भारत भ्रमित क्यों?

सरकार पूरे देश जिस एनआरसी को लागू करने वचनबद्ध है किन्तु उसका ढांचा अभी तैयार नहीं  किया गया है… और भ्रमित भारत की सबसे बड़ी दुविधा भी यही है….! एन आर सी में भारतीय होने का क्या प्रमाण स्वीकार्य होगा सरकार बताने तैयार भी नहीं!

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भारत भ्रमित क्यों?

  • आइये समझने का प्रयास करें कि देश दिग्भ्रमित क्यों???
    यदि वास्तव में भ्रम है तो क्यों है?
    विश्वसनीय तथ्य प्रदर्शित कर भ्रम का निवारण किया जा सकता है ना?
    रखे गये तथ्यों पर प्रतिप्रश्न और संदर्भों के उल्लेख को नकारकर भ्रम निवारण के प्रयास कितने सार्थक होने चाहिये?
    देश के विचरवान भारतों को (कुमारी और कुमार भारत को) “जैसा हम कह रहे हैं वही सही है!” से संतुष्ट किया जा सकता है? या उन्हें संतुष्ट हो जाना चाहिये?
    क्या अंधविश्वास से संदेहयुक्त अविश्वास उत्तम नहीं?
    हमारे देश में सरकारी लीपापोती का इतिहास पुराना है…. अनेक प्रश्नों के उत्तर अप्राप्त हैं …. कुछ बड़े प्रश्नों के उत्तर खोजने के प्रयास ही नहीं होते…. जैसे
  •  
  • कांग्रेस ने कभी आंतरिक आपातकाल, सिख विरोधी दंगों से हुई क्षति पर कोई मंथन नहीं किया…. कभी स्वीकार नहीं किया …और कोई सुधार भी नहीं किया… तो आज वे वहाँ पहुँचे जहाँ अपनी भूलों की ओर ना देख पाने वाले अहंकारी को होना चाहिये!
  • कंधर विमान अपहरण की फिरोती में आतंकियों को छोड़े जाने के निर्णय की समीक्षा भाजपा में हुई हो ऐसा लगता नहीं!
  • मालेगांव ब्लास्ट की एक जांच एजेंसी की जाँच को दूसरी एजेंसी द्वारा पलटा जाना और फिर कोर्ट से मुक्त आरोपियों को सर आँखों पर बिठाने के निर्णय से क्या प्रदर्शित करना चाहती है भजपा?
    उनमें से एक जो अब माननीय हैं तो अक्सर हिंसा के, हत्यारों के समर्थन में खड़ी दिखती हैं!
  • भाजपा, महात्मा गाँधी पर अपना रुख स्पष्ट नहीं करती…. यदि गोडसे के समर्थन में आना है तो खुल के आने में कौनसा भय है… क्या दोनों तरह की सोच का राजनैतिक लाभ उठाने के लिये? यदि ऐसा नहीं तो स्पष्ट कहने भर से काम नहीं चलेगा उन्हें अपने समर्थकों को गोडसे के कृत्य को उचित ठहराने से रोकने का प्रबंध भी तो करना चाहिये!
  • भाजपा के राजीव कुलश्रेष्ठ जैसे अनेक अंध समर्थक (या गुप्त शत्रु)अपने आडियो/ वीडियो/ लेख संदेशों में खुलकर आम जन से कानून और गैर हिंदुओं को तोड़ने की अपील करते हुए कहते हैं कि संवैधानिक पद पर बैठे लोग तो कानून के अनुसार चलने विवश हैं पर आम आदमी को कानून को, कोर्ट की परवाह ना करते हुए कानून को अपने हाथ में लेकर न्याय अर्थात गैर हिंदुओं का जीवन दूभर करना चाहिये… ऐसे संदेश प्रतिदिन प्रसारित होते हैं! भाजपा के जिम्मेदारों का इसपर मौन इसका समर्थन क्यों ना समझा जाये?
  • संसद हमले में अभियुक्त अफजल के पत्र में उल्लेखित देविंदर सिंह जैसे अन्य बिंदुओं को केवल इसलिये अनदेखा किया जाना कि वह एक अभियुक्त का उल्लेख है, कितना तार्किक निर्णय था?
    पुलवामा हमले में 40 से अधिक सेनिकों की शहादत में कहाँ क्या चूक हुई,(तब देविंदर भी वहीं नियुक्त था) पर कोई जाँच हुई तो उसका कोई निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं?
  • पठानकोट हमले में एस पी सतविंदर के अगुवा किये जाने की कथा को जांच एजेंसी द्वारा सच मान लेना और उसी एस पी की अपराधिक प्रवृत्ति की पुष्चि दूसरे प्रकरणों में हुई सजा के बाद उसके आज सजायाफ्ता होने से, क्या जांच एजेंसियों की विशवसनीयता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगता?… (वही जाँच एजेंसी अब देविंदर की जाँच भी कर रही है)
