सुख चाहिये? ये लीजिए! – 10 (असफलता के 10 सूत्र)

कुछ भी करने से पहले योजना बनाने में कुछ समय अवश्य खर्च किया जाये और योजनानुसार ही उसपर अमल किया जाये तो जीवन सफल नहीं तो असफल करने के लिये किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती बस आपको ज़रा सा लापरवाह भर होना होगा! 

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असफलता के 10 सूत्र

99% लोग असफलता के  इन्हीं 10 सूत्रों पर चलते हैं••• शायद आप भी•••!

 सफलता का सुख चाहिये तो स्वयं के परिवेश का ईमानदारी से आंकलन करें, इन 10 में से किसी मार्ग पर हों तो मार्ग बदलें, सफल/ सुखी हो जायें!

मैं भी प्रयासरत ही हूँ!

1

  • दूसरों के जिस तरह के व्यवहार*

से आप चिड़ते हैं

  • *की आलोचना करते हैं

*का मज़ाक उड़ाते हैं!

  • वैसा ही व्यवहार स्वयं भी करते रहते हैं! 

2

  • हर किसी प्रशंसक की प्रशंसा से अभिभूत होकर अपना हित-अहित ही भूल जाना!

“प्रशंसा तो हर एक को प्रिय होती है… मुझे भी और आपको भी… किन्तु पर एक प्रशंसक सच्चा नहीं होता, अच्छा नहीं होता समाज में फैले चालबाज़ियों से युक्त लोग आपको ठगने, लूटने के उद्देश्य से भी आप में कोई विशेषता ढूंढ कर या गढ़कर आपकी प्रशंसा कर रहे होते हैं…  प्रशंसा करने वाले से उत्साहित होकर उसकी हर थ्योरी को उचित मानने बाध्य हो जाने से आप उसे, आपको या आपके अपनों को ठगने का मार्ग दे देते हैं ! परिणाम में नुकसान की संभावना अधिक होती है या कई बार उठाना ही पड़ता है!

3

  • प्रशंसा की अपेक्षा सबसे रखना, किन्तु प्रशंसा करने में कंजूस होना! 

आपकी ही तरह हर कोई अपने पाये हुए, मिले हुए , किये हुए, के प्रति  गौरवान्वित हो या ना हो किन्तु सार्वजनिक रूप से वह गौरवान्वित ही प्रदर्शित रहना चाहता / चाहती  है, जैसे कोई आपके बनवाये या खरीदे हुए मकान, आपकी संतान, आपकी उपलब्धि आदि की सराहना कर आपको अपने प्राप्त पर गौरव का अनुभव कराता है वैसे ही यदि आप दूसरों को नहीं करा पाते हैं तो शीघ्र ही आप भी ऐसी प्रशंसा से वंचित होते जायेंगे!

4

  • त्रुटि इंगित कर सुधार के मार्ग  सुझाने वाले से  दूरी बना लेना! 

जिन्हें आपकी नाराज़गी से अधिक आपके हित की चिंता होती है अक्सर वे ही आपके सच्चे मित्र होते हैं. किन्तु कई लोगों में अपनी कैसी भी आलोचना  किसी से भी सुनना इतना अप्रिय लगता है कि वे धीरे-धीरे अपने सच्चे मित्रों को खोते जाते हैं और केवल स्वार्थी चाटुकारों से घिरे रह जाते हैं.

5

  • श्रेय लेने में सबसे आगे किन्तु श्रेय देने या जिम्मेदारी लेने से दूरी बनाये रखना! 

किसी समस्या का उचित समाधान या आयोजन का सफल प्रबंध करने में आपके सफल रहने पर उपस्थित लोगों में से अधिकांश से/ किसी किसी से / किसी से आपको इसका श्रेय दिये जाने पर जैसी प्रशंसा आपको होती है वैसी ही अन्य को भी होती ही होगी…  किसी के किये गये किसी भी कार्य के संचालन पर उसे उसका श्रेय या प्रशंसा या दोनों ही ना मिलें तो भविष्य में वह आपके लिये किसी अन्य अवसर पर  उतने मन से कार्य नहीं कर रहा होगा. धीरे धीरे निराश हो वेमन से कार्य करने लगेगा. यदि आप श्रेय देने और प्रशंसा करने में कंजूसी करते हैं तो धीरे धीरे आपका प्रभाव, उद्योग, व्यवसाय, समाज या परिवार आपसे छूटते जायेगा.

6

  • दूसरों के जिस त्याग, आदर्श और संघर्ष के प्रशंसक हैं स्वयं को उन आदर्शों से दूर रखना!

