ऐ किसान हो तेरा सम्मान!

तेरे मोल का नहीं…. अब तक कोई अनुमान—

ऐ किसान! 
हो तेरा सम्मान!

बाकी के सब बिक गये

तेरे मोल का नहीं

अब तक कोई अनुमान —


एक तू ही शेष सन्मार्ग पर
तू ही शेष महान !


ना रिश्वतखोरी से तेरा नाता
ना कोई छल ही तुझे भाता


तेरी मेहनत ही तेरा अभियान!
बाकी के सब बिक गये….


तेरे मोल का नहीं

अब तक कोई अनुमान—


तू ही है वह सतपथिक
श्रम जिसका अभिमान!
हो तेरा सम्मान!
तू ही एक महान!


तू संघर्षरत प्रति दिन
हर दिन तेरा प्रयास

हर दिन जय पराजय !
तेरे धीरज को प्रणाम!


तेरे साहस को मेरा नमन !
हों सच्चे तेरे अनुमान!
रहें सफल तेरे अभियान!
हो फलीभूत तू

तब होंगे हम निहाल


तू तो होने ना देगा

भूख से बेहाल!


तेरी उपज के मोल को

सदा मिले वाज़िब मान!


ऐ किसान!

तुझे भी मिले

तेरा वांछित सम्मान!


सत्य अर्चन

चेहरे!

चेहरे!

चेहरा,
चेहरे पर चढ़ाने
चुन लीजिए
चाहे जैसा….
एक ना एक दिन
दिख ही जाना है
वैसा…
है जैसा !

चेहरे!

जयति जय जय मां

जयति जय जय मां!

आज शारदीय नवरात्रों के शुभारंभ पर सबको शुभकामनाएं!
मैं भी व्रती हूँ! सन्मार्गी हूँ! सदैव रहना चाहता हूँ!
*सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:*
*सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दु:खभाग्भवेत!*
*अर्थात सभी सुखी हों सभी रोगमुक्त हों सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें! किसी को भी दु:ख का भागी ना बनना पड़े!*
पूरी तरह सच्चे मन से… व निरपेक्ष रहते हुए उपरोक्त श्लोक के मूलभाव के उद्देश्य को मन में धारण रखते हुए…


*अंतर्चेतना में उद्घाटित कुछ नव संदेश सबसे साझा करना चाहता हूँ!*
हम हमारी मानवीय संस्कृति के संरक्षक बनें! मानवता के अनुसरणकर्ता हैं तो समझ लें..   कि “वर्तमान सत के स्थापित होने और असत के विस्थापन का चल रहा है…! चाहे घर हो, समाज हो, देश हो या दुनियां…. सत के मार्ग में बाधक होना यानी सर्वोपरि का कोपभाजन होना है! ‘उसे’ बस प्रकृति को इशारा ही तो करना है… और बड़े से बड़ा सुदृढ़तम स्तंभ भी ढह जाना है..! सत का मार्ग …. सदाचार का मार्ग अपनायें… सन्मार्गी बनें, सन्मार्गियों के समर्धक बनें… सतपथ के अनुगामी बनें, स्थायी सुखी हो जायें…! कम से कम सतपथ के पथिकों का विरोध तो ना ही करें…! सतपथ के पथ पर चलने वालों पर ईश्वर का आशीष सदा से रहा है और रहेगा…! फिर चाहे वह सत्पथिक हाथी सा विशालकाय हो या चींटी सा सूक्ष्म!

@जय माता दी!#

-सुबुद्ध सत्यार्चन!
(आश्विन नवरात्र- प्रतिपदा!)

विचरण अनंत !

बैठे हम भोपाल में, करते कांव कांव!

जी चाहे उड़ जायेंगे… रच लेंगे एक और गांव…!


मन की आंखें, मन के पांव…
चल उठ…बैठे अगले ठाॅंव!


कवि/ कलमकार विषम अनंत
करे भाव विचरण दिग दिगन्त…!


-सुबुद्ध सत्यार्चन

कितने भले हैं लोग!

कितने भले हैं लोग!