  • पूर्वोत्तर के राज्य असम में पिछली सरकार के समय से चले आ रहे एन आर सी में बड़ी संख्या में घुसपेठिये पाये गये…! इनमें से 2 शौर्य के लिये पदकों से सम्मानित  भारतीय सुरक्षाबलों से सेवानिवृतों के नाम मीडिया में उछले…. और ये 2 उस धर्म से हैं जो सीएए में सम्मिलित नहीं हैं! ये 2 तो विशिष्ट थे तो चर्चा का विषय बन गये…! इससे उन भारतीय मजदूरों की दुर्दशा का स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है जिनके दादे-परदादे भी भारत में जन्मे किंतु जो एनआऱसी में घुसपेठिये प्रमाणित हुए… ! उनमें से उन गैर सनातनी भारतीय किंतु प्रमाणित घुसपेठिये मजदूरों की बात करने का विचार क्या किसी मीडिया को आया भी होगा? सोशल मीडिया पर इस विषय पर लिखने वाले पूर्वोत्तर के ब्लागरों को जेल में डाल दिया गया… सरकार ने भी मान लिया कि कई लोगों को राष्ट्रीयता प्रमाणित करना मुश्किल है… तब क्या स्थिति का लाभ उठाने के लिये पूरे देश में एनआरसी लागू करने की हड़बड़ी दिखाते हुये सीएए नहीं लाया गया? 
  • यह संकल्प अनेक अवसरों पर दोहराया गया कि एनआरसी पूरे देश में लाया जायेगा…. पूरी तरह असम के जैसा नहीं होगा किंतु काफीकुछ वैसा ही होगा… ! इसी बीच सीएए लागू कर दिया गया! 
  • अब गणेशजी की मूर्ति को दूध पिलाने, नीम के पेड़ से दूध निकलने के चमत्कारों को स्वीकारने वाले भारतीय अधिक नहीं बचे, यानी पर कोई समझ रखता है…
  • सरकार पूरे देश जिस एनआरसी को लागू करने वचनबद्ध है किन्तु उसका ढांचा अभी तैयार नहीं  किया गया है… और भ्रमित भारत की सबसे बड़ी दुविधा भी यही है….! एन आर सी में भारतीय होने का क्या प्रमाण स्वीकार्य होगा सरकार बताने तैयार नहीं! पासपोर्ट, ड्राइविंग लायसेंस, समपत्ति पर आधिपत्य प्रमाण,   मतदाता पहचान पत्र, आधार, राशनकार्ड, नरेगा वगैरह वगैरह में से कौन कौन से दस्तावेज माने जायेंगे? कोई दस्तावेज माने भी जायेंगे या नहीं ?
  •  यह भी स्पष्ट है कि इससे  केवल मुस्लिम समुदाय ही प्रभावित होगा क्योंकि सीएए लागू कर अन्य धर्म के मानने वाले भारतीयों को पहले ही आश्वस्त कर दिया गया है!
  • माननीय गृहमंत्री व प्रधानमंत्री जी सहित सरकार, बड़े स्तर पर किसी भी भारतीय की नागरिकता ना छीने जाने और किसी भी घुसपेठिये को भारत में ना रहने देने के लिये आश्वस्त तो कर रही है किंतु किसे भारतीय और किसे घुसपेठिया मानेंगे यह स्पष्ट करने तैयार नहीं….! तो विगत वर्षों के मुस्लिम विरोधी झड़पों, मुस्लिम विरोधी प्रचार को देखते हुए मुस्लिम  समुदाय निश्तिंत कैसे हो सकता है???  
  • अब यदि सरकार वास्तव में वो नहीं करना चाह रही जिससे मुस्लिम समुदाय भ्रमित या भयभीत है, या आऱएसएस के हिंदूराष्ट्र तथा मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने पर आमादा नहीं है, सरकार गतिरोध से देश को पर दिन होती उत्पादकता हानि से रोकना चाहती है, वास्तव में गतिरोध दूर करना चाहती है तो प्राथमिकता के आधार पर राष्ट्रीय एनआरसी का मसौदा तैयार कर 20% से अधिक भारत को आश्वस्त करे! अन्यथा  सरकार और मुस्लिम समुदाय दोनों में से किसी का भी या दोनों का या भारतवर्ष का ही हाल “दुविधा में दोनों गये माया मिली ना राम!” वाला हो सकता है!
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आइये! खुशहाल हो जायें…

किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर…..

