लागा दाग…

प्रतिपल विस्तार पाते विगत को   क्षणिक वर्तमान पर अप्रभावी बना कर ही सुंदर, सुखद, सुमंगल एवं अनंत भविष्य का निर्माण संभव है!

लागा दाग!

दाग लगने के बाद?

जीवन है जीवन में चलते-फिरते, उठते-बैठते …. जीवन के विभिन्न उपक्रम करते हुए… चोट लगते रहती है… शरीर पर, कार पर घर की दीवार पर , मान-सम्मान पर…

कार पर हो… दीवार पर हो या शरीर पर या मान-सम्मान पर ही हो… चोट/ डेंट/ दाग ना लगता तो बहुत अच्छा था… मगर लग गया… लगने के बाद….
लगने के बाद???


केवल भविष्य में ना लगने देने के प्रयास का निर्णय लेने के अतिरिक्त सब व्यर्थ!
जो होना था हो चुका !


अब?


प्रतिपल विस्तार पाते विगत को   क्षणिक वर्तमान पर अप्रभावी बना कर ही सुंदर, सुखद, सुमंगल एवं अनंत भविष्य का निर्माण संभव है!-सुबुद्ध सत्यार्चन

जन्मेगा या भ्रूणहत्या…

जन्मेगा या भ्रूणहत्या…

सत्य क्या है? .

जैसे तीसहजारी वाली…

मां तथ्या के
गर्भ में छुपा है

वैसे ही सदा छुपा होता है…


महीनों बाद
गहन प्रसव पीड़ा उपरांत…
जीवित जन सकी
तो शिशु सत्य जन्मेगा
अन्यथा
भ्रूण हत्या का युग है

गर्भ समापन होगा?

कुछ सप्ताहों में
किस चिकित्सक ने
किसके कहने से
किस नाली में बहाया…

कौन जान सकेगा…

पूछेगा कौन
कौन याद रखेगा ?
.

शायद याद हो

कभी तथ्या काकी
हारकर नियति से
टेस्टट्यूब सेंटर तक हो आई थी …
उन दिनों
उसके ढलते बदन पर भी
गहरी लाली छाई थी…
पर पता नहीं
पता चल भी पाया हो

तथ्या काकियों को कभी कि….
किसके कहने से

किस-किस ने मिलकर

कहां-कहां….

कब-कब उसके भ्रूण की

हत्या करवाई थी?


कौन पूछता है हमारे यहां
भ्रूण का बनना…
किसी तथ्या की कोख में
किसी विश्वसुंदरी सी
सत्या का पलना…
कौन सोचता है?
पानी के बुलबुले से
भ्रूण बनते रहते हैं….
अच्छे उत्पादक हैं हम
फसल तो अच्छी ही उगाते हैं…
पर अपनी ही उपज की
गुणवत्ता पर
विश्वास कहां जताते हैं…
अपने आपको या
अपने उत्पादों को हम
कमतर से बढ़कर

बदतर आंकते हैं…


शुभ की कामना से अधिक
अशुभ की आशंकाएं लिए

अनिष्ट को हम ही बुलाते हैं…!
और तो और
आशंका के सजीव होने में
हम विजय सुख पाते हैं…!


हमारे अधिकांश प्रयास
निस्तेज ही होते हैं…
जैसे विवशता हो…

प्रयास करना…
ऐसे वेमन से किए जाते हैं…


तभी तो सत्य युग-युगान्तर में…
कभी कभार ही जन्म पाते हैं…
किंतु अजन्मे सत्य के भ्रूण
मां तथ्या के गर्भ में तो
हर दिन ही मारे जाते हैं!


जाने अब कभी
इस युग में
जन्म सकेगा सत्य?
या निस्तेज होती तथ्यायें…
बांझ कहलाते मरती जायेंगी….!!!

फैसला – न्याय!

बधाई भारत !
बधाईयां समूचे हिन्दुस्तान को….!!
धन्यवाद्!!! सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे निर्णय का जिससे सभी उत्सव मना सकें… अनेक जीवन समाप्त होने से/ मरणासन्न होने से बच सकें… ऐसे संतुलित निर्णय के लिए… धन्यवाद् सर्वोच्च न्यायालय!
न्याय यही था…हुआ!
आभार सर्वोच्च न्यायालय!

सुंदर सुखद साथ…


खूबसूरत सा वन…
सुंदर? जब सुखद मन…
सुखमन सच्चे साथ में पर
साथ सच्चा मिलना कठिन!
-सुबुद्ध सत्यार्चन

चलन

मिट्टी के तन में
सोने सा मन है!
आँसु के मोतियों से
सजा क्यों बदन है?
दूर से दिखती सुहानी
यही दुनियाँ का चलन है
-सत्यार्चन

सत दर्शन!

सत दर्शन!