लोग, समाज, देश और दुनियां
देख रही है ••• बदल रहा है ••• मिट रहा है ••• उठ रहा है ••• गिर रहा है•••
जैसी बातें तो बहुत होते रहती हैं•••
मगर ये लोग, समाज, देश और दुनियां हैं क्या? कहाँ पाये जाते हैं? इतने खराब क्यों हैं?
है जवाब?
मुझे लगता है कि है!
ये सभी कुछ मैं हूँ! /आप हैं! हम सब हैं! सभी अच्छे हैं! सभी सच्चे हैं••• मगर ना खुद की पूरी तरफ ईमानदारी से देख पाते हैं ना खुद से बाहर अपनों में, ना दूसरों में •••!
*अगर*
मैं कहूँ कि मैं ईमानदारी से खुद को देखता हूँ तो मुझे एक संत समान भला मानुष दिखता है
*तो*
इस वाक्य को पढ़ते हुए ही अनेकों को ऐसी आग लगेगी कि वे भूल जायेंगे कि मैंने इसकी शुरुआत अगर से की है•••• वे आगे इस वाक्य को तक नहीं पढ़ पायेंगे••• आगे पढ़ें जाने की तो छोड़ ही दीजिए !
ऐसा क्यों?
क्योंकि हम सबके संस्कार 80-90% निशेधात्मक शिक्षण के हैं! स्वयं को बड़ा मानना निषिद्ध! कहना अपराध!
किन्तु अपने ईमानदार आंकलन में बुरा ही क्या है?

कैसे करें?

बस स्वयं को स्वयं की तरह मत आंकिये एक परिचित की तरह आंकिये!


इसी तरह अन्य को अन्य के स्थान पर स्वयं को उसके देश, काल, परिस्थितियों में रखकर स्वयं की तरह देखिये!


फिर एकबार फिर से देखकर बताइए कि कैसा है समाज?


शायद मुझसे सहमत हो पायें आप कि लोग, समाज, देश और दुनियां में 95% से अधिक भले और नेक लोग हैं •••• दुपियां बहुत सुंदर है, अच्छी है, भली है!
बुरे लोगों का, बुराई का प्रतिशत तो 1% भी नहीं है••• अच्छे और बहुत अच्छे लगभग 7% किन्तु निष्क्रियों का प्रतिशत सर्वाधिक 98-99% होकर सारा संतुलन बिगाड़ रहा है!
बस हमारा नजरिया बेइमान है•••! इसे  वर्षों पहले देखी बुराई तो साफ-साफ ताजा दिखती रहती है••• याद रहती है••• अच्छाई देखने, सुनने और समझने लायक क्षमता ही गिने चुने लोगों में विकसित हो पाती है और इससे भी बढ़कर समझ लें, तो सराहने की, सराह लिया तो स्वीकारने की, स्वीकारा तो अपनाने की क्षमता तो बहुत ही बिरलों में पाई जाती है!
अगर आ जाये तो????

हसरत तेरी…

किस्मत मेरी…

हसरत तेरी!

करके छेद किया गया कश्ती में हॅंसकर सवार…
चल दिया मुझे देखना था, देखते मेरा डूबना…!
-सत्यार्चन सुबुद्ध

‘उन्मुक्तता’

‘उन्मुक्तता’ (एक लघुकथा!)

एक बार फिर वही होटल का कमरा, वही मादक संगीत… वही शराब… वही  कालगर्ल रेखा… विवेक की बांहों में थी…
रेखा की गर्दन और उसकी लंबी घुंघराली लटों के बीच से हाथ निकाल विवेक ने पैमाना खाली किया तो झट से वो इठलाती हुई उसकी बांहों से फिसलकर निकली… बार टेबल से खाली पैमाना भरकर फिर से विवेक की गोद में ऐसे लेट गई  जैसे बाथरूम में पानी भरे टब में जा समाई हो…

कम गाढ़ा हो तो अंजुरी असमर्थ…! रिसता ही है…!

विवेक उसे यहां वहां छूते हुए उससे छेड़छाड़ भरी बातें कर रहा था… विवेक लम्बे समय से रेखा का नियमित ग्राहक था… वो रेखा की खूबसूरती, उसके मैनर्स, एटीकेट्स से काफी प्रभावित था… वो उसे कालगर्ल से अधिक करीबी दोस्त की तरह मेहसूस करने लगा था… सुरा के शुरूर में तो शायद मनचाही हूर… इसी बीच विवेक ने मुस्कुराकर उसका दुपट्टा हाथ में लपेटते हुए शिकायती लहजे में पूछा

