चक्रवर्ती सम्राट!

चक्रवर्ती सम्राट!

सफल चक्रवर्ती सम्राट जैसे राजनीतिज्ञ होने के गुर-
1- “किसी अकमनीय अकोमलांगी का कमनीया दिखने जैसा,
किसी भी तरह, सबके आकर्षण का केंद्र होना !”
2- ऐसी (अ)कमनीया के जिसके अनेक प्रेमियों में से प्रत्येक को उस कमनीया का केवल अपने प्रति समर्पित होने का स्थायी भ्रम बनाये रखने जैसा सफल छल कर सकने की योग्यता पाना!
3- ऐसी (अ)कमनीया जिसके प्रेमियों में से किसी को कभी उसका विवाहित (स्वार्थ नामी पति के साथ) और संतान सहित (लालसा, कामना, आराधन-प्रिय आदि का) होना पता ना लग सके जैसी गोपनीयता बनाये रखने की कला में सिद्धहस्त होना!
4- ऐसी (अ)कमनीया, जिसके हर एक प्रेमी को, उसके साथ स्वप्निल मधुर मिलन के किये पिछले अनेक वचनभंग के बहानों में विश्वास स्थिर रहे, और इसके पश्चात वह प्रेमी अगले वचन पर पहले से अधिक बढ़चढ़कर स्वप्न सँजोने लगेे ! ऐसी उच्चस्तरीय बहलाव की कला में पारंगत होना!
( पिछले क्रियांवयन का हिसाब देने की आवश्यकता ही आन पड़े तो असंभव से दिखते अगले वादों को इतनी वजनदारी से सामने रखना कि लोग पिछले
किये-अनकिये की चर्चा करना ही भुला दें! )
5- अगर आप अपने आपको यहाँ तक विकसित कर पहुँचा सकें तो इस क्षेत्र में सफल होने के लिये आवश्यक ‘सद्गुण’ निश्चय ही आपमें नैसर्गिक रूप से पहले से विद्यमान होंगे ही और दुनियाँ की कोई ताकत आपको चक्रवर्ती सम्राट होने से नहीं रोक सकेगी!!!!

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#SatyAlert -2

#SatyAlert -2

मैं आप  सबके उत्साह और समर्पण का सम्मान करता हूँ मित्र ….

किन्तु मुझे भविष्य के दर्पण में इसके साथ-साथ और भी बहुत कुछ स्पषट सा दृष्टिगत है यथा-

1 – माननीय नरेन्द्र मोदी जी 2021 तक निर्विध्न भारत की सत्ता की बागडोर सम्हाले रखेंगे!

2- सन् 2021 में वर्तमान मुद्रा परिवर्तन जैसे किसी विशेष निर्णय से उनके निकटजन ही उनके प्रबल विरोधी हो जायेंगे!

3- 2021 में मोदीजी राजनैतिक जीवन से स्वयं को सदा के लिये दूर कर लेंगे!

4- इसी वर्ष भाजपा का अंतर्विरोध भाजपा का विघटन करायेगा !

5-  2022 के प्रारंभ में मध्यावधि चुनाव दिख रहे हैं ! जिनमें  मोदी विहीन भाजपा का हश्र आज की कांग्रेस सा होगा!

6- कांग्रेस, या आआपा, या सपा, बसपा, जद, आदि वर्तमान बड़े दलों से अलग कोई नई पार्टी जिसका अभी अस्तित्व भी नहीं है सत्तासीन होगी!

7-  उस नवोदित शक्ति के नेतृत्व में, मोदीजी जैसी तेजी से सत्ता-संचालन की भूख होगी जिससे 2027 तक भारत विश्व की सर्वोपरि शक्ति के रूप में स्थापित होगा!

मेरी अन्य, विगत सत / असत प्रमाणित, जैसे 2014 के चुनावों में भाजपा का अकेले स्पष्ट बहुमत पाना,  ओबामा के बाद अमेरिका का पतन होना जो 2012-13 में लिखा था, होता दिख रहा है, चीन में आंतरिक विद्रोह होने को है, आदि

भविष्यवाणियां मेरे अन्य ब्लाग https://swasaasan.blogspot.com के ‘सत् दरबार’ पृष्ठ पर उपलब्ध हैं!

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नियुक्ति… फिर पदोन्नति में आरक्षण!

