बनायें, निभायें या तोड़ें  परम्परायें !

  • बनायें, निभायें या तोड़ें  परम्परायें !
  • 28 मई 2017
    10:43
  •  • कोई भी परंपरा दुनियाँ बनने के साथ-साथ तो नहीं ही बनी होगी!
  •  • उन्मुक्त, उच्छृंखल और अनवरत स्वच्छंद विचरते से थककर कभी किसी ने कोई कार्य, कोई ऐसा संजीदा आचरण किया होगा, जिसे दूसरों ने अपनाकर खुशी पाई होगी!
  •  • ऐसे ही किसी का कोई आचार-विचार या व्यवहार सर्व जन हिताय लगा होगा, तभी सार्वजनिक अनुकरणीय होकर, परंपरा के रूप में ढला होगा!
  •  • “जो परम्परा आदि काल में अनुकरणीय थी क्या वह आज भी उपयुक्त है?”
  •  • “आज जिस परम्परा के सृजक / वाहक हम बने हैं,  क्या कल भी वही उपयुक्त रहेगी?”
  •  • “बिना किसी परम्परा के, समाज; जंगल बन जायेंगे! किन्तु आदिकाल की परम्पराओं को निभाते रहकर भी तो, जंगली ही प्रमाणित हो रहे हैं हम!”
  •  • इसीलिए; अपनी वर्तमान पारिस्थितिकी के
    अनुरूप,
    अपने लिये ,
    अपनी राह,
    अपनी परम्परा,
    सृजित कर,
    अपनी धरती पर,
    अपना स्वर्ग
    आप
    स्वयं ही बनाइये!!!

    #’सत्यार्चन’
    #SatyArchan
    #SathyArchan
    (#-A Global Name @ Web
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मैंने गाँधी को नहीं उस मुखौटे को मारा

मैंने गाँधी को नहीं उस मुखौटे को मारा

 

 

मैंने गाँधी को नहीं मुखौटे को मारा

आया सतयुग! जाता कलयुग …

आया सतयुग! जाता कलयुग …

शायद बाबा जय गुरुदेव जी से भी पहले से मैं कहते आ रहा हूँ, कि सतयुग आ रहा है….

किन्तु अब तो आ भी चुका है!
पूर्ण सत्यनिष्ठ व्यक्तियों का सतयुग प्रवेश हो चुका है किन्तु आसुरी शक्तियों की समाप्ति अभी शेष है… असत, आडंबर, अव्यवहारिक आचरण करने वाले मनुष्य के रूप में हिंसक दानवीय शक्तियाँ आपसी विध्वंस में समाप्त होने जा रही हैें… उनके विध्वंशक युध्द की ज्वाला मैं असत के अहिंसक समर्थक भी नष्ट हो जाने हैं… केवल सन्मार्गी और अहिंसक मुट्ठी भर लोग ही अगले युग में (सतयुग में) प्रवेश पाने वाले हैं… शेष निकट भविष्य में दानवों के आपसी युद्ध से, आने वाले प्रलय में समाप्त हो जायेंगे!
अपना कथन प्रमाणित करने तर्क रख रहा हूँ… सहमत हों तो मेरे साथ आइये … अन्यथा विरोध कीजिये –
यदि आपकी आयु 50 वर्ष या उससे अधिक नहीं है तो 50 बर्ष से अधिक के उतने व्यक्तियों से कुछ प्रश्न पूछिये जितनों के मत जानकर आप अपना मंतव्य बना सकें!
और यदि आप स्वयं 50 वर्ष से अधिक की आयु के हैं वही प्रश्न आपसे भी हैं –

