कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें! 

*कर्ज चुकायें-पुण्य कमायें!*

जिसकी गोद में खेलकर बड़े हुए, जिससे सब कुछ अधिकार पूर्वक लेते रहे, उसकी तरफ भी, कुछ तो जवाबदेही बनती है ना हमारी…!

*प्रकृति / कुदरत से, बस कर्ज लिये जा रहे हैं… इस कर्ज को   उतारने की क्यों नहीं सोचते?*

क्या नहीं लेते हैं हम प्रकृति से…? और जो भी लेते हैं ज्यादातर प्रकृति को नोंचकर! सुख के साधन जुटाने और जीवन यापन योग्य होने लायक शुरुआती शिक्षा (हाँ. से. तक की ही) पाने में, हम अमूमन 20-25 पेड़ों को काटकर बनाये गये कागज का उपयोग कर चुके होते हैं…! और पेड़ लगाने की कौन-कब सोचता है?

*क्या यह कृतघ्नता नहीं है?*

*अच्छा है कि; सब के सब कृतघ्न नहीं हैं…! आप भी मत रहिये!*स्वयं के लिये, स्वजनों के लिये या मानवता के लिये…*कृतघ्नता त्यागिये!*

*पेड़ लगाइये!*

*पहले से लगे पेड़ों को कटने मत दीजिये!!*

*बढ़ते पौधों को पानी की कमी से मरने मत दीजिये!!!*

(अपने उपयोग किये गये / अतिरिक्त बहते पानी को ही पेड़ों की ओर मोड़ दीजिये)!

अकारण बिजली के उपकरण मत चलाइये! शौकिया वाहन मत दौड़ाइये!!!!

*कूलर / ए सी का कम से कम उपयोग करने के लिये अपने घर हवादार बनवाइये /करवाइये!!!*

बेहतर जल-प्रबंधन कर पानी का दुरुपयोग रोकिये!!!!!!

*केवल “पौध रक्षा बांड” भरकर पौधे हमसे मुफ्त में लीजिये!*

कम  से कम उतने पेड़ तो लगाइये / लगवाइये जितने काटे जाने का कारण बने!

*आइये प्रकृति का कर्ज उतारें!!*

दूसरों को भी प्रेरित करें!!!

*मानवता धर्म निभायें!!!*

नोट–  उपरोक्त प्रस्तावों में से किसी पर भी विस्तृत सहायता हेतु हमसे इस पोस्ट पर टिप्पणी कर या केवल व्हाट्सऐप संदेश /ध्वनि संदेश/ वीडियो संदेश द्वारा ही (काल हेतु नहीं!)

मो• नं•  888 9512 888 पर सम्पर्क कीजिये.

दोगले 

:- दोगले -:

 शाम का अंधेरा घिर रहा था, पंछियों के साथ- साथ थके माँदे मेहनती लोग भी घर लौट रहे थे, शहर की बिजली  जो ईमानदारी की तरह कभी भी गायब होते रहती थी। इस समय भी गायब ही थी, गया ईमान कब लौटे •••• लौटे या ना भी लौटे••• कौन जाने!
मैं भी घर लौटने वाले थके हारे  हुए लोगों में से एक था। मेरे ‘विश्राम स्थल’ यानी ‘तथाकथित  घर’  से 2-3 सौ मीटर पहले मुझे, मुझसे थोड़ा आगे लड़खड़ाते, बड़बड़ाते चलते हुए शख्स ने ध्यानाकर्षित किया, तभी उसके हाथ में शराब की बोतल भी नजर आ गई तो  काफी कुछ समझ आ गया ! ‘हमारे एरिये’ में घुस आये उस घुसपैठिये के ‘श्रीमुख’ से हवा को लक्षित और अनंत में  प्रक्षेपित ‘सुमधुर गालियों’ का प्रवाह भी निकलना शुरु हो गया! मैं थोड़ी तेज कदमों से, मन ही मन उससे कई गुनी ‘मधुर’ गालियाँ मन ही मन उसे देता हुआ उसकी ओर बढ़ा••••

ऐसा करने वाला मैं अकेला ही नहीं था••• आसपास के राहगीर, दुकानदार, रहवासियों में से भी  25-50 लोग मेरे उस तक पहुँचते-पहुँचते उसको चारों ओर से घेर कर पूछताछ शुरू कर चुके थे ! इस इकट्ठी होती भीड़ में बड़ी संख्या में महिलाओं की भी उपस्थिति देख मन और भी प्रफुल्लित हुआ कि कम से कम मेरे आसपास बसे स्त्री-पुरुष मेरी उम्मीद से भी बहुत ज्यादा जागरूक हो चुके हैं… इतने कि असभ्य,  कुसंस्कारित, गंवार,  बेबड़े, दहशतगर्द पहलवान सा दिखते इस इंसान के विरुद्ध सभ्य स्त्री-पुरुष एकजुट होकर विरोध करने तो निकले!

