भारत के शीर्ष 10 – प्रधानमंत्री

भारत के शीर्ष 10 – प्रधानमंत्री  

मोदी जी से पहले भारत के जो प्रधान मंत्री हुए हैं … उनपर हम सबका अलग-अलग अभिमत होगा किंतु बहुमत और सुमत को मिलाकर अब तक के टाप 10 का अब का निष्कर्ष यह हैं …

मोदी जी को इस आँकलन में पूरी तरह सम्मिलित नहीं किया गया है। शेष को वह स्थान क्यों दिया जाना चाहिये इसके संक्षिप्त कारक भी नाम के साथ ही दिये गये हैं …  किसी विशिष्ट राजनैलिक विचारधारा से जुड़े या निष्पक्ष लोगों को भी आपत्ति हो सकती है तो वे अपनी आपत्ति या अपना अभिमत संभ्रांत शब्दों में कारक सहित लिखें … उचित अभिमत के आधार पर सूची पुनरीक्षण निरंतर जारी रहेगा ! यहाँ दिये 5 क्रम भी आभासी हैं अंतिम नहीं ….

आप चाहें तो विकीपीडिया से पुनर्स्मरण हेतु संदर्भ देख सकते हैं….

1 –  जवाहर लाल नेहरू जी,

(अंग्रेजों ने भारत छोड़ने से पहले देश को आर्थिक, सामाजिक और सौहीर्द्र के क्षेत्र में नेस्तनाबूद ही कर दिया था इसके बाद भी राष्ट्रीय आत्म निर्भरता के लिये, जब देश की प्राथमिकता रोटी और कपड़ा ही थी तब भविष्य को भी साथ साथ विचारकर भाभा एटमिक सेंटर, टिहरी गढ़वाल, भाखरा नांगल जैसे बड़े बांध, सहित अनेक औद्योगिक इकाइयों का प्रारंभ,   17 वर्षों तक लगातार सर्वांगीण विकास के लिये समर्पित व सफल प्रयास .)

2 – राजीव गाँधी जी,

(विषाद में,  वेमन से विषम परिश्थितियों में कार्यग्रहण के बाद से हर समय राष्ट्र को 21वीं सदी में टाइम ट्रेवल कराने के प्रयास करते रहे. विवादास्पद व क्रांतिकारी कंप्यूटरीकरण इन्हीं के कार्यकाल की देन है,  प्रबल विरोध के बाद भी ‘आधार  कार्ड योजना (नंदन नीलकणि योजना)’ भी इन्हीं के कार्यकाल की देन हैं जो आधुनिक भारत के आधार बने हुए हैं)

 

3 – अटल बिहारी वाजपेयी जी

(विशिष्ठ व्यक्तित्व की विशिष्ठ कार्य पद्धति सिद्धांत पर चल देश की मई प्राथमिकताओं के चयन व उनको वरीयता के आधार पर ‘परमाणु शक्ति संपन्न होने के पथ पुनरागमन,  ‘स्कूल चलें हम’, ‘प्र. मं. सड़क’ जैसी यौजनाओं का क्रियान्वयन प्रारंभ‍‍….).

 

4 – नरेंद्र मोदी जी

(क्रांतिकारी निर्णय  की अभूतपूर्व क्षमता व दक्षता , अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत को सशक्त राष्ट्र के रूप में  स्थापित कराने में  अब तक के सर्वाधिक सफल राष्ट्राध्यक्ष! वर्तमान में कार्यरत ,

नोट – इनके द्वारा लागू कराई गई क्रांतिकारी योजनाओं के परिणाम आने पर ये इस सूची के शीर्ष पर भी हो सकते हैं और सूची से बाहर भी…)

