ख्बाव की ताबीर

अनायास सड़क पर आज एक खिलता सा गुलाब देखा!
नजर पड़ी कि सुलग उठे जैसे हमने आफताब देखा!
खयाल बोला पढ़ ही दीजिए कुछ कसीदे उनकी शान में•••
रोका किया होश दिल ने मगर उनमें आब-ए-शराब देखा!
करता है कौन गुनाह ए इश्क कभी होशो हवास में•••
कितने ही नायाब नाजनीनों का तभी होते बड़ा खराब देखा! 
जता देते जो दिल में था••• कि चाहत है साथ चाय की •••
डिनर आफर हुआ होता••• कुछ ऐसा पड़ता रुआब देखा!