         अभी-अभी,  दो-दो माननीय उच्च न्यायालयों के,  एक जैसे विषय पर,  दो महत्वपूर्ण  निर्णय,  दोनों राज्यों के शासन के विरुद्ध आये! पहला आज राजस्थान उच्चन्यायालय ने राजस्थान सरकार को संविधान में आरक्षण का 50% तक सीमित किये जाने का हवाला दे गुर्जर/ पाटीदार आरक्षण को अवैध करार दिया… ! दूसरे में, विगत दिनों, मध्यप्रदेश शासन के पदोन्नति में आरक्षण को अनुचित ठहराया गया है!
इन  निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में कुछ बातें स्पष्ट हुईं और कुछ पर  विचारना आवश्यक हो गया है!
इन निर्णयों से स्पष्ट है कि या तो, 70 सालों के अनुभवी विचारविमर्ष के बाद,  उच्च न्यायालय, पहली बार संविधान की व्याख्या में सक्षम हुए हैं या फिर समर्थ को संविधान की धाराओं की व्याख्या अपने अनुरूप करने / कराने से रोकना संभव नहीं है (दोनों प्रदेश की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय में यही करने का प्रयास कर रही हैं / करने जा रही हैं) !
माननीय न्यायालय के निर्णय से पता चला कि सरकारें,  चुनावी तुष्टीकरण के लिये,  संविधान के विरुद्ध सामयिक आचरण करती रहती हैं … क्योंकि शासकीय  विधाई योजनाकारों में सर्वोत्तम कानूनविद सलाहकर्ता भी होते हैं जो सांवैधानिक सीमाओं को जानते तो अवश्य हैं किन्तु अपने शासक को उनमें बँधने की सलाह से शायद दूर ही रहते होंगे…!
कुछ भी हो लेकिन आरक्षण अधिनियम को पुनर्व्याख्यायित करना /  इसपर पुनर्विचार करना आवश्यक हो गया है!
 विचारणीय है कि यदि वर्तमान आरक्षण प्रणाली उन्हीं वंचित आरक्षितों के हित-सम्वर्धन में असक्षम हो चुकी है, जिनके उन्नयन के लिये इसे लागू किया गया था, तो इसे निरंतर जारी रखने का क्या औचित्य है!
क्या यह राजनैतिक तुष्टिकरण का वीभत्स उदाहरण मात्न शेष नहीं रह गया है???
सविनय अनुरोध है कि शासन एक सर्वेक्षण कराकर देख ले कि-
1 – आरंभ से अब तक कितने प्रतिशत आरक्षित वर्ग के परिवार पहले पहल वर्तमान आरक्षण नीति से लाभान्वित हुए हैं!
2- कितने प्रतिशत गैर सुविधा भोगी आरक्षित परिवार के सदस्यों, को विगत ३ दशक में, वर्तमान आरक्षण नीति का लाभ मिल सका !
3- दूसरे ऐसे जरूरतमंदों के लाभार्जन के प्रतिशत का ग्राफ प्रति वर्ष किस तेज़ी से नीचे गिरते जा। रहा है!
मेरा दावा है कि सर्वेक्षण के परिणाम में, विगत वर्ष तक ही वास्तविक दलित / वंचित लाभार्थी १ प्रतिशत से भी कम परिलक्षित होंगे‍!
और
99% सुविधाभोगी आरक्षित कुल में जन्मने के कारण मात्र, निर्लज्जता पूर्वक वंचितों के अधिकार को लूटने वाले निकलेंगे!
साथ ही वर्तमान आरक्षण प्रणाली से क्या यह परिलक्षित नहीं होता कि –
1- आरक्षण व्यवस्था का आधार, आरक्षितों की अनारक्षितों के समकक्ष योग्य होने में नैसर्गिक अक्षम मान लेना है!
और यदि ऐसा है तो भारत के अतिमहत्वपूर्ण एवं महत्वपूर्ण शासकीय पदों पर कार्यान्वयन का दायित्व स्वयं शासन द्वारा
अ-सक्षम  निष्पादकों द्वारा कराया जाना सुनिश्चित किया गया है!