5 – इंदिरा गाँधी जी,

(आपात्काल जैसा मनमाना निर्णय व आपरेशन ब्लू स्टार की जगह अन्य शांतिपूर्ण कूटनीतिक विकल्प अपनाये होते तो नेहरू जी, व राजीव गाँधी जी के साथ इस सूची में दूसरे  तीसरे स्थान पर होतीं. पूर्वी पाकिस्तान को बांगलादेश के रूप में उदित होने में  इन्हीं की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाया गया जिसके परिणामस्वरूप हमारा शत्रुता रखने वाला, पड़ौसी देश, आधा ही शेष बचा. बैंकों का राष्ट्रीयकरण व सुदृढ़ केन्द्रीय बैंक व्यवस्था जो वैश्विक मंदी के दौर में देश को सुरक्षा देने में सक्षम रही. जिसे सारी दुनियाँ ने सराहा.)

 

 

6वें से 10 वें क्रम के लिये , बिना क्रम की प्रतीक्षा सूची  में संयुक्त रूप से इन सभी का है. नाम सम्मिलित है …

31 अगस्त तक सबके अभिमत आमंत्रित हैं उसके बाद ही क्रमांकित सूची जारी की जायेगी –

पी व्ही नरसिम्हाराव जी,

मोरारजी देसाई जी,

वी पी सिंह जी

मनमोहन सिंह जी

इंद्रकुमार गुजराल जी

चंद्रशेखर जी

चौधरी चरण सिंह जी,

– मैं – जगदगुरु ! –

मैं – जगदगुरु !

आज गुरु-पूर्णिमा !

सर्वांग सुंदर व संतुलित भारतीय संस्कृति का वह सर्वश्रेष्ठ दिन

जो गुरु को स्मरण कर उनके प्रति अपने कर्तव्य-पालन स्वरूप

उन्हें कोई उपहार समर्पित करने के लिये है.

कुछ और ना दे सकें तो सम्मान ही प्रकट कर दें.

सम्मान ! जो गुरुजनों का सर्वप्रिय है.

यही मेरा भी अभीष्ठ है,

दे रहा हूँ और पा भी रहा हूँ!

हे मेरे जगदगुरु; 

आपको, मुझ जगदगुरु का,  साष्टांग प्रणाम है…. स्वीकारिये!

कौन सा जगद्गुरु?

जी मैं ! और आप भी! जो इस समय इन शब्दों को पढ़ रहे हैं…..!

कैसे ?

जगत के वे सभी जीवित व अजीवित पदार्थ जिनसे हमारा सम्पर्क होता है.  कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ सिखा कर और सीख कर ही जाते हैं… हम कभी-कभी ही ध्यान दे पाते हैं कि हमने किससे कब क्या सीखा… या ध्यान दे भी पायें तो मानने से पीछे हटते हैं… क्योंकि एक से सीख कर दूसरे को सिखाते हुए  आप स्वयं को ही ज्ञानवान  प्रदर्शित कर सम्मान अर्जित करते हैं, और उस मान को पाकर प्रसन्न हो रहे होते हो…. जो आपका था ही नहीं ….  यानी आप,  उस मान को चुरा कर पा रहे होते हो…

मुझसे ना कभी झूठ बोला गया….  ना चोरी कर पाया  …

जहां तक हो सके  ज्ञात के श्रोत को संदर्भ सहित याद रखने का प्रयास करता हूँ…. और बाँटते समय उस श्रोत के साथ श्रेय बांटने से कभी मुझे प्राप्त श्रेय घटा नहीं बल्कि बढ़कर ही मिला …  इसीलिए  श्रेय को श्रोत के साथ बांट कर ही पाना पसंद करता हूँ…  कभी-कभी , किसी कारणवश,  श्रोत का संदर्भ दिये बिना बताने पर,  कोई श्रेय दे भी रहा हो तो टोकता  हूँ कि यह  मेरा अपना अभिमत नहीं वरन इससे मेरी सहमति मात्र है  ….