काश! हमारे मोहल्ले की ही तरह सारे भारत में सभ्य नागरिक अमानवीयता के विरुद्ध एक-साथ एकजुट होकर खड़े हो सकें तो बड़ा से बड़ा गुन्डा भी गुण्डई की जगह  मजदूरी में ज्यादा मजा देखने लग जाये!

इन्हीं खयालों से उत्साहित और जन समर्थन से उत्तेजित मैं उस दहशत गर्द की गर्दन पकड़ उसे नसीहत देने के इरादे से उसकी तरफ लपका तब तक भीड़ में शामिल 2-3 युवक और एक युवती (हमारी ही उत्साहित पड़ौसन) उसे नीचे गिरा कर दबोच चुके थे! भीड़ में शामिल एक अधेड़ चिल्ला रहे थे-

 “साले गंदी बस्ती के कीड़े••• हमारे यहाँ आकर दादागिरी दिखाते हो••• अब हम शरीफ जाग चुके हैं ••• एक मुट्ठी बन गये हैं••• अब तुम्हारी दादागिरी यहाँ नहीं चलने वाली!”

तभी उस शख्स को दबोचे हुए तीनों-चारों युवक-युवती उससे छिटककर खड़े हो गये और उसी अति उत्साहित  युवती ने रहस्योद्घाटन किया कि यह ‘गुण्डा नहीं गुण्डी है!’

भीड़ में शामिल किसी महिला की आवाज आई

 ‘गुण्डई क्यों कर रही है’

उसी उत्साहित युवती ने संभावना जताई कि शायद इसके साथ कोई अन्याय हुआ होगा जिसका फ्रस्टेशन निकाल रही होगी•••

बेबड़े की जगह बेबड़ी का पता लगते ही लोगों का गुस्सा कौतुहल में बदल गया था! भीड़ में से किसी स्त्री  ने थोड़े अपनेपन से पूछताछ की तो पता लगा बीयर पीकर घर पहुँचने पर शराबी भाई ने उसकी पिटाई कर दी थी ! भीड़ में खड़ी महिलाओं में से अधिकांश को उसकी उसके घर वालों द्वारा पिटाई महिलाओं के विरुद्ध पुरुषों का अत्याचार लगने लगा था किसी की आवाज सुनाई दी

 “महिला शक्ति जिंदाबाद!”

 “शाबाश मेरी हीरोइन”

थोड़ी ही देर बाद दृश्य बदल चुका था !

 महलाओं ने उस (दहशतगर्द) महिला को  कंधों पर उठा रखा था !

नारे लगाये जा रहे थे•••

“महिला शक्ति जिंदावाद!”

“महिला उत्पीड़न नहीं चलेगा!!”

“नारी तू नारायणी!”

“तू ही दुर्गा तू ही काली!”

“जो इससे टकरायेगा मिट्टी में मिल जायेगा!”

भीड़ जुलूस में बदल चुकी थी। पुरुषों की जगह  अगुवाई महिलाओं के पास चली गई थी,  महिला शक्ति को बहुत सारे जागरूक पुरुषों के काँधों का भरपूर समर्थन भी मिला हुआ था !

 थोड़ी ही देर पहले मैं कुछ ज्यादा ही खुश हो लिया था…

अब लग रहा था कि

“कितने दोगले  हैं हम!!!”

 

वर्तमान आरक्षण व्यवस्था सरकारी मोटराइज्ड व्हीलचेयर है!

वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में; चलने में कमजोर आरक्षितों को मोटराइज्ड व्हीलचेयर पर बिठाकर नैसर्गिक सक्षम लोगों के साथ चलाने, बढ़ाने, दौड़ाने जैसा मूर्खता पूर्ण व आभासी प्रयास किया जा रहा है!

वर्तमान आरक्षण व्यवस्था सरकारी मोटराइज्ड व्हीलचेयर है!

