़े होने तक, अच्छे-बुरे, सही-गलत को ठीक-ठीक  समझ पाते हैं! अपने जीवन भर का यही हासिल वे उन सबसे साझा करना चाहते हैं जिनकी आयु उनसे कम है! इस उद्देश्य के साथ कि उनके युवा,  जीवन के  बहुत सारे वर्ष व्यर्थ करने के स्थान पर उनके कनिष्ठ अल्प आयु में ही, उनके प्राप्त  अनुभव के लाभ जान सकें / ले सकें!  

              जिन्दगी में अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता और अनुभव बीते दिन के बीतते ही उसे विगत बनाने से आता है!
              विगत से मिली सीख को याद रखने, गाँठ बाँध लेने में और असंगत को नकारकर बिसारने में ही हित है!

          कहा गया है कि- 


“बुद्धिमान वह है जो दूसरों के अनुभव से सीखता है!”


“समझदार अपने अनुभव से 
सीखता है!”  (अपनी गलतियों/  भूलों को समझकर स्वीकार कर) 


“नासमझ अपने अनुभव में से ना तो अपनी भूलों को समझ पाता है ना ही किसी अन्य के इंगित किये जाने पर स्वीकार ही पाता है तो सीखने का तो प्रश्न ही नहीं उठता!”

 

             समझदार व्यक्ति पिछले दिन के स्वयं से, आज के स्वयं को, उत्तम मानने/ बनाने/ गढ़ने हेतु प्रयत्नशील रहता है! 

            नासमझ विगत के स्वयं को आज के स्वयं से उत्तम मानने/  बताने/ जताने में आज और आने वाले कल दोनों का सर्वनाश कर रहा होता है! 

           बीते कल व आने वाले कल में आज के स्वयं का 10% से अधिक  वैचारिक व्यय करने वाला, जीवन में बड़ी सफलताओं से दूर ही रहता है! 

जीवन में सफलता पाने के लिए व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाना ही हितकर होता है! (“Success Needs a Professional Approach”) क्या और क्यों कारगर  होती है यह प्रोफेशनल अप्रोच? प्रोफेशनल अप्रोच यानी किसी कार्य/ समस्या का, मुख्य रूप से लाभ-हानि को दृष्टिगत रख, समापन सुनिश्चित करना! अधिकांश पाठक कहीं ना कहीं कार्यरत हैं ही!  निजी जीवन की कार्रवाइयों को समरूप व्यावसायिक परिदृश्य में रखकर योजना बनानेे और उसपर योजनानुसार क्रियान्वयन करनेे की आदत बना लेें तो समय का सर्वोत्तम प्रयोग सफलता की सीढ़ियों को सहज बना देगा!

चलिये अनुभव से लाभ लेने की ओर चलें! 

मेरा देश बदल रहा है? 

मेरा देश बदल रहा है? 

विगत वर्षों में, सोशल मीडिया पर अर्धसत्य युक्त अफवाहों से हंगामा फैलाकर, दुनियाँ के 6 बड़े देशों में युगों से सत्ता पाने  को संघर्षरत कट्टरपंथी ताकतों ने सत्तासीन होने में सफलता  पा ली! 

 कुछ देशों के नव सत्ताधीश,  सत्तासीन होने के बाद भी इस अर्धसत्य आधारित अफवाह तंत्र रूपी शस्त्र का मोह त्याग नहीं सके!

 जबकि सत्तासीन होते ही यह शस्त्र आत्मघाती हो चुका था!

सोशल मीडिया की इस छुपी हुई घातक शक्ति का आपराधिक मनोवृत्ति के लोगों ने सदा की भाँति दुरुपयोग करना शुरू कर दिया! पिछले कुछ ही वर्षों में कितने ही लोगों की हत्या भीड़ द्वारा कराई जा चुकी है और ऐसी हत्या की घटनाओं में वर्ष प्रति वर्ष तीव्र वृद्धि होते जा रही है! 