         फिर भी अनेकानेक सुधि जन शेष रहे होंगे,  जिनके प्रति भी,  मुझे उनके गुरुवत प्रदत्त ज्ञान के लिये कृतज्ञ होना ही चाहिये …. उनके प्रति आदर समर्पित करने का एक प्रयास है…

सच तो यही है कि किसी का भी कोई एक ही गुरु नहीं होता  …  मेरे भी कोई एक ही गुरु नहीं हैं जिनसे मैंने विशिष्ट ज्ञान प्राप्त किया हो …  जगत के सभी जन जो किसी ना किसी तरह मेरे सम्पर्क में आये मेरे ज्ञान के पथ पर पथ-प्रदर्शक ही बने. इसीलिए सबका कृतज्ञ हूँ ….

सभी का…. जिनमें सर्वप्रथम मेरी माँ व पिता हैं जिन्होंने बोलने, सुनने-समझने से लेकर चलने, खेलने पढ़ने का ही नहीं …. सत और असत दोनों को ही जानकर,  सार्थक को चुनने और चुनकर अपनाने की सीख भी दी!  इस सीख के कारण ही हर वह व्यक्ति जिससे मेरा सम्पर्क हुआ, उससे सार्थक निकल कर ज्ञान रूप में मुझमें संचित होता रहा… सीखने की,  पाने की, पाते रहने की प्यास पीते रहने के साथ गहरी और गहरी होती गई… अब भी गहराये जा रही है…

अन्य मुख्य गुरु हैं –  प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय  तक के सभी शिक्षक,  जिनसे अक्षर ज्ञान से लेकर अंतरिक्ष-ज्ञान  तक संभव हुआ.

सभी लेखक, जिन-जिनकी रचनायें मैंने पढ़ीं विश्व प्रसिद्ध लेखकों से लेकर मेरे मित्रों व शिष्यों तक,  सभी लेखक)!. भले उनकी किन्हीं रचनाओं के दृष्टव्य से मेरी पूर्ण असहमति ही रही हो किन्तु … नवाचार का सूत्रधार तो हर एक विचार बन सकता था, तो बना.

 सभी नामी गिरामी व अनाम लेखकों की पुस्तकें,  सभी शास्त्र जिनका हमने अध्ययन किया!जिनसे वैचारिक क्षमता दिनोंदिन निखरती गई और निखरते जा रही है….!

वे सभी नेता व अभिनेता (रंग कर्मी) जो निर्माता, निर्देशक या पोषक के अनुसार स्वयं को  प्रत्यक्ष या पर्दे पर प्रदर्शित करते रहे हैं. जिनके प्रदर्शन से परोसे जाने वाले विषय इतने सजीव लगने लगते हैं… कि कहीं ना कहीं समर्थन या विरोध की प्रबल आकांक्षा जाग ही जाती है!

मेरे सभी मित्र, (परिजन, स्वजन, कुटुंबीजन व निकटजन) जिनके प्रेम, आलोचना व सराहना…  मुझ जैसे सामाजिक प्राणी के, जीवनाधार हैं.  उनकी समालोचना के कारण ही स्वयं का (लगभग) समाकलन करना संभव हो सका…  (स्व-आँकलन तो कई लोग करते हैं किंतु अधिकतर अधो-आकलन या उच्च-आँकलन को ही स्वीकारते हैं ….)

मित्र-रुप में मिलकर शत्रु-भाव रखने वाले विद्रोही जन…. जिनके वर्ताव, दुराव और अलगाव से मानवता के शत्रुओं को पहचानना सरल हो सका और हो रहा है…

हर वह सहयात्री जो किसी छोटी बड़ी यात्रा को सहज या दुष्कर बनाने का उत्तरदायी रहा हो…! जो जाने-अंजाने जीवनयात्रा में पथ प्रदर्शक बनते रहा है… जीवन के दुष्कर क्षणों को सहज होकर बिताने में सहायक …. और सुखकर क्षणों को शीघ्र पहचान कर आनंदमय बिताने में भी….

 स्त्रियां जो मेरी होकर या ना होकर भी…. मेरे जीवन की दिशाओं के निर्धारण का कारक बनीं!