1-
आप अपनी स्मृति में पीछे की ओर, 5 चरणों में जाकर, स्वयं निष्कर्ष निकालें.
आइये अपने-अपने बचपन (5-10 वर्ष आयु) के मित्रों के, और उनके माता-पिता के, समाज का मूल्यांकन करें / तत्कालीन सामाजिक परिवेश का आँकलन कीजिये!,
कितना मानवीय थे वे या कितने आडंबरों को ओढ़े हुए थे? वे सत्य से कितना पास या दूर थे?
2-
उपरोक्त प्रक्रिया को अपनी किशोरावस्था (13-17 की आयु) के साथियों के साथ याद कर दोहराइये.
3-
युवावस्था (19-30 की आयु) के लिये दोहराइये.
4-
मध्यावस्था (35-40 की आयु) के लिये देखिये, और अपने बच्चों के बचपन के साथियों को भी इनमें सम्मिलित कीजिये!
5-
वर्तमान में अपने माता पिता यदि हों तो उनके, आपके स्वयं के और आपके बच्चों के आज के परिवेश का आंकलन कीजिये !
क्या अलग-अलग आयु-वर्गों की जीवनचर्या में, 40-50 वर्ष पहले की तुलना में, क्रमोत्तर सकारात्मक परिवर्तन परिलक्षित नहीं हो रहे?
जैसे – जीवों के प्रति दयाभाव, वृद्धों और बीमारों के प्रति सेवाभाव, पीड़ित की सहायता की इच्छा होना, सकारात्मक विचारों के समर्थन में संगठित होना.
यदि परिलक्षित हैं तो स्पष्ट है कि कि हम सकार यानी सत्य की ओर चल पड़े हैं!
इसके विपरीत यदि आपकी मान्यताओं के अनुसार कुछ नकारात्मक आंकलन भी देख पा रहे होंगे जैसे- स्त्री-पुरुष संबंधों में साथी के प्रति सत्यनिष्ठ समर्पण में गिरावट, अन्य रिश्तों में घटता आपसी स्नेह, धार्मिक अनुष्ठानों से अधिक सामाजिक हितों के कार्यों में सक्रियता…. तो पिछले सतयुग के सामाजिक परिवेश में भी ऐसा ही नहीं था क्या? वर्तमान कलयुग के सद्जन ही अगले आने वाले सतयुग के ‘आदि मानव’ होंगे….
अब तक की मानवीय प्रगति से अर्जित सभी तरह की मुद्राओं के भंडार, मशीनरी, कल कारखाने, वैभवशाली भवन, मुद्राओं के, बहुमूल्य भातुओं के, भोजन के, वस्त्रों के अंबार / भंडार सभी जल-प्लावन में नष्ट …. पहने हुए भी सब व्यर्थ हो जाने हैं … कुछ शेष नहीं बचेगा…. शरीर पर कोई आभूषण कोई वस्त्र भी नहीं….. या शायद अंतर वस्त्र ही बचें …. यही सतयुग में प्रवेश के प्रयास की पात्रता होगी…. केवल तन और स्वस्थ मन की दौलत ही साथ बचेगी…. सब या तो छिन जायेगा या फिर त्यागना होगा…
सारे भेद खत्म हो जाने हैं… कोई जाति नहीं … कोई धर्म नहीं… केवल बोध ही मानदंड बचेगा… कोई रंग भेद नहीं कोई नश्लभेद नहीं…. केवल सु-बुद्धों का ही मान होगा… कोई अछूत नहीं!
<strong> फिर से पुरुष और स्त्री यानी सामर्थ्य और समर्पण, शिव और शक्ति मिलकर नये युग का शुभारंभ करेंगे … सतयुग का आगमन हो चुका है….  कलयुग के निष्कासन के लिये,  आने वाली प्रलय,  की आहट भी सुनाई देने लगी है… तैयारी कीजिये…
आज से….  अब से…. अभी से सत्य का अनुसरण प्रारंभ कीजिये… . यह मेरी प्रार्थना है  …
क्योंकि नई दुनियाँ के निर्माण में आप सब सफल रहने वालों का सहयोग भी आवश्यक होगा…. </strong>
हरि ओम्
….. सुबुद्ध
#सत्यार्चन

हम, हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित हिमायती हम!