कई लोग ऐसे भी हैं जो गाहे-बगाहे, मौके-बेमौके  लोगों की जमकर प्रशंसा करते हैं, उनके जैसे आचरण को अपनाने योग्य भी बताते हैं किंतु अपनाने की शुरुआत कभी नहीं कर पाते… ऐसे लोग ताली बजाकर विशिष्ट लोगों के कृपा पात्र तो  बन जाते हैं किन्तु स्वयं कभी विशिष्ट नहीं हो पाते.

7

  • स्वयं को सम्पूर्ण समझकर केवल दूसरों में ही सुधार की गहन अपेक्षा और प्रयास भी!

कुछ लोग स्वयं को इतना समझदार समझते हैं कि वे अन्य लोगों को अयोग्य, नादान, नासमझ या मूर्ख समझने लगते हैं.  ऐसे लोग सभी में सुधार लाने का प्रयास करते रहते हैं किन्तु अपने अंदर झांककर देखने में अक्षम होते हैं. ऐसे लोग अकसर अंधों में काने राजा जैसे होते हैं और सदैव अंधों के बीच ही रहना / बसना पसंद करते हैं. स्वाभाविक रूप से स्वस्थ आँखों वालों के सामने ये तुच्छ होते हैं क्योंकि ये  अपनी एक आँख से देखते हुए भी अपनी दृष्टि पर गौरव करते रहते हैं… अपनी दूसरी आँख के स्वस्थ होने की सम्भावना होते हुए भी उसपर चर्चा तक नहीं करना चाहते…. ये आजीवन अपूर्ण व्यक्तित्व वाले ही रहते हैं. ये लोग मानते हैं कि ये दुनियाँ! ये महफिल मेरे काम की नहीं•••• क्योंकि दुनियाँ बहुत गंदी है और मैं निर्मल! दोष तो सदैव दूसरों का ही होता है… ये अपनी कमियों की ओर देखना ही नहीं चाहते, चाह लें तो देख नहीं पाते, देख लें या कोई और बताये तो स्वीकार  नहीं पाते, स्वीकार भी लें तो सुधारना नहीं चाहते,  सुधारना भी चाह लें तो सुधार के लिये आवश्यक मार्ग, मार्गदर्शन या इच्छाशक्ति ही नहीं जुटा पाते!

8

  • स्वयं को दीनहीन, अकिंचन व नैसर्गिक दोषी मानना…

मुस्लिम, ईसाई, हिन्दुओं जैसे बड़े धर्मों की प्रार्थनाओं में स्वयं को (केवल उस सर्वोपरि के सम्मुख) पापी, तिनके समान और अवगुणों से युक्त होने को बोलते रहने से स्वयं को सर्वशक्तिमान के अतिरिक्त शेष संसारियों से भी निकृष्ट, निरीह व अकिंचन होना ही अपनी नियति मान लेते हैं! सभी धर्मों के धर्मानुयायी धर्माचार्यों को ही धर्म पालन योग्य मानकर स्वयं को अपने ही धर्म के पालन के अयोग्य मान लेते हैं. जबकि किसी भी धर्म में धर्माचार्य और धर्मानुयाइयों के लिये अलग-अलग आचारसंहिता नहीं है. प्रार्थनाओं में  वर्णित ‘अकिंचन’  के पीछे का यथार्थ ना समझ पाने से स्वयं में सुधार की संभावना ही समाप्त कर लेना.

9.

  •  ना अवसर को पहचानना ना उसका लाभ उठाना. 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समय समय पर अनेक अवसर उपस्थित होते रहते हैं किंतु अधिकांश लोग अवसर को पहचान ही नहीं पाते, पहचान लें तो उस अवसर का पूरा लाभ उठाने का निर्णय नियत समयसीमा में नहीं कर पाते , निर्णय कर लें तो उसपर चल नहीं पाते. सामानयत: जीवन में असफलता का बहुत बड़ा कारण यही होता है.

10.

  • योजना विहीन प्रयास कर लक्ष्य साधने के प्रयास में समय, धन व ऊर्जा व्यर्थ गँवाना.