संसार का प्रत्येक सामान्य व्यक्ति अपने योग्य जोड़ा बनाये बिना अपूर्ण है… भले कोई स्वीकारे या अस्वीकार करे …  किन्तु स्त्री-पुरुष दोनों ही ईश्वर की (इच्छित) अपूर्ण रचनायें हैं… पूर्णता की आस भी सभी को है… पूर्णता दोनों के एकांगी होने पर ही मिलती है…. किंतु  शारीरिक एकांग होना या मिलन ही इसकी कसौटी नहीं है…. बिना शरीर को स्पर्श किये भी दो व्यक्ति एकांगी हो सकते हैं… और लगातार शारीरिक सम्पर्क में रहने वाले भी पृथक-पृथक ….  संसार का कोई भी व्यक्ति,  (स्त्री या पुरुष) सर्वगुण संपन्न पुरुष या स्त्री नहीं है … ना ही हो सकता है…. किंतु गुण शून्य भी तो कोई नहीं है …. सभी आदर्श साथी की प्राप्ति के आकांक्षी …. इसी लिये  आदर्श की प्राप्ति भी किसी को नहीं…. किसी में कुछ विशेषताएँ है तो किसी में कुछ और …. मेरे लिये भी यही सिद्धांत लागू है …. मैं अनेक व्यक्तियों का प्रिय हो सकता हूँ….  कई व्यक्ति मेरे भी प्रिय होंगे ….  किंतु सामाजिक स्वीकार्य वरण तो किसी एक का ही हो सकता है… शेष मिलकर भी या बिना मिले ही  प्रेरक बन सकते हैं….  जिसका वरण किया उसपर भी यही लागू है… किन्तु जिसका वरण किया है उनमें सम्पूर्ण नहीं तो सर्वोच्च समर्पण तो  होना ही चाहिये … सो है…! अतः जिन्होंने विचार रूप में भी स्वीकारा उनका …. और जिन्होंने हर प्रकार से नकारा उनका भी कृतज्ञ हँ…. वे मुझमें शेष त्रुटियों को ढूंढ़कर दूर कराने के प्रेरक हैं…!

मेरे वे प्रतिद्वंद्वी जिनसे मेरी वास्तविक प्रतिस्पर्धा रही,  उनसे जय-पराजय को स्वीकारना सीखा, जिनसे मैं विजयी हुआ उनसे, उनकी मुझसे पराजय की भूलों को जानकर ज्ञानार्जन हुआ किंतु जो मुझसे विजयी रहे वे प्रतिस्पर्धी ,अधिक ज्ञानदाता बने… उनसे वह भी सीखने मिला जो मुझमें था ही नहीं…. !

सभी धर्मों के धर्म-प्रवर्तक व प्रचारक

जिनके ध्यान में केवल जनहित रहा होगा  या रहता होगा ….

…. वास्तविक धर्मोपदेशक, धर्म  की मूल अवधारणा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’  से हटकर कोई और संदेश नहीं दे ही नहीं सकता….  चाहे वह किसी भी धर्म से संबद्ध हो…! कोई धर्म प्रचारक यदि धर्म के नाम पर हिंसा को उचित ठहरा रहा है तो वह अपने ही धर्म से अपरिचित है… वह नाम का धर्म प्रचारक है… वास्तव में वह एक व्यवसायी है… जो धर्मांधता का व्यापार करता है…! दोनों तरह के धर्म प्रचारकों के कारण सभी प्रचलित धर्मों को जानना आसान हुआ…. उन्हें भी मेरा प्रणाम…!

वे पूजाघर, प्रार्थना स्थल,  मठ और मठाधीश जो प्रेरणा पुंज हैं …. जहाँ समग्र आस्था का वास होता है…. जहाँ की शालीनता उस स्थल और उसके रखरखाव को नियुक्त व्यक्ति को,  उस स्थल में जरा बहुत समय भी बिता सकने वाले श्रद्धालु को भी वहाँ के प्रताप का प्रसाद अवश्य देते है… मेरे मानस पटल में भी ऐसे की कई देव-स्थल प्रसाद स्वरूप  स्थायी हैं…. उन्हें प्रणाम!

