फिर करें एक नई शुरुआत…

बस वक्त बचा हो जिसका साथी, उसका वक्त नहीं कटता, तू वक्त लेना मुझको या मेरा वक्त बना देना…

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फिर करें एक नई शुरुआत…

आते जाते वर्ष, साल

बदला कितना क्या अपना हाल!

कई प्रश्न उठे

कई जश्न हुए

कई जाम पिए

कई काम किये!

नाम हुआ
बदनाम हुए!

कुछ खास हुए

कई आम हुए!

गैरों में अपने पहचाने
अपनों में अपने आन मिले

कोई अपना गैर नहीं होता,

अपनों से अपना मान बने

कई टूट गए, कई रूठ गये,

कई संगी साथी छूट गये

इच्छाओं के अंकुर निकले!
कई-कई सपनों को पंख मिले!

आगाज हुए
परवाज हुई
साज बजे
और तान खिली!

अवसर ने गाये राग सभी

आ पहुँचा बैराग कभी!

मान मिला, अपमान मिला
ऊँची उड़ानों के बीच कभी
भटका हुआ तूफ़ान मिला!
पंख छिने, तन घायल भी
मन रोया, हुए हम पागल भी!

आया था ऐसा कुछ अट्ठारह
आकर आते ही बीत गया!
अब आया है ये उन्निस
आशायें अपनी अपरिमित!

ओ आने वाले, आना दिल से
छूकर लौट नहीं जाना…
थामके मेरी बांहें दोस्त
संग अपने मुझे भी ले जाना!
या बीते दिनों के संगी साथी
फिर से मुझ तक ले आना!

बस वक्त बचे साथी जिसका
उसका वक्त नहीं कटता!
तू वक्त बना लेना मुझको
या मेरा वक्त बना देना!!

.

अट्ठारह भी गया बीत,
वर्तमान हो गया अतीत!
हँसा, रुला हो हृदयांकित
मान जताकर हुआ व्यतीत!

आया है नूतन अब उन्निस
हों स्वप्न सजीव सब अपूरित
आओ बिसराकर बीती बात
फिर करें एक नई शुरुआत!

फिर करें एक नई शुरुआत!!
फिर करें एक नई शुरुआत!!!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

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ज्ञान क्या और ज्ञानी कौन?

ज्ञानोदय, ज्ञानमार्ग के अक्षरज्ञान जैसा है! तदुपरांत ज्ञानयात्रा प्रारम्भ होती है, अपने-अपने प्रारब्धानुसार ज्ञानमार्गी ज्ञानपथ की सुरम्य यात्रा में अपने लक्ष्य की और बढ़ता चलता है….

ज्ञान क्या और ज्ञानी कौन?

यदि सारा ज्ञान पुस्तकों में ही होता तो शोध क्या हैं? नित नये नए होते अविष्कार क्या हैं? प्रतिपल लिखा जाता नव साहित्य सृजन क्या है? कल की स्थापित मान्यताओं का स्थान लेती नवधारणायें क्या हैं?
इसीलिये; अक्षर ज्ञान; केवल ग्रंथों के पठन- पाठन, मनन योग्य बनाने वाला ही है!
ग्रंथों का पाठ विचार योग्यता प्रदाता मात्र है!
विचार योग्य होकर निरंतर शोध से ही ज्ञानोदय संभव है!
अक्षर ज्ञान की पुनरावृत्ति अनावश्यक है किंतु ज्ञानोदय तक पहुँचने के लिए, शेष सभी चरण, निरंतर पुनरावृत्ति की आवश्यकता दर्शाते हैं!
ज्ञानोदय की स्थिति में पहुँचकर वर्तमान एवं पूर्व मनीषियों के कथ्य की वास्तविक व्याख्या स्पष्ट दिखने लगती है!
ज्ञानोदय की स्थिति ही ज्ञान के प्रादुर्भाव की
(ज्ञानमार्ग की) प्राथमिकी है! ज्ञानोदय, ज्ञानमार्ग के अक्षरज्ञान जैसा है! तदुपरांत ज्ञानयात्रा प्रारम्भ होती है, अपने-अपने प्रारब्धानुसार ज्ञानमार्गी ज्ञानपथ की सुरम्य यात्रा में अपने लक्ष्य की और बढ़ता चलता है! कोई कुछ कदम चलकर वापस लौट लेता है कोई मीलों चलता चला जाता है! कोई-कोई अनंत यात्रामय आजीवन ही बना रहता है!