अवसर को देर सबेर पहचान कर, लक्ष्य निर्धारित कर लेना किन्तु योजना बनाये बिना मुँह उठाकर चल देने से साधारण लक्ष्य की प्राप्ति में भी भ्रमित होते रहकर समय, धन व ऊर्जा का अपव्यय ही होता है. उदाहरण के लिये किसी दिन आपका ड्राइवर छुट्टी पर है और आपकी महत्वपूर्ण बिजनेस डील के लिये कोई वी आई पी आया हुआ है जिसे एयरपोर्ट से आपको गाड़ी लेकर लेने जाना पड़ रहा है, आपके घर / आफिस से एयरपोर्ट 25-30 किलोमीटर दूर है और पहुंचने के 3-4 रास्ते हैं. आप ड्राइवर पर झल्लाते हुए गाड़ी निकालकर चल देते हैं…  नेवीगेटर की मदद भी नहीं लेते और चल देते हैं 3-4 कि मी दूर पहुँचने पर आपको लगता है कि आपने गलत रास्ता चुना है दूसरा रास्ता इससे बेहतर होता…  और आप 1-1-1/2 कि मी का डायवर्शन लेकर दूसरे रास्ते से पहुँचने का प्रयास करते हैं. आपके पहुँचने तक अतिथि टैक्सी अरेंज कर लेता है किन्तु आप पहुँच जाते हैं और वह टैक्सी छोड़कर आपके साथ ही आता है. ऐसी स्थिति में आपकी व्यावसायिक डील मीटिंग के पहले ही 90% असफल हो चुकी रहेगी. छोटी-छोटी चीजों को व्यवस्थित तरीके से करने की जरुरत इसीलिए होती है कि आपकी आदत में व्यवस्थित रहना शामिल हो. कुछ भी करने से पहले योजना बनाने में कुछ समय अवश्य खर्च किया जाये और योजनानुसार ही उसपर अमल किया जाये तो जीवन सफल नहीं तो असफल करने के लिये किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती बस आपको ज़रा सा लापरवाह भर होना होगा! 

-सुबुद्ध सत्यार्चन

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आइये अफवाहें फैलायें••• (अ)धर्म निभायें!

अब यह तो हम पर ही है कि हम आँख मूँदकर मनगढ़ंत अफवाहों को अग्रेषित कर देश में उथल-पुथल मचाने में सहयोगी हों! या आँख खोलकर अग्रेषम से पहले पुष्टि कर लें! …आपके सहयोग से फैलाई गई  अफवाह  से  यदि  किसी  निर्दोष  की  हत्या  भीड़  द्वारा कर दी जाती है तो भीड़ से अधिक बड़े हत्यारे आप हैं! दुनियाँ की अदालत भले आपको सजा दे पाये या ना दे पाये… किन्तु “उसकी अदालत”  सजा देने में ना पक्षपात करती है ना जरा सा भी रहम !

आइये अफवाहें फैलायें••• (अ)धर्म निभायें! 

🅾 आज का सुबुद्ध संदेश 💯

आपको-हमको सभी को आये दिन अग्रेषित संदेश मिलते रहते हैं! ज्यादातर ज्ञान वितरण के••• जो उपयोगी भी हो सकते हैं! किन्तु अनेक सनसनीखेज संदेश भी आते हैं••• तुरंत आगे बढ़ाने के अनुरोध सहित!

           अब यह तो हम पर ही है कि हम आँख मूँदकर मनगढ़ंत अफवाहों को अग्रेषित कर देश में उथल-पुथल मचाने में सहयोगी हों! या आँख खोलकर अग्रेषम से पहले पुष्टि कर लें! 

सामान्यतः ये संदेश इस तरह के होते हैं-

1- किसी अंजान की मदद करनेे  के लिए फोटो/ वीडियो व मोबाइल नं सहित/ रहित!
(एक मुम्बई से पूणे के लिये यात्रा रत 17 बर्षीय बच्ची का मदद की गुहार वाला सीट नं, कोच नं, ट्रेन नं, मोबाइल नंबर सहित  “एक ही संदेश” 1 साल तक अलग अलग सम्पर्कों से अग्रेषित होकर आता रहा••• पहली बार यह संदेश मिलते ही फोन लगाया तो समझ आ गया कि वो भावुक लोगों की भावनाओं से खेलने वालों का फ्राड है! हमने  पुष्टि की और फिर किसी अन्य  को अग्रेषित नहीं किया! एक और मेसेज 6-7 वर्षीय बच्चे की गम्भीर बीमारी के इलाज मेंं मदद के नाम पर दिल्ली यूनिवर्सिटी केे बच्चों का आने वाले संदेश, फोनकाल आदि…

2-  फोटो / वीडियो के साथ  बच्ची / बच्चा मिला है / गुमा है का संदेश भी बहुत आता है मगर

*कोई सुराग मिलने पर किसे /कहाँ सूचना देनी है संदेश में नहीं होता आप ही बताइए ऐसे संदेश को अग्रेषित करने का क्या लाभ होगा?*

3- आपके अपनों को  आने वाली आपदा से बचाने के लिए! अनेक संदेश आपके धर्म पर मँडराते (तथाकथित) खतरे के विरुद्ध आपको जगाने के लिये! किसी स्थान विशेष के उल्लेख के साथ आपके धर्म / मजहब वालों के साथ होते हुए अत्याचार आदि के फोटो/वीडियो सहित अनेक संदेश आते रहते है जिनमें से 99% झूठे ही होते हैं… आपको भी सत्यता पर संदेह हो रहा होता है, तब भी आप पहले फारवर्ड करने का धर्म निभाते हैं फिर पुष्टि करने का प्रयास…???   