आरक्षण समर्थक और विरोधी दोनों ही मेरा समर्थन चाहते हैं•••

किन्तु क्षमा कीजिए! इंसान को इंसान से लड़ाकर, समाज को बाँटने और राष्ट्र को कमजोर करने के अथवा मानवता के विरुद्ध किसी भी आंदोलन का समर्थन ना मैंने कभी किया है ना कभी करूँगा!

जहाँ तक आरक्षण का प्रश्न है वह मुझे, मेरे या बच्चों के लिये नहीं चाहिए ना ही हम जैसों के लिए बाबा साहेब ने प्रस्तावित किया था!

बाबा साहेब ने यह प्रस्ताव जिनके लिये, जिस अपेक्षा के साथ किया था आरक्षण के लाभार्थियों ने ठीक उसके विपरीत अपने ही वंचित जाति भाइयों को उसका उपयोग करने देने की जगह स्वयं संपन्न से और संपन्न होने में इसका दुरुपयोग किया और आज भी करते आ रहे हैं!

*1950-60,आरक्षण लागू होने के पहले 10 वर्ष में समय, स्वाभाविक रूप से, *पहली बार के आरक्षण लाभार्थी 100% थे! तब आरक्षण की सम्पूर्ण प्रमाणित उपयोगिता निकाली गई !

1960-70 में भी लगभग यही स्थिति रही!

किन्तु

*आज 68 वर्ष बीतते-बीतते, पहली अनुसूचि में शामिल आरक्षितों में से, अब पहली बार आरक्षण का लाभ लेने वाले 1% से भी कम बचे हैं ! जिससे स्पष्ट है कि अब आरक्षण लाभ का 99%, आरक्षित जातियों के सुविधा संपन्न तबके द्वारा, अपने ही जाति भाइयों का हक छलकर, विलासिता के साधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है!

इसका विकल्प तलाशा जाना चाहिए!

आरक्षित जातियों के सक्षम वर्ग को भी अपने ही वंचित व विपन्न जाति भाइयों के उन्नयन में योगदान हेतु स्वेच्छा से आरक्षण लाभ त्यागकर बाबासाहेब के सपने को साकार करने में सहयोगी होना चाहिये!

चूँकि मैं स्वयं को सक्षम मानता हूँ, अतः मैंने तो सभी तरह की सब्सिडी तक छोड़ रखी हैं!

मुझे लगता है कि शासन, पिछड़ी जातियों के उन्नयन का कोई ऐसा युक्तियुक्त पूर्ण कार्यक्रम बनाये, जिससे वह अर्ध-सक्षम ही ना रहे!

वर्तमान व्यवस्था में; चलने में कमजोर आरक्षितों को मोटराइज्ड व्हीलचेयर पर बिठाकर नैसर्गिक सक्षम लोगों के साथ चलाने, बढ़ाने, दौड़ाने जैसा मूर्खता पूर्ण व आभासी प्रयास किया जा रहा है!

आवश्यकता अर्ध-सक्षम को, नैसर्गिक सामान्य जैसा सक्षम बनाने हेतु, उनकी संतुलित पोषण व्यवस्था सहित, उनसे सही एक्सरसाइज़ आदि कराकर, उनके उचित उपचार की है!

“सरकारी व्हीलचेयर रूपी आरक्षण”

की

“निरंतर उपलब्धता”

“वास्तविक उन्नयन”

का विकल्प नहीं है

ना ही हो सकता है!!!

-सत्यार्चन

सुख चाहिये? ये लीजिये!-7- सत चिंतन…

सुख चाहिये? ये लीजिये!-7- सत चिंतन...

ईश्वर को समझना है तो आत्मा को समझें …

बिल्कुल राष्ट्र को समझने के लिये नागरिक को समझना की तरह …

किसी भी राष्ट्र की इकाई उसके नागरिक हैं …

इसीलिये मैं कहता हूँ

“मैं भारत हूँ”