“तूने ये दुपट्टा ओढ़ना नहीं छोड़ा ना… मैंने कहा था ना कि… मुझे तू बिना दुपट्टे के ज्यादा अच्छी लगती है…. मैंने लाल सेंडिल को भी मना किया था यार… तू ये मत पहना कर … … ‌ … अच्छा ये बता … तुझे पता है ना… तुझे याद है इतने सालों में मैंने तुझे मेरे पास आते हुए जो जो ना करने को कहा हो… और तूने उसमें से कुछ भी मानकर ना किया हो? इतने सालों से मैं…. तेरे सिवा किसी को नहीं बुलाता तुझे ही याद करते आ रहा हूं…  और तू है कि… हां तो हर बार कर देती है… पर मेरे लिए… मेरा जरा सा कहा करके नहीं दिखा सकती…क्यों ? …? ….?”
“यार तुम शायर हो …  समझदार लगते हो…. मगर इतनी सी बात भी नहीं समझ पा रहे हो…. ‘शायर साहब’ कि अगर किसी का कहा ही करना होता…. किसी के कहे में ही चलना होता… मैं कर पाती…. तो क्या मैं कालगर्ल होती?”

एक कालगर्ल/ मैनर्ड वैश्या से ऐसी फिलासफी सुनते ही विवेक का नशा काफूर हो गया….!
उसने रेखा को चलता किया… और डायरी उठा लिखने लगा…
‘नारी में उन्मुक्तता की उत्कंठा’ कितनी तीव्र हो सकती है और उस उन्मुक्तता के  परिणामों के दृश्यों से, परिचित कराने वाली उस कालगर्ल से ‘ज्ञानप्राप्ति के बाद’  विवेक फिर उससे कभी नहीं मिला….!
-सुबुद्ध

लाइफस्टाइल सुधारें !स्वस्थ रहें!!

बंदर कभी बीमार नहीं होता

क्यों नहीं होता बीमार ?

शोधकर्ताओं ने विभिन्न बीमारियों के जीवाणु बंदर के शरीर में डालकर देखें लेकिन बंदर फिर भी ठीक!

शोधकर्ताओं में से एक का मानना है कि बंदर भी चिड़ियों की तरह ही सुबह सुबह, सोकर उठते से खाना खाना शुरू कर देता है यह बड़ा कारण है उसके स्वास्थ्य का !

किन्तु मुझे लगता है कि

शोधकर्ताओं ने 2-3 तथ्यों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया…
जैसे – बंदर, खरगोश और चिड़ियां आदि जीव-जंतु जन्म से मृत्यु तक रोज सोकर उठने से  लेकर रात को फिर सोने तक पूरी तरह प्राकृतिक जीवन जीते हैं… प्रकृति के अनुरूप वे स्वयं को ढाल लेते हैं जबकि हम मानव; प्रकृति को अपने अनुरूप बनाने का मूर्खता करते आए हैं…!

बंदर आजीवन सजग व सक्रिय रहते हैं… बंदर, मछलियां और चिड़ियां सर्वाधिक सक्रिय रहने के कारण बाहरी /मानवीय हस्तक्षेप या बड़े जीवों का भोजन ना बनें तो, अकाल मृत्यु और बीमारी से सुरक्षित रहते हैं… बंदर सर्वाधिक मानव समान, सर्वाधिक प्राकृतिक आहार बिहार के साथ साथ सर्वाधिक सक्रिय रहने वाला बंदर सबसे अधिक प्रतिरोधक क्षमता से युक्त है..! क्यों है?

उसी तरह के इंसान जो प्रकृति के सर्वाधिक अनुरूप जीते हैं यथा सूर्योदय से पहले उठने वाले, सूर्यास्त के थोड़े ही बाद सोने वाले, क्या क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए पर ना विचारने वाले मजदूर (शारीरिक सक्रियता से युक्त इंसानों) को देखिए वे और उनके परिजन ही सर्वाधिक स्वस्थ भी पाये जाते हैं…. !
इसीलिए बिना दवाओं या बिना परहेज के स्वस्थ और सबल रहना है तो अपनी लाइफ स्टाइल प्रकृति के अनुरूप बनाने की दिशा में आज ही बढ़ना शुरू कीजिए! आहार में अधिक से अधिक चीजें प्राकृतिक स्वरूप में लेना शुरू कीजिए… हर मौसम की हर प्रकार की सलाद, सब्जियां और फल खाने की कोशिश कीजिए!
स्वस्थ रहिए !
मस्त रहिए!!

टीज़र-टीचर-शिक्षक!

* मेरे माता-पिता और शासकीय प्राथमिक शाला जमुनियां, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में पदस्थ ‘प्राइमरी टीचर्स’ परम-आदरणीय माननीय श्री रामेश्वर सोनी जी, और माननीय श्री राम नारायण शर्मा जी जैसे ‘साधारण से लोगों ने’ बड़ी मेहनत और मुश्किल से, मुझे डांट-मार-कूट कर सिखाया था…! तब कहीं आज मैं सुबुद्ध कहलाया!*

मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से नहीं हूं
जिन्हें समझदारी के खिताब मिलते रहते हों..