अफवाह तंत्र की महाघातक आत्मघआत्मघाती  क्षमता का अनुमान लगाने में जाने क्यों शासन-प्रशासन उदासीन है! भारतीय सामाजिक वृत्ति के इस वीभत्स पतन की किसी को कोई चिंता होती नहीं दिखती! ऐसा ही उदासीन प्रतिरोध चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब शासन-प्रशासन के हाथ करने के लिए कुछ शेष नहीं रह जायेगा! जिसकी लाठी उसकी भैंस से भी बदतर पूर्ण अराजकता का साम्राज्य होगा! 

इस निष्कर्ष तक पहुँचने का कारण विभिन्न राज्यों में बच्चा चोर,  गौ चोर, दवा चोर, मोबाइल चोर, मुर्गी चोर, रोटी चोर जैसे आरोपों में भीड़ द्वारा मारे गए लोगों में से अधिकांश निर्दोष नागरिकों की मौत के बाद भी अफवाहों पर रोक लगवाने किये गये प्रयासों से कई गुनी अधिक सक्रियता विरोधियों को बदनाम करने में  दिख रही है! 

अंधेरा सबल हुआ है! 

उल्टी दिशा में चल रहा है!

 मेरा देश बदल रहा है!

सुख चाहिये? ये लीजिए! – 10 (असफलता के 10 सूत्र)

कुछ भी करने से पहले योजना बनाने में कुछ समय अवश्य खर्च किया जाये और योजनानुसार ही उसपर अमल किया जाये तो जीवन सफल नहीं तो असफल करने के लिये किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती बस आपको ज़रा सा लापरवाह भर होना होगा! 

असफलता के 10 सूत्र

99% लोग असफलता के  इन्हीं 10 सूत्रों पर चलते हैं••• शायद आप भी•••!

 सफलता का सुख चाहिये तो स्वयं के परिवेश का ईमानदारी से आंकलन करें, इन 10 में से किसी मार्ग पर हों तो मार्ग बदलें, सफल/ सुखी हो जायें!

मैं भी प्रयासरत ही हूँ!

1

  • दूसरों के जिस तरह के व्यवहार*

से आप चिड़ते हैं

  • *की आलोचना करते हैं

*का मज़ाक उड़ाते हैं!

  • वैसा ही व्यवहार स्वयं भी करते रहते हैं! 

2

  • हर किसी प्रशंसक की प्रशंसा से अभिभूत होकर अपना हित-अहित ही भूल जाना!

“प्रशंसा तो हर एक को प्रिय होती है… मुझे भी और आपको भी… किन्तु पर एक प्रशंसक सच्चा नहीं होता, अच्छा नहीं होता समाज में फैले चालबाज़ियों से युक्त लोग आपको ठगने, लूटने के उद्देश्य से भी आप में कोई विशेषता ढूंढ कर या गढ़कर आपकी प्रशंसा कर रहे होते हैं…  प्रशंसा करने वाले से उत्साहित होकर उसकी हर थ्योरी को उचित मानने बाध्य हो जाने से आप उसे, आपको या आपके अपनों को ठगने का मार्ग दे देते हैं ! परिणाम में नुकसान की संभावना अधिक होती है या कई बार उठाना ही पड़ता है!

3

  • प्रशंसा की अपेक्षा सबसे रखना, किन्तु प्रशंसा करने में कंजूस होना! 

आपकी ही तरह हर कोई अपने पाये हुए, मिले हुए , किये हुए, के प्रति  गौरवान्वित हो या ना हो किन्तु सार्वजनिक रूप से वह गौरवान्वित ही प्रदर्शित रहना चाहता / चाहती  है, जैसे कोई आपके बनवाये या खरीदे हुए मकान, आपकी संतान, आपकी उपलब्धि आदि की सराहना कर आपको अपने प्राप्त पर गौरव का अनुभव कराता है वैसे ही यदि आप दूसरों को नहीं करा पाते हैं तो शीघ्र ही आप भी ऐसी प्रशंसा से वंचित होते जायेंगे!