किन्तु केवल मैं ही भारत नहीं हूँ

वरन् मैं भी भारत हूँ

ठीक आपकी ही तरह…

आपके मेरे और अन्य भारतों (तथा भारतीयों) की

प्रगति को ही

भारत देश की प्रगति कहा जायेगा…

भौगोलिक सीमाओं से घिरी धरती स्वयं कोई प्रगति नहीं करती

ना कर सकती

हमारे राष्ट्र की भौगोलिक सीमा में बसे हम नागरिक ही

प्रगति या अवनति करते हैं …

हम सबकी “समग्र प्रगति” ही राष्ट्र की प्रगति है…

वैसे ही आत्मा है …ईश्वर की इकाई…

हमारे जैसों के आत्मचिंतन में शुभ है

तो अन्य के अशुभ…

हमारे “समग्र चिंतन” का परिणाम ही

हमें; प्रकृति से, प्रतिफल में प्राप्त हो रहा है

समस्त आत्माओं के

“समग्र प्रयास” की परिणति ही ईश्वरीय लीला है…

“वो” केवल वही दिखायेगा जो हमारे “समग्र दर्शन” में हम चाहते हैं…

“वो” केवल वही करेगा जो हमारा “समग्र-अपेक्षित” है…

कलयुग की पराकाष्ठा में अशुभ तिंतन

दिनोंदिन, शुभ चिंतन से बड़ा होता जाना है

हो रहा है…

शुभ सिमटते जाना है…

“शुभ-चिंतक” दिनों दिन “अशुभ-चितकों” के आगे घुटने टेकते जाने हैं

टेकते जा रहे हैं

शुभ सिमट रहा है…

और

अशुभ अपनी ताकत पर मद में चूर होकर

निरंतर अशुभ चिंतन कर प्रलय का कारण बनने ही वाला है…

प्रलय सन्निकट है…

यह प्रलय समूचे अशुभ चिंतकों को “मोक्ष” प्रदान करेगी

और मुट्ठी भर शेष शुभ चिंतक

अगले सतयुग के प्रणेता बन

फिर से संसार की रचना करेंगे…

….

*थोड़ी सी देर के लिये कल्पना कीजिये

कि प्रलय हो चुकी है

और आप तथा 23 अन्य जन ही

आल्प्स जैसे पर्वत की चोटी पर आपके साथ जीवित बचे हैं

यानी कुल 24 जन ही संसार में “आदम स्थिति में” जीवित बचे हैं ….

साधनों के नाम पर ना तो अन्न है ना ही वस्त्र

पर्वत की जरा सी चोटी पर इकट्ठे आप सब …

शेष संसार जलमग्न हो नष्ट-भ्रष्ट हो चुका है….

बार-बार जल की बड़ी-बड़ी लहरें

आपकी आश्रय बनी पर्वत की चोटी को डुबो दे रही हैं…

हर एक लहर के साथ एकाध साथी बहकर

कम या घायल होने का अंदेशा है

या होते जा रहा है….

इनमें कुछ स्त्रियाँ हैं और कुछ पुरुष ….

कुछ स्वस्थ हैं तो कुछ घायल….

सभी नग्न!

आप स्वस्थ हैं तो क्या आप घायलों के

उपचार / देखभाल के इच्छुक ना होंगे ?

किसी घायल की पीड़ा से परेशान ना होंगे…?.

सभी एकजुट होकर लहरों में किसी के भी

बहकर कम ना होने देने का प्रयास ना कर रहे होंगे…?

निश्चय ही कर रहे होंगे …!

आपमें से प्रत्येक एक दूसरे के साथ खड़ा होगा …

बिना जात-पांत, रंग-नश्ल, लिंग का भेद किये …

सब एकदूसरे के साथ खड़े होंगे …

कोई भेद शेष ना रहेगा!

सब सबके लिये, सब तरह से, समान रूप से सहयोगी!

तब सबके हित में ही सबका हित होगा!

अन्य का अहित चिंतन तो कल्पना में हो ही नहीं सकेगा!

सबसे सभी दुर्भावनाओं का समूल नाश हो चुका होगा!

बस यही तो होगा सतयुग का सूत्रपात!*

……..

ऐसे ही सतयुग पहले भी कई बार आये

और कलयुग में समाप्त हुए ….