⬆💐🙏🏽💐⬆

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सत्य की दर्शनाभिलाषा जिनके मन में हो उनका सत्य से साक्षात्कार सुनिश्चित है!
जिन्हें सत्य की सात्विकता के विचार मात्र से बदहजमी हो जाती है वे आजीवन आडम्बर जीते हैं … आडम्बर बाॅंटते हैं तो कुछ और कैसे पा लेंगे? यानी उनको प्राप्ति भी तो आडम्बर ही होगी ना… इनकी खुशी भी वैसी ही होती है… अवास्तविक ! केवल बाहरी दुनियां को दिखाने के लिए….! अंदर सब खाली…!
जबकि सतपथ के सत्पथिक के जीवन में कुछ भी अवास्तविक नहीं होता…!
चयन आपका!
आखिर…
जीवन है आपका!!
-सुबुद्ध

शुभविजयदिवस!

शुभविजयदिवस!

राम,रावण, राम राज्य व सोने की लंका सभी आदर्श/निकृष्ट प्रतीक!

ठूंठा धोबी के कटु तथा निंदनीय शब्दों पर भी उसे कोई सजा नहीं दी  श्रीराम ने! सपत्नीक स्वयं भुगती… भूल की?

रामराज्य में

‘श्रीराम की भूल सुधारने’ (?) हम सभी रावण नहीं बन बैठे हैं?

अनचाहा बोलने वाले की बोलती बंद करने उतारू होकर!

-सुबुद्ध

कृष्ण या सुदामा?

कृष्ण या सुदामा?

जाने कब से आंखें नीर हीन हो चुकी थीं…! जाने क्या क्या बीत गया … जाने क्या क्या छूट गया… मगर आंखों में आंसू ना आये थे वर्षों बीत चुके थे पत्थर हुए… !
अचानक श्री कृष्ण-सुदामा मिलन का  वीडियो क्लिक किया… और अपने आपको वीडियो में दोनों ओर देख… निरंतर भावविह्वलता में अश्रुधार चल निकली… समाप्त होने पर भी रुकने तैयार नहीं … बाॅंध जो टूट गया था आज…! श्रीकृष्ण और सुदामा; मुझे दोनों में, मैं ही दिखते रहे…
लोकोपहास से तो अब कभी असहजता नहीं होती …. आदत जो हो गई है…. मुझे हर बार पता होता है कि जरा सी देर में द्वारकाधीश दौड़े चले आने वाले हैं… और लोकदृष्टि पलक झपकते बदल जाने वाली है… कोई आज की बात तो है नहीं…  कब से देखते आ रहा हूं…. एक-दो बार नहीं बार बार… हजार बार….  निराशा में कदम वापस मोड़ने से पहले श्रीकृष्ण दौड़े चले आये हैं… 
महल में बैठा हुआ अन्दर वाला ‘मैं कृष्ण’ भी जानता हूं… कि अपने वैभव के मान के उबाऊ बोझ से मुक्त कराने किसी भी दिन….  किसी भी पल द्वारपाल आकर…  शायद बस अभी अभी आकर मुझे मेरे बचपन के उच्छृंखल, बेतकल्लुफ़ आल्हादमय पलों   में ले जाने का कारण बनने….   सुदामा के आगमन की सूचना देने ही वाला है…  मुझे उबाऊ जीवनचर्या से सस उबारने ही वाला है… सुदामा को मेरा उल्लास लौटाने का माध्यम बनना ही था ….  आना ही था…!
‌मित्रों में ना मांगना पड़ता है…. ना बोलना …. बस उसकी जरूरत पता चल जाती है…! फिर कौन कृष्ण कौन। सुदामा पता ही नहीं चलता…. बस मित्र को मित्र की आवश्यकता का भान हो जाता है और मित्र दसियों कोस से चलकर…. दाता होकर भी याचक बनकर वो  देने आ ही जाता है…  जो मुझे चाहिए…. मैं पा लेता हूँ ….  जो मेरा अभीष्ट है…. साधिकार पाता हूॅं…  ना तो मैं उस प्राप्ति का मूल्यांकन करना चाहता हूं ….. ना कर सकता हूं….  ना चुकाने की सोचता हूँ… ना ही चुकाने में सक्षम हूँ… ना ही चुका सकता हूं….  किन्तु उसकी आवश्यकता योग्य जो हो सके करने का प्रयास अवश्य  कर सकता हूँ… करता हूँ…
‌वास्तव में कृतज्ञ तो मैं हो रहा होता हूँ …. और कृतज्ञता वो ज्ञापित कर रहा होता है ….
यही तो लीला है…. मित्रवत्सल परममित्र लीलाधर की … जो किसी किसी के ही पल्ले पड़ पाती है….!
नटखट-नटनागर-मुरलीधर-किशन कन्हैया की अमिट स्मृति अनायास सजीव अवतरित हो उठी है….
हरि ॐ!
-सुबुद्ध !