2 – पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था से यह प्रमाणित किया जाने का प्रयास है कि, संदर्भित आरक्षित वर्ग,  सुविधा पाकर भी स्वयं को सुयोग्य बनाने में अक्षम है और साथ ही भारत की संसद सहित समस्त महत्व के शाशकीय पदों पर उपलब्ध अधिक योग्य व्यक्तियों की अपेक्षा बहुत कम योग्य व्यक्तियों से दायित्व निर्वहन कराया जा रहा है!
साथ यह भी ध्यान देने योग्य है कि ऐसा किया जाकर राजनैतिज्ञों ने राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि में स्वयं माननीय बाबा साहब अंबेडकर के सुझाव को तोड़मरोड़ डाला है! माननीय बाबा साहब के सुझाव में केवल तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग के शासकीय पदों पर 33% नियुक्तियां आरक्षित श्रेणी से की जाने का प्रस्ताव था! यह भी ध्यान देने योग्य है कि उस समय ऐसी भर्तियों के लिये लिखित या मौखिक परीक्षा का प्रावधान ना होकर सक्षम अधिकारी द्वारा, योग्यता मानदंड पूरे करने वालों की सीधे  नियुक्ति ही की जाती थी!
 3- आरक्षण की मूल अवधारणा के अनुरुप प्रतियोगिता होने पर,  विशिष्ट अनुसूची में वर्गीकृत जातियों के, सफल प्रत्याशियों की संख्या का एक निश्चित प्रतिशत तक होना, सुनिश्चित करना प्रस्तावित था,  इसमें अनारक्षित के अंतिम सफल प्रत्याशी के समकक्ष या अधिक योग्यता अंक लाने वाले को, आरक्षित में ना मानने संबंधी, कोई निर्देश नहीं था!  किंतु निहित राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि की प्यास ने आरक्षण सूची में सम्मिलित रहने के लिये अनारक्षित से कम योग्य सिद्ध  होने को आवश्यक बना दिया!
इसी कारण आरक्षित वर्ग, आज भी अनारक्षित के समकक्ष योग्य होने में, आरक्षण का लाभ छिनने के भयवश आनाकानी कर रहा है!
4- अनारक्षित से न्यून योग्यता की इसी आवश्यकता की अवधारणा के चलते अनुसूचित जाति/ जनजाति, ओबीसी, महिला, पूर्व सैन्य कर्मी / आश्रित, तलाकशुदा / परित्यक्ता महिला, स्व.सं.सै. आदि के बाद सर्वथा योग्य और पूर्ण निर्दोष सवर्णों को 10%  एवं सवर्ण पुरुषों को 5%  से भी कम संख्या में अवसर उपलब्ध हो पा रहे हैं…!
5- भारतीय आरक्षित वर्ग के आरक्षण का लाभ छिनने के भय से अयोग्य, एवं अनारक्षित अवसर की अनुपलब्धता से  कुंठित कंधों पर भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का दायित्व है!
 “हमारे योग्य कर्णधारों को मातृभूमि के प्रति समर्पण का मूल्य स्वयं से कम / बहुत कम  योग्य के अधीन रहकर जैसे-तैसे जीवनयापन करने या अपनी (अ/न्यायी?) मातृभूमि के प्रति समर्पण को भूल योग्यता का उचित मान करने वाले देश में रोजगार तलाशने की विवशता हो गई है!”
आज आरक्षित वर्ग के मेरे परिजनों के उचित उत्थान पर विचार की आवश्यक हो गया है. मुझे लगता है कि जिन जातियों / जनजातियों को वंचित माना गया है उनमें से वास्तविक वंचितों को चिन्हित कर उनका सर्वांगीण उन्नयन करने प्रारंभ से ही  उनकी  निःशुल्क स्तरीय आवासीय अतिरिक्त समर्पित व्यवस्था की जानी चाहिये जिससे वे अनारक्षितों से प्रतियोगिता में बड़े अंतर से और ससम्मान आगे निकल सकें! ना कि जातिप्रमाण के आधार पर अयोग्य रहते हुए भी, योग्य अनारक्षितों का अधिकार छीनकर !
#सत्यार्चन