फिर होगा और तब तक निरंतर चलता रहेगा

जब तक कि पृथ्वी की आयु शेष है…

अंत में महाप्रलय होगी जब पृथ्वी पूरी तरह प्रदूषित हो

जीवन के सर्वथा अयोग्य हो जायेगी

तब पृथ्वी ब्लैकहोल में जा समायेगी…

तब तक ऐसा ही चतता रहेगा…

सतयुग से प्रारंभ और कलयुग पर अंत…

  • सत्यार्चन

सुख चाहिये? ये लीजिये- 6 (जीवन में सुख के रंग)

सुख चाहिये? ये लीजिये- 6 (जीवन में सुख के रंग)

सभी रंगों की अपनी-अपनी महत्ता है
यही महत्ता याद दिलाने प्रतिवर्ष
होलिकोत्सव आता है!
💓
जानवरों के जीवन में तो दो ही रंग होते हैं,
श्वेत व श्याम
किंतु
मानव जीवन अनेक  शुभ-अशुभ रंगों से मिलकर ही सजता है!
शुभ रंगों की समग्र, सम्पूर्ण चाह हर एक को है…
किंतु जैसे अंधेरे का अस्तित्व ना होता तो प्रकाश को समझना कठिन होता 
वैसे ही अशुभ रंग ना होते तो शुभ रंगों का होना फीका ही होता…
तब रंगों में सुख ही ना होता ….
अशुभ से ही शुभ की महत्ता का महिमामंडन संभव है….
.
थोड़ी देर के लिये आप अपने लिये अशुभ और अप्रिय रंगों को
मन ही मन दुनियाँ भर से अदृश्य मानें
फिर बचे हुए रंगों को याद करें …
बचे हुए रंगों में से फिर से प्रिय और अप्रिय रंग अलग करने की क्रिया मन ही मन दोहरायें
3-4 बार दोहराने के बाद आपके पास 1 या 2 या 3 रंग ही बचेंगे….
फिर से विचारिये कि केवल आपके ये प्रियतम रंग ही दुनियां में बचे रह जायें तो ….?
दुनियां कैसी होगी ?
सोचिये ?
1 ही रंग बचा हो तो …
वैसी ही धरती वैसा ही आकाश …
वैसे ही पेड़ पौधे …
वैसे ही आप … वैसे ही आपके निकटजन…
वैसे ही मानव… वैसे ही दानव….
2 रंग ही प्रिय बचे तो...
वही पशुओं सी श्वेत श्याम वाली नीरस स्थिति …
इस तरह तो 3 से भी काम नहीं चलेगा ना ….
फिर तो जो भी जैसे भी रंग हैं ….
सभी जरूरी हैं ना ?
दूसरे रंग ना होंगे तो किसके सापेक्ष प्रिय / शुभ रंग खोजेंगे?
एक बात तो तय है कि सुख, शुभ में ही है ….
और सुख दूसरे की तुलना में अधिक प्रिय / शुभ / आरामदायक में है
तो क्या सुख सापेक्ष ना हुआ?
सामान्यत: सापेक्षता में ही सुख खोजा जा रहा है…
और
अन्य की परिस्थिति का विचार किये बिना
उसकी सापेक्षता में सुख खोजना ही
दुख का सबसे बड़ा कारण है…!
किंतु सापेक्षता के अतिरिक्त सुख का और कोई माप तो शायद हो भी नहीं सकता …
सापेक्षता का पैमाना अनुचित नहीं
किंतु…
अन्य के सापेक्ष नहीं ….
स्वयं के सापेक्ष देखें
और
सुखी हो जायें!
ईश्वर करे सभी पढ़ने वाले
समस्त शुभ रंगों से
आजीवन  सराबोर रहें !
शुभकामनाएँ!*
💓
फाल्गुन कष्ण प्रथमा सम्वत 2074
(2-3-2018)
*सुबुद्ध*
*Broadcast*
*-*
🎱*SathyaArchan
*सत्यार्चन 🎱
*A GLOBAL Name*
🔻💓🔻

जाने मैं जानूं… कि तुम जानो…

सिर्फ लेन या सिर्फ देन ही, एक तरफा प्रेम है… या दोहन है… या शोषण है!

जाने मैं जानूं… कि तुम जानो…

तुम्हारा खत मिला ….
पढ़कर आश्चर्य हुआ कि जीने का एक तरीका यह भी हो सकता है…

मुझे तो लगता है कि इंसान सोशल एनिमल है….

अकेले तो वो जी ही नहीं सकता…

साथ चाहिये होता है…

और साथ के लिये सामंजस्य पहली शर्त है…

सामंजस्य बिना त्याग के कैसे संभव है

फिर कैसे?

हाँ में हाँ मिलाने वाले मित्र नहीं हो सकते…

वे वेतन भोगी कर्मचारी भी नहीं जो आपसे वेतन पाते हैं

ना वे जो केवल धन या तन पाने की आस में हैं

ना ही उपकृत या खरीदे हुए लोग ही साथी या दोस्त हो सकते….