आपके सहयोग से फैलाई गई  अफवाह  से  यदि  किसी  निर्दोष  की  हत्या  भीड़  द्वारा कर दी जाती है तो भीड़ से अधिक बड़े हत्यारे आप हैं! दुनियाँ की अदालत भले आपको सजा दे पाये या ना दे पाये… किन्तु “उसकी अदालत”  सजा देने में ना पक्षपात करती है ना जरा सा भी रहम !

सावधान रहिये!
सुरक्षित रहिये!
जीवन पर्यंत और जीवनोपरांत भी!

निष्फल-सत्संग!

निष्फल-सत्संग! 

अपनी प्रेक्षण क्षमता व उपलब्ध साधनों की सहायता से एक बार अपने आसपास, परिचितों, समाज,  देश में,  स्वयं ही देखकर निम्न का आंकलन कीजिए-

1- प्रतिष्ठित भजन /कैरल्स / सूफी के गायक।

2- प्रतिष्ठित ‘भक्ति-काव्य’ गायन मंडली के प्रमुख।

3- प्रतिष्ठित प्रवचन-कर्त्ता!

4- प्रतिष्ठित पुजारी / पादरी /मौलाना!

5- प्रतिष्ठित उपदेशक••• आदि!

ध्यान दीजिएगा मैं यहाँ प्रतिष्ठित की बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध की नहीं!

क्या इन सभी से हमें सराहनीय! बहुमूल्य! अति उपयोगी! वंदनीय व अनुकरणीय! वचनामृत की प्राप्ति होती है?

इन सबके व्यक्तित्व में एक विशिष्ट समरूपता मिलती है••• और वह है उनका सौम्य, संतुलित, सहृदयी व सारगर्भित व्यवहार सहित वे तेजोमय  प्रभामंडल युक्त दिखते हैं! अदम्य साहसी होते हैं किन्तु आक्रामक नहीं! क्यों?

क्योंकि धार्मिक साहित्य में निहित संदेशों को निरंतर सुनाते हुए वे स्वयं भी सुन रहे होते हैं, समझ रहे होते हैं! धीरे- धीरे यही सदाचार उनका सहज व्यवहार बनते जाता है! जो जितनी तेजी से अंगीकार कर पाता है वह उतना ही जल्दी प्रतिष्ठित हो पाता है!  प्रतिष्ठित होने पर स्थायी प्रसिद्धि, स्थिर वैभव की प्राप्ति सहज हो ही जाती है !

किन्तु जनसाधारण जो कभी कभार या अकसर भी भजन, प्रवचन, कथा, सत्संग आदि सुनता है ! उनमें से  अधिकांश लोग यह जानते-मानते हैं कि धर्म कथा के श्रवण से पुण्य या लाभ मिलता है किन्तु यह नहीं जानते कि क्यों और कैसे मिलता है! वे सुने गये को आदर्श तो मानते हैं  किन्तु उन आदर्शों पर चलने के लिये स्वयं को सर्वथा अयोग्य भी मानते हैं! यही कारण है कि घंटों पूजा-पाठ करने वाले और नियमित सत्संगियों में से आधे आराधक; ‘संशययुक्त आस्थावश’ अपनी आराधना व आराध्य दोनों से ही असंतुष्ट बने रहते हैं!

जबकि सदाचार कतई असंभव नहीं है! और संसार में रहकर शतप्रतिशत  सदाचारी (सम्पूर्ण)  तो कोई हो ही नहीं सकता••• अवतार भी नहीं••• किन्तु संसार सागर से “निष्फल” चले जाने से पहले

उत्तीर्ण होने योग्य प्रतिशत पाने के प्रयास में तो हर कोई सफल हो सकता है!

 जरा से गहन और गंभीर प्रयास प्रथम श्रेणी भी दिला देंगे!

चिरंतन व निरंतर  प्रयासों से प्रवीणता भी मिल सकती है! 

बस इस परीक्षा में कोई सर्वोच्च नहीं होता! क्योंकि सबको अपना अपना ही अंतिम परिणाम प्राप्त होता है ••• किसी अन्य  का परिणाम किसी अन्य को बताया ही नहीं जाता!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें! 

*कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें!*

जिसकी गोद में खेलकर बड़े हुए, जिससे सब कुछ अधिकार पूर्वक लेते रहे, उसकी तरफ भी, कुछ तो जवाबदेही बनती है ना हमारी…!

*प्रकृति / कुदरत से, बस कर्ज लिये जा रहे हैं… इस कर्ज को   उतारने की क्यों नहीं सोचते?*

क्या नहीं लेते हैं हम प्रकृति से…? और जो भी लेते हैं ज्यादातर प्रकृति को नोंचकर! सुख के साधन जुटाने और जीवन यापन योग्य होने लायक शुरुआती शिक्षा (हाँ. से. तक की ही) पाने में, हम अमूमन 20-25 पेड़ों को काटकर बनाये गये कागज का उपयोग कर चुके होते हैं…! और पेड़ लगाने की कौन-कब सोचता है?

*क्या यह कृतघ्नता नहीं है?*

*अच्छा है कि; सब के सब कृतघ्न नहीं हैं…! आप भी मत रहिये!*स्वयं के लिये, स्वजनों के लिये या मानवता के लिये…*कृतघ्नता त्यागिये!*

*पेड़ लगाइये!*

*पहले से लगे पेड़ों को कटने मत दीजिये!!*

*बढ़ते पौधों को पानी की कमी से मरने मत दीजिये!!!*

(अपने उपयोग किये गये / अतिरिक्त बहते पानी को ही पेड़ों की ओर मोड़ दीजिये)!

अकारण बिजली के उपकरण मत चलाइये! शौकिया वाहन मत दौड़ाइये!!!!

*कूलर / ए सी का कम से कम उपयोग करने के लिये अपने घर हवादार बनवाइये /करवाइये!!!*

बेहतर जल-प्रबंधन कर पानी का दुरुपयोग रोकिये!!!!!!

*केवल “पौध रक्षा बांड” भरकर पौधे हमसे मुफ्त में लीजिये!*

कम  से कम उतने पेड़ तो लगाइये / लगवाइये जितने काटे जाने का कारण बने!

*आइये प्रकृति का कर्ज उतारें!!*

दूसरों को भी प्रेरित करें!!!

*मानवता धर्म निभायें!!!*

नोट–  उपरोक्त प्रस्तावों में से किसी पर भी विस्तृत सहायता हेतु हमसे इस पोस्ट पर टिप्पणी कर या केवल व्हाट्सऐप संदेश /ध्वनि संदेश/ वीडियो संदेश द्वारा ही (काल हेतु नहीं!)

मो• नं•  888 9512 888 पर सम्पर्क कीजिये.

मुझे उपदेश का अधिकार नहीं?

मुझे उपदेश का अधिकार नहीं?

 मेरे सुझावों/ संदेशों को अव्यवहारिक मान सकते हैं ..

इसीलिये यह अग्रिम स्पष्टीकरण देना अपना कर्त्तव्य समझ प्रस्तुत कर रहा हूँ } –

साथ ही एक निवेदन भी कि –

“उपदेशक के व्यक्तित्व से अधिक सन्देश की उपयोगिता को महत्त्व देना चाहिए ”
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं –
पर उपदेश कुशल बहुतेरे …
हममें से अधिकांश
किसी उपदेश की प्रतिक्रिया में
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखित
उक्त पंक्तियाँ दोहरकर
उपदेशक पर अव्यावहारिक होने का दोष मढ़ते रहते हैं .
मजेदार बात यह है कि
आधी चौपाई ही प्रचलित है
पूरी चौपाई कम ही लोगों को याद आ पाती है –

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर ना घनेरे ”
पूरी चौपाई मालूम भी हो जाए तो
यही समझा जाता है कि
खुद अपने उपदेशों पर आचरण करने वाले कोई नहीं होते !
किन्तु ऐसा समझना कितना ठीक है ?
सन्देश तो यह है कि 

“दूसरों को उपदेश देना तब ही ठीक है जब उनका अनुपालन उपदेशक स्वयं करता हो!”

आमजन सोचता है  हम आम हैं , खास नहीं !
और हमें खास होने की आवश्यकता ही क्या है ?
आप अपने आदर्शों का पालन करने स्वतंत्र हैं 

किन्तु मुझे आदर्श आचरण करने की क्या आवश्यकता है !

आज का उपदेशक स्वयं को विशिष्ट मानकर

सामान्य जन से अनुपालन की अपेक्षा में उपदेश देता है

और आमजन स्वयं को किसी आदर्श के अनुपालन का अधिकारी ही नहीं मानता !

इसीलिये जानने वालों की, लिखाने वालों की संख्या तो

दिनों दिन बढ़ रही है !

मगर मानने वाले ढूढ़़ना कठिन हो गया है!