वह गगन जिसके आँचल में दिन में सूर्य के तेज को समाने का सामर्थ्य है तो; रात में चाँद सितारों की शीतल चुनरिया बन जाने का गुण भी …. सिखाता है परिवेश के अनुरूप ढलना….

वे पेड़-पौधे जो विषपायी शिव के प्रतिरूप हैं,

जो; तुम्हारे समस्त  उत्सर्जित  को,  विष को;  निर्विकार, मौन रह,आत्मसात कर,तुम्हें जीवनदायी हवा, दवा, पुष्प, पोषण और जीवन देते रहते हैं…   निरास होना … निःआस होकर,  कर्तव्य करते रहकर भी सहज व सुखी होने का संदेश देते हैं… उन्हें प्रणाम!

वे कुएँ, तालाब व नदियाँ जिनकी उपयोगिता व पवित्रता,  हमपर निर्भर है … और हमारे ही लिये है!  ये सभी जलाशय उपयोगी से निःसंकोच उपयोगिता लेने और ना लेने पर भी सर्वजन हिताय शुचिता बनाये रखने की सीख देते हैं…. उन्हें प्रणाम!

आज के दिन इन सभी उपरोक्त वर्णित व अवर्णित गुरुजनों को, उनकी गुरवतों को ,  हृदय की गहराई से विनम्रतापूर्वक  सादर साष्टांग प्रणाम करता हूँ… कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ….!

यदि यहाँ तक पढ़कर किसी को भी मुझमें गुरवत दिखती है, वह मुझसे मेरे संचित ज्ञान कोष में से मुझसे विस्तृत पाना चाहता है तो में उपलब्ध हूँ… यह कोष वितरण से विस्तार पाने वाला है….  सभी का स्वागत है…. भले आप किसी भी जाति, धर्म, वर्ग, संवर्ग से हों….  सारे जग को, भेदभाव रहित,  समान रूप से उपलब्ध हूँ… इसीलिए मैं जगदगुरु हूँ…और इस रूप में ही स्वयं को आप के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ….!

सारे जगत को, गुरु रूप में, शर्त रहित उपलब्ध,  इसलिये जगदगुरु!

  • “सत्यार्चन”

Fearful GOD!

Fearful GOD !

People don’t beleave in being God near them !
Beacuse they think themselves eligble for being blessed with HIS/Her Blessings!
However if they believe Being GOD’s Presence in their surroundings, They expect they have to do nothing,
if HE / SHE is closure to them ,
HE/ SHE has to show
HIS/HER miracles….
by availing each n every thing whatever might have wished by any of them …..
Thats why….  GOD are fearfull….
being amongst common-men!
The common-men might gonna KIL The GOD….
…. for not fulfilling their endless wishes!
… n
…. I think GOD must have remain FEARFULL of crowed!!!
#SathyArchan

सर दर्द!

नया अस्पताल, नयी जाँचें, नया तरीका, नया खर्च ….  

शायद एकाध महीने भर्ती ही रहना पड़ जाये….

सर दर्द!

मेरा सर दर्द से फटा जा रहा था—

मैंने रुमाल उठाकर अपने सर पर बाँध लिया! थोड़ी देर को आराम मिला मगर दर्द फिर से सताने लगा ! मैंने एक रस्सी उठाई और रुमाल के ऊपर से ही बाँध ली!

वो देख रहे थे दूर से ,

बड़े ध्यान से!

कौन ?

मेरे अपने—

यानी मेरे सबसे बड़े हितैषी!

पत्नी ने चिल्लाते हुए टोका “ये क्या कर रहे हो…?”

मैंने कहा “सर दुख रहा है, तो बाँध लिया ….”

इसी बीच कहा सुनी सुनकर मेरे छोटे बड़े भाई भी आ गये थे और चुपचाप तमशबीन बने खड़े रहे.