दोस्त के मायने दोस्त शब्द जैसे ही तो हैं…

एक और एक मिलकर दो …

दो में से दोनों आधे-आधे अस्त हों तब दोस्त….

दोनों का अलग अलग अस्तित्व अस्त होकर बचे शेष से मिलकर बना, दो का एक होकर उदित होना

तब सशक्त दोस्ती बनती है …

हर तरह के ही संबंध के बने रहने में दोस्ती आवश्यक है…

चाहे वह किसी का भी किसी से भी कैसा भी संबंध हो…

दोस्ती ही संबंध का मूल अवयव है…

दोस्ती का मूल अवयव दूसरे के साथ जुड़ने में स्व का अस्त होना है…
शायद नादानी हो मेरी …

मगर मेरे लिये, मेरे अपने / अपनों के बिना मेरा होना, संभव ही नहीं…

यह जरूर है कि अपने, हर एक के लिये अलग-अलग तरह होते हैं …

किसी के लिये केवल रक्त-संबंधी, किसी के लिये प्रेम संबंधी भी, तो किसी के लिए इन दोनों के साथ-साथ मित्र-संबंधी भी….!

अपने कैसे भी हों…

उनका आपसी संबंध, बिना आपसी व्यवहार के ,

यानी बिना आपसी लेनदेन के…, मधुर तो नहीं रह सकता …

फिर लेनदेन भले भौतिक हो या मात्र वैचारिक ही ….

वैसे तो भौतिक और वैचारिक दोनों ही तरह के लेनदेन को मिलाकर ही संबंध निभते हैं…

सिर्फ लेन से नहीं और सिर्फ देन से भी नहीं…

सिर्फ लेन या सिर्फ देन, एक तरफा प्रेम है… या दोहन है… या शोषण है!

एक तरफा प्रेम, दोहन या शोषण में सुखांत तो संभव है ही नहीं…

खुद से, रब से और सबसे.. प्रेम भी बिल्कुल वैसा ही है…

नितांत एकमार्गी….

केवल मन बहलाव….

तुम तौलकर तो देखो

तुम भी मुस्करा देना •••
मुस्कान के बदले!
फिक्सिंग ही सही कर लो•••
मिले मान के बदले !!
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तुम तौलकर तो देखो
दिल झूठ नहीं कहता
जरा पूछकर बताओ •••
बस इस बार सच ही कहना
ईमान के बदले!
कुव्बत से निकल-निकल कर
मैं होता रहा हल़ाक
तुम तौलकर तो देखो
मेरी जान के बदले!

वो भी…

क्या हुआ अगरचे कुछ गुनाह कर ही डाले
इसी गुनाहों भरी दुनियाँ का, वासिन्दा है वो भी…

वो भी…

मसीहा सी उम्मीद, उससे,  किसलिये ऐ दोस्त

थोड़ा बहुत जीने का हक, रखता तो है वो भी….

आशिकी कब-कहाँ, शुमार हुई गुनाहों में

इक इश्क वाला दिल शायद, रखे बैठा हो वो भी…

कैसे कोई कहेगा कहीं कमीनगी कासिद की

कासिदी में कोई गुनाह, कभी कर बैठा हो वो भी…

क्या हुआ अगरचे कुछ गुनाह कर ही डाले

इसी गुनाहों भरी दुनियाँ का, वासिन्दा है वो भी…

कब तक सिमट के रहता कोकून के अंदर ….

रेशम कीड़ा तो नहीं आखिर, इंसान है वो भी…

 

फाइंडिंग “नीमो”

आपराधिक गतिविधियों में लिप्त
राजनीतिज्ञों को वोट देकर
अपराध मुक्त समाज की आशा मूर्खता है!

… तब तक लूट रुकने की आशा व्यर्थ है

जब तक हम लुटेरों को अपने वोट लूटने से नहीं रोकते !

फाइंडिंग “नीमो”

एक हॉलीवुड मूवी है “फाइंडिंग नीमो”

मेरी पसंदीदा मूवी है!

अब समूचे भारत की कोशिश है •••

चिंता है फाइंडिंग ‘नीमो’ !

मूवी में नीमो मिल जाता है ••• सुंदर, सुखांत मूवी है!