जबकि मेरे किसी भी ब्लॉग पर कहीं भी लिखा गया

कोई भी व्यक्तिगत या सामाजिक सुझाव
ऐसा नहीं है जिसका अनुपालन मैं स्वयं नहीं करता !


कारण मेरे कुल के आदर्शवादी संस्कार होंगे शायद !

निश्चय ही आसान नहीं होता कि
जिन आदर्शों का हम समर्थन करें
उन्हें अपनाएँ भी
किन्तु
सरल तो कुछ भी नहीं!
जो जितना कठिन कार्य होगा
उसका प्रतिफल भी उतना ही सुखकर होगा !

मेरी जीवनचर्या के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ .
इस उद्देश्य के साथ कि मेरे जैसा “आम आदमी” भी ऐसा है .
तो हर कोई हो सकता है !

मैं मेरे देश से प्रेम करता हूँ इसीलिये
क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता का खुलकर विरोध करता हूँ !

.

{मेरे लिए भारत देश मेरा बहुत बड़ा मकान है जिसमें
मेरा निवास भी है, कार्यालय भी, बगिया भी ,खेती – बाड़ी भी
केरल,कर्नाटक , तमिलनाडु, आन्ध्र और महाराष्ट्र, गुजरीत मुख्यद्वार से लगे कार्यालय एवं बैठक हैं,
दक्षिणी प्रदेश में लान, बाग़, बगीचे और जलनिधि हैं ,
पूर्वोत्तर पिछवाड़े का कछवारा है,
पंजाब, हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड आदि मेहमानखाने { गेस्टरूम }
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान , बिहार आदि प्रदेश
शयन कक्ष ,भोजन कक्ष ,रसोई आदि जरुरी हिस्से हैं .}
.

जितने उपलब्ध हो सके विभिन्न धर्म के ग्रंथों को पढ़ने / समझने का प्रयास किया
किसी भी भारतीय {हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई , बौद्ध, जैन आदि } धर्म में
एक भी असंगत बात नहीं मिली सभी में उचित आदर्शों के पालन के सन्देश मात्र
किसी धर्मं में एक भी शब्द मानवता विरोधी नहीं मिला .
.
इसीलिये सभी धर्मों का सामान रूप से आदर करता हूँ
.

मेरा परिवार

– जातपात पूछकर किसी से किसी तरह का व्यवहार नहीं करता !
– ना ही जाति के आधार पर व्यवहार परिवर्तन !
– दीपावली पर दीपमालिका तो सजाता है मगर
पटाखों पर खर्च करने के स्थान पर अनाथालयों , वृद्धाश्रमों में सामर्थ्यानुसार फल आदि पंहुचाता है !
– भिखारी को नकद भीख ना देकर भोजन सामग्री ही देता है !
– किसी भी धार्मिक समारोह {गणेशोत्सव , दुर्गोत्सव जैसे } में चंदा नहीं देता किन्तु
श्रद्धानुसार / सामर्थ्यानुसार पूजन /हवन /प्रसाद सामग्री का योगदान करता है !
– होलिकोत्सव पर कोई भी रासायनिक रंगों का प्रयोग नहीं करता !
– रेलवे स्टेशन आदि सार्वजानिक जगहों पर कचरा पेटी थोड़ी दूर पर भी हो तो भी प्रयोग करने पूरा प्रयत्न करता है !
– देवी देवताओं की तस्वीरों सहित पैकिंग वाले उत्पाद ,अगरबत्ती/ धूपबत्ती आदि पूजन सामग्री भी, खरीदने से बचता है !
– आर्थिक असमर्थता के वर्ष छोड़कर प्रतिवर्ष किसी योग्य निर्धन छात्र /छात्रा को शिक्षा सामग्री, फीस आदि की सहायता करता है !
– परनिंदा रस परिचर्चा में योगदान नहीं करता !
-अपनों की प्रगति में अपनी प्रगति सा प्रसन्न होता है !

-विरोधियों की प्रगति से आहत नहीं !
– केवल कार्यों का विरोध करता है व्यक्तियों का नहीं !
– हमारा कोई दुश्मन नहीं !
– किसी अन्य के ज्ञात गुप्त प्रकरणों / शर्मिंदगी के कारकों का प्रचार प्रसार नहीं करता !
– पानी के दुरूपयोग को निरुत्साहित करने प्रयासरत रहता है !
– बेटा – बेटी – बहु की समानता का समर्थक है !
(मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर बेटी नहीं जन्मीं तब किसी अनाथ को गोद लेने का २० वर्षों तक असफल प्रयास किया
अनाथालयों ने या तो एक संतान के होते हुए दूसरी को गोद ना दे पाने की कानूनी मजबूरी कह टाल दिया या
बड़ी राशी के योगदान की शर्त रखी. मैं दोनों तरह से अयोग्य था. अब बच्ची की जिम्मेदारियां पूरी कर सकने योग्य
उम्र शेष नहीं लगती . इसीलिये इस कमी के साथ रहने की आदत डाल ली है .
हाँ बेटे और सजातीय/ विजातीय बहु दोनों हमारे लिए एक समान मान्य हैं)
.