पत्नि- “मगर ये रस्सी क्यों बाँधी है ? बहुत खराब लग रहा है देखने में इसे खोल दो”

मैं – “यार रुमाल बाँधने से थोड़ा आराम मिला था तो जोर से रस्सी से बाँध लिया अब ज्यादा आराम है…”

“वो तो ठीक है मगर ये कौनसा तरीका हुआ आराम पाने का …. भाभी सही कह रही है … रस्सी हटा दो… बहुत खराब लग रही है” बडे़ भया बोले.

मुझे मानना पड़ा…. मंने रस्सी हटा दी.

थोड़ी ही देर में दर्द फिर बढ़ने लगा तो मैं अपने हाथ से सर में धीरे धीरे मुक्के मारकर मसाज करने लगा … फिर थोड़ा आराम मिला… पत्नि ने फिर देखा फिर से टोका ….

“अब ये क्या कर रहे हो ? … भैया जी को बोलती हूँ…. उनकी बाइक पर बैठकर डाक्टर के पास जाकर दवाई ले आओ…. पागलपन मत करो !”

उसने भैया को आवाज लगाई.

वो आ गये और मुझे जाना पड़ा ….

अस्पताल पहुँचते-पहुँचते दर्द खत्म सा था…. फिर भी एहतियातन डाक्टर को दिखाया… ई सी जी, ई ई जी, एम आर आई वगैरह कुछ टेस्ट कराये गये …. और आगे कभी दर्द होने पर तुरंत अस्पताल आने की हिदायत लेकर हम घर को वापस आ गये .

हमने इस सबमें, एहतियातन 17000/- रुपये खर्च कर दिये थे !

3-4 साल हो गये इस बात को… दोबारा सर दर्द हुआ ही नहीं ….

हे भगवान …. हो भी नहीं !

वो पिछला वाला डाक्टर तीनेक साल पहले ही सर दर्द से मर चुका है….

अगर अब सर दर्द हुआ तो ….

नया अस्पताल, नयी जाँचें, नया तरीका, नया खर्च ….

शायद एकाध महीने भर्ती ही रहना पड़ जाये….

…. एहतियातन …. घरद्वार ही बेचना पड़ जाये !

बदतर को तत्पर रहें फिर जीभर जियें !

उसके घटित हुए बिना ही, बार-बार उसके घटने की पीड़ा से,

उसके वास्तव में घटने तक तो बचे रह ही सकते हैं!

बदतर को तत्पर रहें फिर जीभर जियें !

बड़ी-बड़ी एड्स, केन्सर, हार्ट प्राब्लम

जैसी बीमारियों के साथ भी

बड़ा सामान्य जिया जा सकता है,

सर्जरी के बाद भी —-

यदि हम बदतर को तत्पर रहें

फिर जीभर  जियें

बस कोई भी बीमारी
मन को बीमार ना कर पाये  —
इतना ही ध्यान रखना होता है,
बीमार को और उसके साथियों को!

बस बदतर को तत्पर रहें

फिर जीभर जियें !

आप को पता है कि स्वस्थ दिखते 10

लोगों में से 4 का दिल असामान्य होता है

जब तक उन्हें पता नहीं होता मस्त जी रहे होते हैं,
पता लगते ही तकलीफ़ 4 गुना बढ़ा लेते हैं!

लेकिन कुछ लोग तनाव नहीं लेते

और पहले की तरह मस्त बने रहते हैं!
उनका हार्ट भी पहले की ही तरह,

जितना कर पा रहा है,

निश्चिंत रह, काम करते रहता है —-

बंद होने तक !
मैं भी इसी तरह का इनसान ही हूँ!
जानता हूँ,

किसी दिन सोते -सोते चला जाऊंगा —-

मगर रोज चैन से सोता हूँ!