हम, हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित हिमायती हम!

भारतीय प्रधानमंत्री जी के अत्यधिक साहसिक कदमों से ‘भारत’ होने
पर गौरवान्वित अनुभव हुआ!

किन्तु
महत्वपूर्ण सामयिक, सार्वजनिक घोषणाओं की
अधिकृत / विसतृत जानकारी ,
संबंधित शासकीय संस्थानों में,

देश के
विभिन्न गैर हिंदी भाषी
प्रदेशों में
अनिवार्यतः त्रिभाषीय
(अंग्रेजी , हिन्दी और स्थानीय
भाषा में भी)
उपलब्ध कराये जाते हैं!
यथा
केरल में
मलयालम,
तमिलनाडु में
तमिल,
बंगाल में बंगला,
हिमाचल,
उत्तराखंड,
उत्तरांचल,
ओड़िशा,
काश्मीरी,
आदि में,
गढ़वाली,
पहाड़ी,
ओड़िया
आदि में भी उपलब्ध कराया जाता हैं!

किन्तु हिन्दी भाषी
मध्य भारत में केवल ऐसी सूचना, प्रपत्र (फार्म) केवल अंग्रेजी में ही
उपलब्ध कराने की प्रथा है!
भई बड़े विशालहृदयी हैं हम???
या

असहिष्णु नहीं हैं हम ….

असहिष्णु ना होना तो अच्छा ही है…. किंतु

अति-सहिष्णु होकर

महामूर्ख भी तो हुये हम —-?

हम,  हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हित हिमायती….
हम हिन्दुस्तानी !!!

#सत्यार्चन

तंदुरुस्त तन्हाइयाँ

तंदुरुस्त तन्हाइयाँ
चलती सड़क पर
सूना सा मेरा  घर
दिलवालों की दौड़
लगी रहती दिन भर —
तनहाई बहुत यहाँ
तनदुरुस्त है मगर —
काश कोई दस्तक हो
कोई आवाज लगाये —
पानी माँगने आये
या पता ही पूछ जाये
कोई प्यास ना बुझाये
रखे – – –
आस ही जगाये!!!

#सत्यार्चन

….. अपेक्षित हैं समालोचना / आलोचना के चन्द शब्द…

यही सच है!

 

यही सच है!
कई बार जो पीछे छूट जाता है, हाथ से छिटक जाता है, गिर जाता है , टूट जाता है •••
अधिकतर उसका केवल उजला पक्ष याद आता है••• मगर यह तो दर्द बढ़ाता है••••
किन्तु कुछ के लिये वही महत्वहीन हो जाता है क्योंकि वे उस हाथसे छिटक कर गिरे की अच्छाई, छूटने के बाद नकारने लगते हैंं! कमियों को याद करते हैं या ढूढ़कर कमियाँ निकालते है••• अपने जेहन में दोहराते हैं और बेशकीमती भी था तो उसे  महत्वहीन बना डालते हैं ! तब वह छिटकना , छूटना साधारण लगने लगता है••• और  अथिक अच्छा कुछ आगे मिलने की आस जागती है•••• अधिकतर लोगों को मिल भी जाता है! यही मेरे साथ भी है !
जो अच्छाई दर्द ना देकर खुशी का वायस हो वह आज हो या ना हो •••• उसे कभी बुरा नहीं कहना, बुरा नहीं सोचना ••••
यही इंसानियत है! धर्म भी यही है!
दुनियाँ में उस अनाम / सर्वशक्तिमान / सर्वोपरि को छोड़कर कुछ भी ऐसा नहीं जो केवल अच्छा या केवल बुरा हो , चाहे वो इंसान हो जगह हो या सामान हो!
#सत्यार्चन

तुम सफल… समृद्ध तुम!

तुम सफल… समृद्ध तुम!