आइये खुशहाल हो जायें!आइये! खुशहाल हो जायें…

अक्सर सभी को बहुत सारी शिकायतें होती हैं दुनियां से… किन्तु दुनियां ऐसी क्यों है?
ये दुनियां हो या वो दुनियां… कर्म के सिद्धांत अनुसार ही फल देती आई हैं…!
और बिल्कुल सच्चा है कर्म का सिद्धांत…!
किसी संत का एक उद्धरण है कि-
एक खुशहाल इंसान घूमते फिरते आम के बाग में पहुंच गया… बड़े बड़े रसीले आमों से लदे पेड़ों को केवल देखकर ही उसे बड़ा सुख मिला! फिर मन हुआ कि एकाध आम तोड़ लें… इधर उधर देखा माली पेड़ के नीचे सोया पड़ा था…. चौकीदार था नहीं … ना ही और… ‘कोई भी नहीं देख रहा था(?)’…. एक आम तोड़ लिया… चखा तो मन हुआ एक और… फिर एक और… फिर एक और…. इतने में ‘सदा सब कुछ देखते रहने वाले’ नेे एक आम माली पर टपकाया… माली जागा… डंडा लेकर पीछे भागा… दो चार जड़ दिए पीठ पर….! दर्द और बेइज्जती! आंसू आ गए आंखों में…! यह आंख ही थी जिसने देखकर पैरों को पेड़ तक पहुंचाने का, हाथों को आम तोड़ने का, जीभ को स्वाद ले-लेकर खाने का दोषी बनाया..!’

संतश्री के उक्त उदाहरण जैसा ही है कर्म का सिद्धांत!

… सरल करना चाहें तो जिस प्रकार आंख, कान, नाक, हाथ, पैर सब अंगों में से कोई भी, किसी भी प्रकार का कर्म करे, वह अकेले उस अंग पर नहीं समूचे शरीर पर, सभी अंगों पर कुछ ना कुछ, प्रभाव डालता है…! फल सबको प्राप्त होना / भुगतना होता है…!

इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर असर पड़ता ही है… और अगर किसी मोहल्ले में एक संभ्रांत परिवार हो तो मोहल्ले पर भी असर पड़ता है…! मोहल्ले की तरह शहर, देश-दुनियां पर भी!

आज सबसे खुशहाल देश फिनलैंड, नार्वे, डेनमार्क हैं! सर्वाधिक सामाजिक मूल्यों के पालक डेनमार्क, न्यूजीलैंड सबसे सभ्य देश हैं! जापान सबसे समर्पित नागरिकों वाला, चीन सबसे जुझारू… और… और…. और भारत…? आधी से अधिक दुनियां के लिए भारत; आज भी सांप-संपेरों, टोने-टोटकों, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी आस रखने वाले निठल्लों का देश है!

आइये अपने आप से सदाचरण “कराना” शुरू करें… कल परसों में सब सदाचारी हो जायेंगे…! सब खुशहाल!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

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फिर करें एक नई शुरुआत…

बस वक्त बचा हो जिसका साथी, उसका वक्त नहीं कटता, तू वक्त लेना मुझको या मेरा वक्त बना देना…

फिर करें एक नई शुरुआत…

आते जाते वर्ष, साल

बदला कितना क्या अपना हाल!

कई प्रश्न उठे

कई जश्न हुए

कई जाम पिए

कई काम किये!

नाम हुआ
बदनाम हुए!

कुछ खास हुए

कई आम हुए!

गैरों में अपने पहचाने
अपनों में अपने आन मिले

कोई अपना गैर नहीं होता,

अपनों से अपना मान बने

कई टूट गए, कई रूठ गये,

कई संगी साथी छूट गये

इच्छाओं के अंकुर निकले!
कई-कई सपनों को पंख मिले!

आगाज हुए
परवाज हुई
साज बजे
और तान खिली!

अवसर ने गाये राग सभी

आ पहुँचा बैराग कभी!

मान मिला, अपमान मिला
ऊँची उड़ानों के बीच कभी
भटका हुआ तूफ़ान मिला!
पंख छिने, तन घायल भी
मन रोया, हुए हम पागल भी!

आया था ऐसा कुछ अट्ठारह
आकर आते ही बीत गया!
अब आया है ये उन्निस
आशायें अपनी अपरिमित!

ओ आने वाले, आना दिल से
छूकर लौट नहीं जाना…
थामके मेरी बांहें दोस्त
संग अपने मुझे भी ले जाना!
या बीते दिनों के संगी साथी
फिर से मुझ तक ले आना!

बस वक्त बचे साथी जिसका
उसका वक्त नहीं कटता!
तू वक्त बना लेना मुझको
या मेरा वक्त बना देना!!

.

अट्ठारह भी गया बीत,
वर्तमान हो गया अतीत!
हँसा, रुला हो हृदयांकित
मान जताकर हुआ व्यतीत!

आया है नूतन अब उन्निस
हों स्वप्न सजीव सब अपूरित
आओ बिसराकर बीती बात
फिर करें एक नई शुरुआत!

फिर करें एक नई शुरुआत!!
फिर करें एक नई शुरुआत!!!

-सत्यार्चन सुबुद्ध