मैं तो निपट अज्ञानी पैदा हुआ था…
मुझे तो खुद मां ने सिखाया कि वो मेरी मां हैं और ये मेरे पिता हैं… नहीं तो मैं तो पहचान भी नहीं पाया था…. मुझे पढ़ना-लिखना, दौड़ना-कूदना तो छोड़िए बोलना और चलना तक नहीं आता था…! मां-पिता, भाई-बहिनों ने बड़ी मुश्किल से सिखाया….!

*पढ़ना-लिखना, जोड़ना-घटाना मेरे माता-पिता और शासकीय प्राथमिक शाला जमुनियां, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में पदस्थ ‘प्राइमरी टीचर्स’ परम-आदरणीय माननीय श्री रामेश्वर सोनी जी, और माननीय श्री राम नारायण शर्मा जी जैसे ‘साधारण से लोगों ने’ बड़ी मेहनत और मुश्किल से, मुझे डांट-मार-कूट कर सिखाया था…! तब कहीं आज मैं सुबुद्ध कहलाया!*


इतना बड़ा गधा था मैं…!
फिर जैसे जैसे बड़ा होता गया कुटता-पिटता, हंसता-खेलता सीखते गया! कालेज से निकलते-निकलते सारी पढ़ाई लिखाई ही बेकार लगने लगी… इसी बीच नौकरी मिल गई… अफसर भी हो गये…. मगर सबसे उपयोगी और जरूरी व्यवहारिक ज्ञान में स्नातक हो पाना तो बहुत ही अधिक कठिन था… यह व्यवहार विज्ञान इतना कठिन था कि मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान, व्यवहार प्रबंधन, प्रभावोत्पादकता पर दुनियां भर के जाने-माने लेखकों की कई कई किताबें पढ़ डालने पर भी माता-पिता और प्राइमरी टीचर्स के सिखाये उचित-अनुचित को जानने की जिज्ञासा, पहचान करने, स्वीकारने और अपनाने की मिली शिक्षा के आगे सब छोटा लगा…! उचित व्यवहार सीखने  की चाह है तो सीखना जारी है अभी भी…!  जिससे भी जब भी जहां भी मिलता हूं, बतियाता हूं उसमें अच्छा क्या-क्या  है…  खोजता हूं… और वो जो मुझमें नहीं उसमें से उठा लेता हूं … मांग लेता हूं … कभी कभी चुरा भी लेता…  दूसराें में बुराई खोजने में समय नष्ट नहीं करता…  वो तो मुझमें ही ढेर हैं..!
बस इसी तरह धीरे-धीरे सीखते जा रहा हूं …. क्योंकि मैंने बताया ना कि मैं निरा अज्ञानी जन्मा था .. अब प्रत्येक सुबह जागकर नये जन्म सा अनुभव होता है… जिसमें सबकुछ पिछले की अपेक्षा और बेहतर करने, जानने-सीखने,  की जरूरत मेहसूस होती है…
बताया ना कि मैं उन भाग्यवानों में से नहीं हूं जिन्हें सबकुछ आता है.. वो जो समझदार ही जन्मते हैं..  कुछ तो इतने बड़े ज्ञानी भी अवतरित होते हैं इस धरती पर कि वे जिस विषय में जितना जानते हैं…. उस विषय में सारी दुनियां में, उनसे अधिक जानने समझने वाला ना तो कभी हुआ है, ना आज है और ना ही आगे कभी हो पायेगा!


इन महाज्ञानियों के ऐसे अद्भुत ज्ञान के बड़े चर्चे होते हैं.. और ऐसे चर्चे करने वाले भी वे खुद ही होते हैं … !  ऐसे  ज्ञानवान का गुणगान भला अज्ञानी आमजन कर भी कैसे सकता है…!
हां तो मैं बता रहा था कि मैं सीखा हूं आप सब से, सीख रहा हूं आपसे और सदा सीखता रहूंगा क्योंकि मुझे मेरे मूर्धन्य गुरुजनों से सीखने की सीख शुरु में ही मिल गई थी…!  आज उन योग्यतम शिक्षकों को, आप सबको सादर नमन जिनसे मुझे कुछ ना सीखने मिला है… और मिल रहा है!
-सत्यार्चन सुबुद्ध