किन्तु देश को जैसे मालया नहीं मिल सका वैसे ही नीरव मोदी (नीमो) के मिलने की भी कोई आशा नहीं !

ना करना चाहिए !

नित नये नये नटखट ‘नीमो’ जैसे लूटने वाले सामने आते रहेंगे •••

मगर लूटकर भागने के बाद •••

कम से कम तब तक जब तक हम जागरूक होकर अपने अधिकारों के रक्षक नहीं बन पाते !

हम में परिवर्तन आवश्यक हो गया है!

और तब तक कोई परिवर्तन नहीं हो सकता जब तक कोई प्रयास ना हो!

तब तक लूट रुकने की आशा व्यर्थ है

जब तक हम लुटेरों को अपने वोट लूटने से नहीं रोकते !

आपराधिक गतिविधियों में लिप्त

राजनीतिज्ञों को वोट देकर

अपराध मुक्त समाज की आशा मूर्खता है!

फर्क नहीं पड़ता किस पार्टी का है

अपराधी मौकापरस्त है

तो अपने स्वार्थ के लिए अपनी निष्ठा

किसी के भी हाथों बेच देगा

विरोधी को बेचते हुए भी वो कब सोचे गा!

किसी पार्टी के स्थान पर

शालीन को वरीयता देने के

आह्वान में आप भी सम्मिलित होकर

अपना कर्तव्य निभाना शुरू तो करें!

एक भी आम चुनाव में

यदि 10 भी सभ्य, शालीन, शिक्षित, योग्य उम्मीदवारों को मिले वोट

उल्लेखनीय संख्या तक पहुँच गये

तो अगले 2 से 3 चुनावों में ही

भ्रष्टतम दल भी शालीनता के समर्थन में आने विवश हो जायेगा!

हम बदलेंगे – युग बदलेगा!

कुछ तो बदलेगा!

चलिये हममें से जो शालीनता, सभ्यता के समर्थन में हैं वे ही प्रतिज्ञा कर लें!

मैं 1989 से यही करते आ रहा हूँ!

2009 में अन्नाजी को आगे लाने वाले साथी भी इसी मानसिकता के अनुसरणकर्ता थे !

वे राजनीतिक उपलब्धि पाकर पथभ्रमित हो आपसी फूट में भले बिखर गये हों ••• बदल गये हों•••

परन्तु उद्देश्य आज भी उतना ही पावन है!

आइये जन जागरण के प्रयास में फिर से जुट जाते हैं!

इस आह्वान का अपने सभी सम्पर्कों में सतत साझा करते रहिए! चाहें तो तुरंत फारवर्ड ही कर दीजिए!

(मेरे ऐसे ही आह्वान के लिये मैं “सिटीजन इंटीग्रेशन पीस सोसायटी इंटरनेशनल” (अमेरिका), द्वारा 2010 के “राष्ट्रीय रतन अवार्ड” हेतु नामाँकित किया गया था!)
– SathyaArchan

तुम ही तुम•••

… भोर का होता हुआ

उजास हो तुम

प्रात पांव फैलाता

प्रकाश भी तुम!
….

तुम ही तुम•••

IMG-20150414-WA0021.jpg
तुम ही तुम…

(चित्र गूगल से …. साभार)

इधर भी हो तुम

उधर भी तुम!

जिधर देखता हूँ

उधर तुम ही तुम!

पढ़ता हूँ जिनको

उन किताबों में हो तुम!

उलझते-सुलझते

सबालों में तुम!

सँवरते बिखरते ख्यालों

में हो तुम

अनुत्तरित सभी प्रश्नों के

जबाबों में तुम

हो नींदों में तुम

तो हो रातों में तुम

सोते-जागते देखे हुए

ख्बाबों में तुम

 मेरी बहकी बहकी सी

बातों में तुम

मिलन के दिनों के

हिसाबों में तुम

भोर का होता हुआ

उजास हो तुम

प्रात पांव फैलाता

प्रकाश भी तुम!

आसपास होने  का

कयास हो तुम

अनजाना अनदेखा

मधु-मास तुम!

तुम्हीं हो••• तुम्हीं हो

बस तुम हो••• तुम!

मेरे जीने के मकसद

मेरी मंजिल हो तुम!

क्या हुआ अगरचे

मेरे कातिल हो तुम!

 (25 साल पहले जला दी गई डायरी से….  जेहन में तैरते हुए चंद अलफ़ाज…. – सत्यार्चन)