धनवान-धनवती, रूपवान-रूपमती
और ज्ञानवान-ज्ञानवती एक ही कालेज में पढ़े थे!
कालेज के दिनों से ही रूपमती के जन्म-दिन पर सब इकट्ठे होते ही होते !
रूपमती का यह 55वां जन्म-दिन था! सभी शाम की चाय के साथ हँसी ठिठोली करते-करते अपनी -अपनी सफलताओं को बड़ा बताने लग गये !
धनवान- मेरे दोनों बेटों के पास 2-2 आलीशान मकान हैं —
धनवती- और तीन-तीन लक्जरी गाड़ियाँ वो भी हर साल बदल लेते हैं —
रूपमती – हमारी तो दोनों ही बेटियाँ एक के बाद एक ब्यूटी-क्वीन बनीं हैं — तुम्हारे बेटे जैसे दो-चार लड़के रोज दोनों को प्रपोज करते रहते हैं—
अभी केरियर बनाने वो ‘प्रोड्यूसर्स” से मीटिंग्स में बिजी हैं! बाद में किसी भी प्रिंस से शादी कर सेटल हो जायेंगी — तब तक हमारी अपनी आलीशान कोठी भी बन जायेंगी!
रूपवान अपना कप लेकर बालकनी के कौने पर जा खड़ा हुआ!

थोड़े से अंतराल के बाद

ज्ञानवान – धन, रूप सच में तुम लोग समृद्ध भी हो और सफल भी, मगर हम लोग बस सुखी हैं… दाल रोटी चल रही है… सर पर छत है, यात्रा को गाड़ी के साथ-साथ खुशियाँ और भी हैं …. बेटी शहर में ही ससुराल जाकर राजी-खुशी है तो नई बेटी, बेटे की बहू बन आ गई …. बेटी का बेटा और बेटे की बेटी खेलने आ जाते हैं तो दीवाली हो जाती है, ईद, क्रिसमस और होली भी!

-: प्रतिमान :-

  • प्रतिमान –
    जीवन पथ पर चलते-चलते,
    नये-नये उनवान मिले!
    हर एक मोड़ पर अटके-
    भटके,
    कई-कई भगवान मिले!

    गिरते , उठते, चलते , फिरते
    हैवान मिले , शैतान मिले!
    जीवन द्वंद युद्ध सा लड़ते
    कभी-कभी इंसान मिले !

प्यास बुझी ना बुझते दिखती

जी ली प्यास, बुझे ना बुझे अब

जी लिया जीवन सारा प्यासा
अब ना नया प्रतिमान मिले!!!


#सत्यार्चन

-: भगत-राज-सुख:-

भौतिक रूप से मेरे दो ही बेटे हैं
28 और 24 साल
के —-
वो मुझसे अधिक समझदार, सच्चे और अच्छे हैं!
उनसे बहुत कुछ सीखता हूँ मैं —-
उनसे ही क्यों?
मुझे स्वीकारते हुये कोई संकोच नहीं कि
उनके हमउम्र, अगली पीढ़ी के अधिकांश
बच्चे / बच्चियों को, मैं, स्वयं की पीढ़ी से कई गुना अधिक सक्षम समझता हूँ!
आपको अजीब लग
रहा है ?
किन्तु मेरे तीन और बेटे 23, 25 और 28 साल की उम्र के ही हैं लगभग पिछली एक शताब्दी से —-
उनने अपनी उम्र को 23 , 25 और 28 से अधिक ना होने दिया —- मेरे सैकड़ों सुपूतों में से उन 3 सुपूतों, —- समूचे अखण्ड भारत के अपने से मेरे उन अजर-अमर बेटों
***भगत,
****राज
……..और
*****सुख
को सम्पूर्ण
बंधूँ -बांधवों सहित
मैं भी नमन करता हूँ!
हे ईश्वर मुझे प्रति वर्ष ऐसे ही हजारों -लाखों सपूत देना जो देश के / दीन के काम आ सकें!

#मैंभारतहूँ#
– #SathyArchan