कैसे किया ? क्या खोया ? क्या पाया ?

.

एक दिन में नहीं हुआ सबकुछ .
मैं शुरुआत से ऐसा ही नहीं हूँ
मैंने भी अपरिपक्वता की आयु में पिताजी से असहमति जताई है .
मैं भी पिताजी के आदर्शवादिता वश आर्थिक अभावों से आक्रोशित रहा हूँ
किन्तु समय के साथ साथ पुस्तकों और परिचर्चाओं से परिपक्वता बढ़ती जा रही है,
और ईमानदारी से परिपूर्ण आदर्शों भरा जीवन जीने का वास्तविक सुख उठाकर
मेरे साथ साथ मेरी पत्नी, मान्य बेटियाँ और बेटे भी गौरवान्वित हैं !
मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे आदर्शों के पालन में
मेरी पत्नी और बेटों के साथ साथ नवसम्मिलित बेटियों का भी समर्थन और सहयोग प्राप्त है .

पत्नी वैवाहिक जीवन कि प्रत्येक वर्षगाँठ के साथ साथ और अधिक अनुसारी होते होते
२३ वे वैवाहिक वर्ष तक आदर्शवादिता में मुझसे आगे निकल चुकी हैं .
यही हाल बेटों का है .

जैसे मैंने मेरे पिताजी के सिद्धांतों को पाला
मेरे बेटे मुझसे अधिक अच्छी तरह
मुझसे अपेक्षाकृत बहुत कम आयु में
उन्हीं आदर्शों को प्रसारित कर रहे हैं .

क्या खोया ? क्या पाया ?

-मेरे स्कूल में दाखिले के समय मैं बहुत शर्मीला था
जैसे तैसे पहली कक्षा में दाखिला हुआ
छोटे से गाँव के छोटे से सरकारी प्राइमरी स्कूल में .
वहां के हेड मास्टर भी सिद्धांतवादी ही थे
साल भर सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के बाद
परीक्षा में जाने क्या हुआ था मुझे
मास्साब के बार बार कहने पर भी कि “कहानी सुनाओ नहीं तो फेल हो जाओगे ”
मैंने कहानी नहीं सुनाई तो नहीं सुनाई ,
और मैं फेल हो गया
पिताजी के साथियों ने बहुत कहा
“बड़े बाबू आप जाकर मिल लो,

मास्साब आपकी बात रखेंगे,

बच्चे का साल बच जाएगा ”
मगर पिताजी को पढ़ाई में पक्षपात पूर्ण परिणाम पसंद नहीं था
अगले ही वर्ष से मुझे स्वयं भी घर पर पढ़ाई में मदद करने लगे
और तब से ही हर साल हर कक्षा में मेरा परीक्षा परिणाम सर्वप्रथम रहने लगा था .
मैंने एक साल खोया था किन्तु जो पाया वह तो वर्णनातीत है …

– मेरे विवाह के बाद पत्नी से पहले संवाद में
पत्नी ने पूछा “मुझसे कितना प्यार करते हो ?”
मेरा उत्तर था

“हम आज पहली बार मिल रहे हैं… अभी तो एक दुसरे को ठीक तरह देखा भी नहीं…
अभी तो प्यार का जन्मना भी शेष है ”

उन्हें अच्छा नहीं लगा  “क्या यह काफी नहीं कि हम पतिपत्नी हैं ? ”

मैंने समझाने का प्रयास किया “हम पति पत्नी हैं यह हमारा रिश्ता है

किन्तु किसी भी रिश्ते में प्यार का पल्लवन एक दूसरे के प्रति किये जाने वाले व्यवहार से होता है ,

आप मेरी पत्नी हैं जिस तरह मैं आपसे और आप मुझसे व्यवहार करेंगी उसी तरह प्रेम बढ़ेगा ”
उन्हें इस बात पर मुझसे सहमत होने में २० वर्ष लग गए किन्तु
आज हम दोनों मिलकर ही पूर्ण हैं , एक दूसरे के बिना, दोनों ही आधे हैं .
वो एक विदुषी महिला हैं किन्तु मेरी और उनकी विचारधारा ठीक विपरीत थी
दोनों ही अपूर्ण , दोनों ही दोष सहित किन्तु
दोनों के विचारों के मेल से एक नयी विचारधारा का जन्म हुआ

