आइये! खुशहाल हो जायें…

किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर…..

आइये खुशहाल हो जायें!आइये! खुशहाल हो जायें…

अक्सर सभी को बहुत सारी शिकायतें होती हैं दुनियां से… किन्तु दुनियां ऐसी क्यों है?
ये दुनियां हो या वो दुनियां… कर्म के सिद्धांत अनुसार ही फल देती आई हैं…!
और बिल्कुल सच्चा है कर्म का सिद्धांत…!
किसी संत का एक उद्धरण है कि-
एक खुशहाल इंसान घूमते फिरते आम के बाग में पहुंच गया… बड़े बड़े रसीले आमों से लदे पेड़ों को केवल देखकर ही उसे बड़ा सुख मिला! फिर मन हुआ कि एकाध आम तोड़ लें… इधर उधर देखा माली पेड़ के नीचे सोया पड़ा था…. चौकीदार था नहीं … ना ही और… ‘कोई भी नहीं देख रहा था(?)’…. एक आम तोड़ लिया… चखा तो मन हुआ एक और… फिर एक और… फिर एक और…. इतने में ‘सदा सब कुछ देखते रहने वाले’ नेे एक आम माली पर टपकाया… माली जागा… डंडा लेकर पीछे भागा… दो चार जड़ दिए पीठ पर….! दर्द और बेइज्जती! आंसू आ गए आंखों में…! यह आंख ही थी जिसने देखकर पैरों को पेड़ तक पहुंचाने का, हाथों को आम तोड़ने का, जीभ को स्वाद ले-लेकर खाने का दोषी बनाया..!’

संतश्री के उक्त उदाहरण जैसा ही है कर्म का सिद्धांत!

… सरल करना चाहें तो जिस प्रकार आंख, कान, नाक, हाथ, पैर सब अंगों में से कोई भी, किसी भी प्रकार का कर्म करे, वह अकेले उस अंग पर नहीं समूचे शरीर पर, सभी अंगों पर कुछ ना कुछ, प्रभाव डालता है…! फल सबको प्राप्त होना / भुगतना होता है…!

इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति के
सत्कर्म / कुकर्म केवल उसके लिए ही नहीं… उसके परिवार, पडौस, कुटुम्ब, जाति, धर्म, समाज, गांव, मोहल्ला, शहर, देश-दुनिया की… सबको प्रभावित करने वाले होते हैं…!

आप दूसरों से सदाचार कराने में बहुत आसानी से सफल हो सकते हैं… बस आपको केवल एक व्यक्ति को प्रेरित कर सदाचार के मार्ग पर चलाना होगा… और वह एक व्यक्ति जिससे आप सबसे आसानी से… और पूरी तरह से… अपनी बात मनवाने में सफल हो सकते हैं… वो एकमात्र व्यक्ति है स्वयं आप… और परिजन? अगर किसी परिवार का कोई भी एक सदस्य सदाचारी हो तो देर सबेर बाकी परिजनों पर असर पड़ता ही है… और अगर किसी मोहल्ले में एक संभ्रांत परिवार हो तो मोहल्ले पर भी असर पड़ता है…! मोहल्ले की तरह शहर, देश-दुनियां पर भी!

आज सबसे खुशहाल देश फिनलैंड, नार्वे, डेनमार्क हैं! सर्वाधिक सामाजिक मूल्यों के पालक डेनमार्क, न्यूजीलैंड सबसे सभ्य देश हैं! जापान सबसे समर्पित नागरिकों वाला, चीन सबसे जुझारू… और… और…. और भारत…? आधी से अधिक दुनियां के लिए भारत; आज भी सांप-संपेरों, टोने-टोटकों, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी आस रखने वाले निठल्लों का देश है!

आइये अपने आप से सदाचरण “कराना” शुरू करें… कल परसों में सब सदाचारी हो जायेंगे…! सब खुशहाल!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

फिर करें एक नई शुरुआत…

बस वक्त बचा हो जिसका साथी, उसका वक्त नहीं कटता, तू वक्त लेना मुझको या मेरा वक्त बना देना…

फिर करें एक नई शुरुआत…

आते जाते वर्ष, साल

बदला कितना क्या अपना हाल!

कई प्रश्न उठे

कई जश्न हुए

कई जाम पिए

कई काम किये!

नाम हुआ
बदनाम हुए!

कुछ खास हुए

कई आम हुए!

गैरों में अपने पहचाने
अपनों में अपने आन मिले

कोई अपना गैर नहीं होता,

अपनों से अपना मान बने

कई टूट गए, कई रूठ गये,

कई संगी साथी छूट गये

इच्छाओं के अंकुर निकले!
कई-कई सपनों को पंख मिले!

आगाज हुए
परवाज हुई
साज बजे
और तान खिली!

अवसर ने गाये राग सभी

आ पहुँचा बैराग कभी!

मान मिला, अपमान मिला
ऊँची उड़ानों के बीच कभी
भटका हुआ तूफ़ान मिला!
पंख छिने, तन घायल भी
मन रोया, हुए हम पागल भी!

आया था ऐसा कुछ अट्ठारह
आकर आते ही बीत गया!
अब आया है ये उन्निस
आशायें अपनी अपरिमित!

ओ आने वाले, आना दिल से
छूकर लौट नहीं जाना…
थामके मेरी बांहें दोस्त
संग अपने मुझे भी ले जाना!
या बीते दिनों के संगी साथी
फिर से मुझ तक ले आना!

बस वक्त बचे साथी जिसका
उसका वक्त नहीं कटता!
तू वक्त बना लेना मुझको
या मेरा वक्त बना देना!!

.

अट्ठारह भी गया बीत,
वर्तमान हो गया अतीत!
हँसा, रुला हो हृदयांकित
मान जताकर हुआ व्यतीत!

आया है नूतन अब उन्निस
हों स्वप्न सजीव सब अपूरित
आओ बिसराकर बीती बात
फिर करें एक नई शुरुआत!

फिर करें एक नई शुरुआत!!
फिर करें एक नई शुरुआत!!!

-सत्यार्चन सुबुद्ध