प्रत्येक ज्ञानोपाधि उपरांत अन्य उपाधि-ग्रहण की चेष्टा करता हुआ ऐसा मनीषी ही ब्रम्हानंदमय जीवन जीता है!

हरी ॐ!
– सुबुद्ध सत्यार्चन

गोपनीय गुनाह!

सर्वोपरि का दंड विधान बड़ा सीधा सादा है… वो आपकी आत्मा को जगाकर आपको आपकी ही नजरों में गिराकर, आपके मन वचन व कर्मों से, आपको, आपके ही  हाथों दण्डित कराता है!

गोपनीय गुनाह!

एक दोस्त ख़फ़ा था, उस ने कहा कि वो मेरा क़त्ल इतनी सफाई से कर सकता है कि कोई भी और क़ानून भी उसपर शक तक नहीं कर सकेगा….
मैंने कहा यार तू कह भर दे तो मैं हँसकर मर जाऊं…. मगर क़त्ल की, (या किसी भी गुनाह की) कानूनी सजा तो बहुत छोटी होती है, बड़ी सजा वह होती है जो सर्वोपरि देने वाला होता है, बिलकुल अकेले में, आजीवन पूरी तरह गोपनीयता बनाये रखकर भी, किये गए किसी भी अपराध की… सजा तो सुनिश्चित है…

सर्वोपरि का दंड विधान बड़ा सीधा सादा है… वो आपकी आत्मा को जगाकर आपको आपकी ही नजरों में गिराकर, आपके मन वचन व कर्मों से, आपको, आपके ही हाथों दण्डित कराता है!

जो जितना कम दुष्ट उसकी आत्मा उतने ही जल्दी जागती है उसे किंतु दुष्टतम मनुष्य की आत्मा भी कभी ना कभी तो जरूर जागती है… जगाता जरूर है ‘वो’… फिर चाहे वृद्धावस्था में या मृत्यु के आमुख आते आते ही सही… तो

छीनिये और छीनते रहिये,

इस-उस के हिस्से का मान
पर छीने हुए के भी छिनते में,

छटपटायेंगे तो प्राण!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

जीवन ही कर्मफल है तो अब सत्कर्म क्यों?

“सबकुछ तो नहीं किन्तु बहुत कुछ पूर्वरचित है और पहले तथा अभी तक किये जा रहे कर्मों का ही फल है!”

जीवन ही कर्मफल है तो अब सत्कर्म क्यों?

क्या सबकुछ पूर्वरचित है?
क्या संपूर्ण घटित कर्मों का फल है!

हाँ सबकुछ पूर्वनिर्धारित है और सबकुछ पूर्वकर्मों का फल भी है….

किंतु ये पूर्वकर्म अभी अभी बीते हुए पल में किये हुए भी हो सकते हैं और सदियों पूर्व के भी….

तब साधारण भाषा में सामान्य तरीके से समझने योग्य यह भी कहा जा सकता है कि –

“सबकुछ तो नहीं किन्तु बहुत कुछ पूर्वरचित है और पहले तथा अभी तक किये जा रहे कर्मों का ही फल है!”

सद्कर्म सुफल प्रदाता तो होते ही हैं पूर्व दुष्कर्मों के दंडों को भी हल्का करते जाते हैं! इसीलिये सद्गृरु के सांनिध्य में सत्कर्मरत होने का प्रयास कीजिये!

सद्गृरु से गुरुत्व पाने सबमें से सद्गृरु को पहचानने की सामर्थ्य बनानी होती है! जिसकी प्राथमिक आवश्यकतायें हैं सहृदयता, निष्पक्षता और सज्जनता के गुण धारण करना!

सद्गुरु का सांनिध्य केवल सद्जन को ही मिलना सुनिश्चित है!

रामायण में कहा है-

“तुलसी या संसार में सबसे मिलिए धाय।
ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाय।।”

(किस समय किसकी आत्मा में देवत्व जाग जाये….. और कब किसकी वाणी में सरस्वती विराज जाएँ… कौन जाने!)

और यह भी कि-

“एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध,
तुलसी सांगत साधु की कटें कोटि अपराध।।”
(सत्संग फलदायी है!)

“साधु कौन?”

“साधु वही हो सकता है जो, अपने पराये में भेद किये बिना, सदैव शुभ के पक्ष में और अशुभ के विरोध में स्थित रहे!”

“सद्गृरु कौन?”