बताना मुझे आता नहीं…

… बताना मुझे आता नहीं …

मतकर दोस्त…

रहने दे आज

हँसने का,

जरा भी,

जी नहीं…

मुफलिसी का दौर है,

और छलक गई…

ठीक से पी नहीं…

.

इश्क है

जताता भी हूँ पर…

जाँचना तुझे आता नहीं ..

बताना है तुझे

कितनी चाहत है  मगर…

बताना मुझे आता नहीं…

.

मेरी जानिब तू भी

बेकरार तो है

इकरार कर…

इजहार मेरा दिखता है तो

तोड़कर दीवार,

इश्क का दीदार कर

इसरार ही में

ना बीते बाकी

खुद पर अब तो ऐतबार कर….

महामूर्ख, मूर्ख और समझदार…

महामूर्ख, मूर्ख और समझदार…

मुख्यतः 3 तरह के लोग हैं दुनियाँ में, महामूर्ख, मूर्ख और समझदार!!!
वे जो देखकर, सुनकर या किसी अन्य से जानकर पहले वस्तुओं / लोगों  को अच्छे या बुरे में वर्गीकृत करते हैं … फिर अच्छों में केवल अच्छाइयां और शेष में केवल कमियाँ ही देखते हैं! वे महामूर्ख की उपाधि योग्य हैं!
दूसरे प्रकार के लोग नई वस्तुओं / लोगों / नवाचारों को डरते-डरते जैसे तैसे आजमाने तैयार होते हैं, पहले केवल खामियां देखते , गिनते, गिनाते हैं फिर नकार देते हैं, फिर कभी कहीं से पुनरानुरोध पर स्वीकार लें तो उसकी खामियाँ याट करने, स्वीकारने, और शेष पर विचार से ही इंकार करते हैं!!! ये मूर्ख कहवाने योग्य होते हैं!
तीसरे वे हैं जो उपलब्ध वस्तुओं / लोगों / नवाचारों को स्वीकार से पूर्व सभी के गुण-दोषों का तुलनात्मक अध्ययन करते / कराते हैं फिर परिवेशानुसार न्यूनतम दोष एवं अधिकतम उपयोगिता वालों का चुनाव करते हैं! वे जानते हैं कि संसार में दोषमुक्त कुछ नहीं है! न्यूनतम दोषयुक्त ही सर्वोत्तम है! और सर्वदा-सर्वोत्कृष्ट कुछ नहीं रह सकता… जो आज सर्वोत्तम / सर्वश्रेष्ठ स्थापित है कल या आज भी दूसरे परिवेष में उसका स्थान कुछ / कोई अन्य अधिक उपयेक्त होगा!!! ये ही समझदार कहलाने योग्य हैं!

मधुर मिलन….. 

 – मधुर मिलन ….. 

मकसद को ढूंढ़ते….
या मकसद के पीछे भागते लोग

अकसर याद नहीं रख पाते …
अपनों को ..
अपनों की जरूरतों को …
अपनी भूख को …
प्यास को ….
अपने आप को…
मगर कहां मुमकिन …
कितना मुमकिन …
कब तक …
कितनी देर तक….
दूर रह सकेगा कोई …
अपने आप से ..
अपने भीतर के उस आईने से
मिलने से कैसे बचेगा  …
जो खोल देता है …
अपनी छाया  और अपने आप के बीच  ….
आने वाले सारे पर्दे

सारी पर्तें

एक के बाद एक

हटती चली जाती हैं

फिर मिलना ही होता ह …

सामना करना ही होता है …

शून्य से … बुलबुलों से छीने अनंत प्रश्नों का …

सब उघड़ता चला  जाता है…

एक-एक कर सारे सारे पर्दे टूट जाते हैं

चिलमन तार तार हो जाते हैं…

तब …

हाँ केवल तभी

हो पाता है …

स्वयं से …

अपने आपसे …

मधुयामिनी सा

मधुर मिलन…..

सत्यार्चन

जीवन सफल?

प्रिय मित्र;
हरि ॐ!
मेरे प्रश्नों के उत्तर मिल पायें … शुभकामनायें !!
1 – आपको…. क्या पाना अब भी शेष है?
2 –  क्यों पाना है?

3- क्या आपको उस प्राप्ति से क्या जीवन की सार्थकता का अनुभव मिलेगा?

4 – क्या इन्हीं प्राप्तियों के लिये आपको यह जीवन अवसर के रूप में प्राप्त हुआ है…?
5 – आप जितने सक्षम हैं क्या उतने सफल हैं?
6 – वास्तव में कितने सक्षम हैं आप?
7 – आपकी सारी सफलतायें मिलकर आपको कितनी प्रसन्नता
दे चुकी हैं? / दे रही हैं?? / देती रहेंगी ???
8 – क्या जीवन की सफलता, सफलताओं में ही है???
#सत्यार्चन #SathyArchan

लटकी हुई शर्त — Prahlad Chandra Das

गंगाराम, गंगाराम ! नंगाराम, नंगाराम !! दुबला-पतला सींक सा लड़का गंगाराम और पीछे चिढ़ाती हुई उद्दंड लड़कों की टोली – गगाराम,गंगाराम ! नंगाराम, नंगाराम !! …… अच्छे-खासे नाम की ऐसी-की-तैसी कर दी थी बदमाशों ने! गगाराम इक्के-दुक्के के साथ विरोध करता, कभी-कभार लड़ भी जाता, लेकिन, जब लड़कों की पूरी टोली ही उसके पीछे […]

via लटकी हुई शर्त — Prahlad Chandra Das

LIFE RULE. — chandanspdblog

1. *जीवन* जब तुम पैदा हुए थे तो तुम रोए थे जबकि पूरी दुनिया ने जश्न मनाया था। अपना जीवन ऐसे जियो कि तुम्हारी मौत पर पूरी दुनिया रोए और तुम जश्न मनाओ। 2. *कठिनाइयों* जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों […]

via LIFE RULE. — chandanspdblog