4

  • त्रुटि इंगित कर सुधार के मार्ग  सुझाने वाले से  दूरी बना लेना! 

जिन्हें आपकी नाराज़गी से अधिक आपके हित की चिंता होती है अक्सर वे ही आपके सच्चे मित्र होते हैं. किन्तु कई लोगों में अपनी कैसी भी आलोचना  किसी से भी सुनना इतना अप्रिय लगता है कि वे धीरे-धीरे अपने सच्चे मित्रों को खोते जाते हैं और केवल स्वार्थी चाटुकारों से घिरे रह जाते हैं.

5

  • श्रेय लेने में सबसे आगे किन्तु श्रेय देने या जिम्मेदारी लेने से दूरी बनाये रखना! 

किसी समस्या का उचित समाधान या आयोजन का सफल प्रबंध करने में आपके सफल रहने पर उपस्थित लोगों में से अधिकांश से/ किसी किसी से / किसी से आपको इसका श्रेय दिये जाने पर जैसी प्रशंसा आपको होती है वैसी ही अन्य को भी होती ही होगी…  किसी के किये गये किसी भी कार्य के संचालन पर उसे उसका श्रेय या प्रशंसा या दोनों ही ना मिलें तो भविष्य में वह आपके लिये किसी अन्य अवसर पर  उतने मन से कार्य नहीं कर रहा होगा. धीरे धीरे निराश हो वेमन से कार्य करने लगेगा. यदि आप श्रेय देने और प्रशंसा करने में कंजूसी करते हैं तो धीरे धीरे आपका प्रभाव, उद्योग, व्यवसाय, समाज या परिवार आपसे छूटते जायेगा.

6

  • दूसरों के जिस त्याग, आदर्श और संघर्ष के प्रशंसक हैं स्वयं को उन आदर्शों से दूर रखना!

कई लोग ऐसे भी हैं जो गाहे-बगाहे, मौके-बेमौके  लोगों की जमकर प्रशंसा करते हैं, उनके जैसे आचरण को अपनाने योग्य भी बताते हैं किंतु अपनाने की शुरुआत कभी नहीं कर पाते… ऐसे लोग ताली बजाकर विशिष्ट लोगों के कृपा पात्र तो  बन जाते हैं किन्तु स्वयं कभी विशिष्ट नहीं हो पाते.

7

  • स्वयं को सम्पूर्ण समझकर केवल दूसरों में ही सुधार की गहन अपेक्षा और प्रयास भी!

कुछ लोग स्वयं को इतना समझदार समझते हैं कि वे अन्य लोगों को अयोग्य, नादान, नासमझ या मूर्ख समझने लगते हैं.  ऐसे लोग सभी में सुधार लाने का प्रयास करते रहते हैं किन्तु अपने अंदर झांककर देखने में अक्षम होते हैं. ऐसे लोग अकसर अंधों में काने राजा जैसे होते हैं और सदैव अंधों के बीच ही रहना / बसना पसंद करते हैं. स्वाभाविक रूप से स्वस्थ आँखों वालों के सामने ये तुच्छ होते हैं क्योंकि ये  अपनी एक आँख से देखते हुए भी अपनी दृष्टि पर गौरव करते रहते हैं… अपनी दूसरी आँख के स्वस्थ होने की सम्भावना होते हुए भी उसपर चर्चा तक नहीं करना चाहते…. ये आजीवन अपूर्ण व्यक्तित्व वाले ही रहते हैं. ये लोग मानते हैं कि ये दुनियाँ! ये महफिल मेरे काम की नहीं•••• क्योंकि दुनियाँ बहुत गंदी है और मैं निर्मल! दोष तो सदैव दूसरों का ही होता है… ये अपनी कमियों की ओर देखना ही नहीं चाहते, चाह लें तो देख नहीं पाते, देख लें या कोई और बताये तो स्वीकार  नहीं पाते, स्वीकार भी लें तो सुधारना नहीं चाहते,  सुधारना भी चाह लें तो सुधार के लिये आवश्यक मार्ग, मार्गदर्शन या इच्छाशक्ति ही नहीं जुटा पाते!