और आज दोनों मिलकर एक सशक्त दंपत्ति !
-जब जिसके लिए जो कर सकते थे
हम करते रहे
परिणामतः हमारे नाम किसी बैंक में कोई फिक्स डिपाजिट नहीं ,
कोई और नगद निवेश भी नहीं !
किन्तु इस रास्ते पर चलते ,

हममें से हर एक के पास, अपने-अपने सम्पर्कों के, अपनेपन की अनेकीनेक फिक्स डिपाजिट हैं.
इनका पता तब चला जब विगत २ वर्ष (
2008-09) अस्वस्थता वश अवैतनिक अवकाश पर रहा !
मैं मेरे माता पिता का एकमात्र पुत्र और ३ बहनों का अकेला भाई ‘ था ‘
किन्तु आज मेरे कम से कम ५० ‘सगे भाई’ तो होंगे ही !
इतनी ही बहनें और बेटियां भी !
भले मैं धन संपन्न नहीं ,
किन्तु सुखी-समृद्ध अवश्य हूँ !
मुझ सी समृद्धि धन से नहीं मिलती !
धन की चाह
“साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ , साधू ना भूखा जाय ”
जितनी ही है!
यानी प्रभु इतना अवश्य दे देते हैं जिसमें
कुटुंब की आज के समय की आवश्यकताओं की पूर्ती हो जाती है.
और कितना चाहिए ?
क्योंकि
“पूत सपूत तो क्यों धन संचय
पूत कपूत तो क्यों धन संचय”
अति प्रासंगिक है .
मैं और मेरे परिजन
स्वयं को समृद्ध ही मानते हैं !
जिस तरह मैं स्वयं सुखी हो पाया हूँ ,
जिस मार्ग पर चलकर हो पाया हूँ
केवल वही अनुभूत उपदेश / सलाहें / सन्देश
मेरे लेखों के माध्यम से देने संकल्पित हूँ !
जिन्हें भी अन्यथा प्रतीत हो उनके लिए यह लेख लिखा है
फिर भी प्रश्न शेष हों तो प्रतिक्रिया खंड में स्वागत है .
मेरा स्पष्टीकरण या क्षमा याचना अवश्य वहां मिलेगी !

मेरी तस्वीरें मेरी भावनायें….

मेरी तस्वीरें मेरी भावनायें…..

ज़िद है जिद

   जिद है जिद…..

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दोस्तो:

हम हिन्दी हमारी संस्कृति के प्रति इतने कृतघ्न हो चुके हैं

कि हम हमारे  संस्कारों के उपहास में

स्वयं भी ना केवल सम्मिलित ही हैं

वरन अपने ही उपहास पर

अट्टहास किए जा रहे हैं!!!!!!

.

वे जो षणयंत्रकारियों के चंगुल में

असहायता-वश जा फँसे हैं या अविवेक-वश

उन्हें भी हाथ बढ़ाकर वापस खींचने का दायित्व

आप-हम संस्कारी भारतीयों का ही है!

पहला कदम बढ़ाने से पहले

आवश्यक है कि ‘हम-सब’

जागृत-जन एक साथ

हाथों में हाथ लेकर

कदम से कदम मिलाकर

साथ-साथ बढ़ें!!!

.

इसीलिए आव्हाहन और अनुरोध है

हर उस  सच्चे ‘हिन्दी-जन’ से

जिसे अपने हिन्दी होने पर गौरव हो!

जो अपने समस्त व्यतिगत, जातिगत, सामाजिक, राजनैतिक, क्षेत्रगत, अनुरागों से

राग-द्वेषों से  निष्पृह रह

हिन्दी के प्रति अपने दायित्व की प्रतिपूर्ति में

जो बन पड़े कर सके!

यथा-

जो लेखन में हैं

अपनी दृष्टि में अपनी सर्वोत्तम रचना भेजें,

या आपको किसी अन्य की कोई रचना प्रशंसनीय और पठनीय लगी हो

उसके ‘कापी राइट उल्लंघन’ से सुरक्षित रहते हुए

उसके संपादक / प्रकाशक आदि के उल्लेख के साथ हमें भेजें!

हिंदी लेखन से जुड़े अनेक ऐसे विशिष्ठ विचारक भी हैं

जिन्हें उचित अवसर, मंच या प्रायोजक मिलने शेष हैं

वे अपनी कृतियाँ हमें टिप्पणी या ई-मेल कर भेजें!

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जि़द़ है…. हिंदी, हिंद, हिंदु हित की अब ज़िद़ है….