“वो ही सद्गृरु है जो निज हित-अहित का विचार किये बिना सर्वजनहिताय चिंतन, मनन, मार्गदर्शन और कर्म करे!”

-सुबुद्ध सत्यार्चन

कर्मफल

कर्मफल!

रामायण काल में श्रीराम समुद्र प्रकरण में
“विनय ना मानत जलधि जड़
गए तीन दिन बीत,
बोले राम सकोप तब,
भय बिन होय ना प्रीत!”
.
महाभारत में श्रीकृष्ण ने
शिशुपाल की 100 भूलों तक क्षमा करने और लगभग हर भूल के बाद चेतावनी देने की वचनबद्धता दर्शाई! 101 वीं भूल होते ही श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का सर धड़ से अलग कर दिया था!
.
जीजस क्राइस्ट ने
क्षमादान को महानतम बताया
और उनको सूली टांगने
के जिम्मेदार राजा को भी क्षमा कर दिया!
बाद में उस राजा को जनता ने बहुत बुरी मौत दी! उसका अंत बहुत खराब हुआ!
.
उपरोक्त सभी मेरे आदर्श हैं !
श्रीराम ने जड़ यानी मूर्ख से
सज्जनता पूर्वक निवेदन को व्यर्थ माना!
श्रीकृष्ण ने दुष्ट से समझदारी को व्यर्थ बताया
और जीजस कथा से स्पष्ट है कि
मूर्ख और दुष्ट के लिए आप कोई सजा दो या ना दो उसे अपने कर्मों की सजा तो
मिलनी ही मिलनी है!
ये संदर्भ बताते है कि
प्रत्येक व्यक्ति अपने किये
हर एक दुष्कर्म
और इसी तरह सत्कर्म का भी
फल कभी ना कभी
मिलता अवश्य है!
सुधर जाइए!
सजाओं का समय सन्निकट है!
-SatyaArchan सुबुद्ध

*समाधान

समाधान*

दुनियां में कोई भी निरुद्देश्य नहीं जी रहा है! अनेक उद्देश्य, अनेक योजनाएं, अनेक क्रियान्वयन, अनेक समस्याएं और अनेक समाधान!
अपने उद्देशयों के निर्धारण से लेकर सफल होने के बीच किसी भी समय किसी भी तरह के मार्गदर्शन के लिए संपर्क कीजिए!

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मार्गदर्शक -Satyaarchan

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जीभर जियें!

जीभर जीने का बड़ा सीधा सरल सूत्र है कि हर पल मृत्यु के वरण को तत्पर रहो!
इस हेतु श्रीकृष्ण और तुलसी दास जी में से किसी की भी सीख अंगीकार कर लीजिए –
“कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः” (केवल कर्म ही कर्ता के अधिकार में है उस (कर्म) का फल नहीं! (“फल कुछ भी हो सकता है!” उस फल के स्वीकार के अतिरिक्त कोई विकल्प है ही नहीं!) इसी को तुलसीदास जी ने सरलीकृत किया “हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश, विधि हाथ”
और जो हमारे हाथ है ही नहीं उसके लिए चिंतित होने से क्या लाभ? सर्वांगीण, सर्वोत्तम, समर्पित प्रयास तो हमारे हाथ हैं …. जीवन जीने के विषय में भी यही लागू होते हैं!

रा-फेल

‘रा-फेल’ यानी राहुल गाँधी फेल!
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में बहुत स्पष्ट कहा है कि
1- “रा-फेल” खरीदी में केवल “छोटी-मोटी” त्रुटियों के अलावा प्रक्रिया नियमानुसार ही थी!
2- वायुसेना के उच्चाधिकारियों ने विमान खरीद को आवश्यक बताया!
3- विमान के मूल्य के उचित या अनुचित होने की पुष्टि करना कोर्ट का कार्य नहीं!
3- रिलायंस को विमान संजोने के अधिकारों का सम्बन्ध सरकार से नहीं है इसीलिये उसपर टिपण्णी नहीं!
4- न्यायमूर्तियों ने एक और महत्वपूर्ण आदेश जारी किया कि आगे किसी जांच की जरुरत ही नहीं है!
मेरी मोटी बुद्धि में तो “रा-फेल” के मूल मुद्दे ही वही थे जिनपर माननीय न्यायमूर्तियों ने टिपण्णी या व्यवस्था या निर्णय देने से ही इंकार कर दिया है!

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