8

  • स्वयं को दीनहीन, अकिंचन व नैसर्गिक दोषी मानना…

मुस्लिम, ईसाई, हिन्दुओं जैसे बड़े धर्मों की प्रार्थनाओं में स्वयं को (केवल उस सर्वोपरि के सम्मुख) पापी, तिनके समान और अवगुणों से युक्त होने को बोलते रहने से स्वयं को सर्वशक्तिमान के अतिरिक्त शेष संसारियों से भी निकृष्ट, निरीह व अकिंचन होना ही अपनी नियति मान लेते हैं! सभी धर्मों के धर्मानुयायी धर्माचार्यों को ही धर्म पालन योग्य मानकर स्वयं को अपने ही धर्म के पालन के अयोग्य मान लेते हैं. जबकि किसी भी धर्म में धर्माचार्य और धर्मानुयाइयों के लिये अलग-अलग आचारसंहिता नहीं है. प्रार्थनाओं में  वर्णित ‘अकिंचन’  के पीछे का यथार्थ ना समझ पाने से स्वयं में सुधार की संभावना ही समाप्त कर लेना.

9.

  •  ना अवसर को पहचानना ना उसका लाभ उठाना. 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समय समय पर अनेक अवसर उपस्थित होते रहते हैं किंतु अधिकांश लोग अवसर को पहचान ही नहीं पाते, पहचान लें तो उस अवसर का पूरा लाभ उठाने का निर्णय नियत समयसीमा में नहीं कर पाते , निर्णय कर लें तो उसपर चल नहीं पाते. सामानयत: जीवन में असफलता का बहुत बड़ा कारण यही होता है.

10.

  • योजना विहीन प्रयास कर लक्ष्य साधने के प्रयास में समय, धन व ऊर्जा व्यर्थ गँवाना.

अवसर को देर सबेर पहचान कर, लक्ष्य निर्धारित कर लेना किन्तु योजना बनाये बिना मुँह उठाकर चल देने से साधारण लक्ष्य की प्राप्ति में भी भ्रमित होते रहकर समय, धन व ऊर्जा का अपव्यय ही होता है. उदाहरण के लिये किसी दिन आपका ड्राइवर छुट्टी पर है और आपकी महत्वपूर्ण बिजनेस डील के लिये कोई वी आई पी आया हुआ है जिसे एयरपोर्ट से आपको गाड़ी लेकर लेने जाना पड़ रहा है, आपके घर / आफिस से एयरपोर्ट 25-30 किलोमीटर दूर है और पहुंचने के 3-4 रास्ते हैं. आप ड्राइवर पर झल्लाते हुए गाड़ी निकालकर चल देते हैं…  नेवीगेटर की मदद भी नहीं लेते और चल देते हैं 3-4 कि मी दूर पहुँचने पर आपको लगता है कि आपने गलत रास्ता चुना है दूसरा रास्ता इससे बेहतर होता…  और आप 1-1-1/2 कि मी का डायवर्शन लेकर दूसरे रास्ते से पहुँचने का प्रयास करते हैं. आपके पहुँचने तक अतिथि टैक्सी अरेंज कर लेता है किन्तु आप पहुँच जाते हैं और वह टैक्सी छोड़कर आपके साथ ही आता है. ऐसी स्थिति में आपकी व्यावसायिक डील मीटिंग के पहले ही 90% असफल हो चुकी रहेगी. छोटी-छोटी चीजों को व्यवस्थित तरीके से करने की जरुरत इसीलिए होती है कि आपकी आदत में व्यवस्थित रहना शामिल हो. कुछ भी करने से पहले योजना बनाने में कुछ समय अवश्य खर्च किया जाये और योजनानुसार ही उसपर अमल किया जाये तो जीवन सफल नहीं तो असफल करने के लिये किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती बस आपको ज़रा सा लापरवाह भर होना होगा! 

-सुबुद्ध सत्यार्चन