फिर भी, रोज,

सुबह हो जाती है,
तो उसका धन्यवाद करता हूँ —-

एक और दिन देने के लिये —

और पिछले दिये दिनों के अवसरों के लिये भी —-
उसकी मर्जी तक ही साँसें चलती हैं!
ना एक भी कम,
ना एक ज्यादा!
ना आप जान ही सकते हो कि कितनी,

लाख चाहकर भी

आप एक भी साँस नहीं बढ़ा सकते

ना कोई एक भी घटा सकता है!

ना आपके हाथ में कुछ है

ना जानकारी में!
फिर तो हर दिन,
हर पल उसके बुलावे को

तत्पर रहने से अधिक ताकत

और किसी तरह नहीं ही मिल सकती!
इसीलिए तत्पर रहता हूँ!
इस विश्वास के साथ कि

125 -150 साल तो उसने,

उसके रास्ते पर चलने,

जरूर दिये होंगे!

वो इतना तो चाहेगा ही—
कम चाहेगा तो भी,

मेरे हित के ही लिये!
वो कोई अहित नहीं करता —-

हम ही होते हुए हित में,

अहित ढूंढ़ परेशान होते रहते हैं!

या होते हित को तुरंत नहीं समझ पाते —-
और कभी-कभी ,

कभी भी नहीं समझ पाते!

जिसे आप सबसे खराब समझते हैं

उसके होने को स्वीकारने

जब आप तत्पर हो जाते हैं

तो  कम से कम

उसके घटित हुए बिना ही,

बार-बार उसके घटने की पीड़ा से,

उसके वास्तव में घटने तक तो

बचे रह ही सकते हैं!

बस मेरे स्वयं के,
सदा आनंदमय रहने के यही सूत्र हैं!

#सत्यार्चन

ईमान खतरे में है —

जहाँ में है रोशन
सियासत नफरतों की,
सुलतान का अब
ईमान खतरे में है!

अमन की फ़िजा में
साँसों का ख्वाहिश मंद,
दुनियाँ का एक-एक
इंसान खतरे में है!!

नया विचार नई परम्परा!

दोस्तो,
क्या आपको पता है कि

“शादी विवाह, गृहप्रवेश, जन्मोत्सव आदि के समय उपहार लेकर जाने की परम्परा के पीछे कौनसा उद्देश्य छुपा है ?”

“उद्देश्य है कि

” हर एक व्यक्ति ऐसे अवसर अपनी सामर्थ्य की सीमा तक जाकर अपनी सारी पूंजी खर्च चुका होता है, ऐसे में उस अपने की,  उसका आत्मसम्मान आहत किये बिना, उल्लासपूर्वक मदद
करना!
“किन्तु आज के समय में तो, हर छोटी बड़ी बीमारी के इलाज में भी, इन छोटे बड़े हर्षोत्सवों जैसा ही, खर्च करना पड़ता है!”
ऐसे में क्या एक नई परम्परा के प्रचलन का विचार नहीं किया जाना चाहिये!

“शादी विवाह में अगर
हम किसी को आर्थिक मदद के लिए लिफाफा देते हैं तो बीमार को देखने जाते समय क्यों नहीँ दे सकते! जबकि बीमारी में मदद की आवश्यकता अधिक होती है!

कृपया चिन्तन अवश्य करें,….

शादी में तो गैर जरूरी दिखावे के खर्च बचाये जा सकते है पर बीमारी में जरूरी दवाइयाँ और इलाज तो जरूरी है !

ऐसे लिफ़ाफ़े लेकर जाने की शुरुआत इस तरह के शब्दों के साथ की जा सकती है-
“यह हमारे कुल की परम्परा है, कृपया स्वीकार कीजिये”

“नया विचार नई ऊर्जा”

प्रसारक

#सत्यार्चन

(सद्भाव के समर्थकों से पुनर्प्रसार की प्रार्थना है, अपेक्षित भी !)

बनायें, निभायें या तोड़ें  परम्परायें !

  • बनायें, निभायें या तोड़ें  परम्परायें !
  • 28 मई 2017
    10:43
  •  • कोई भी परंपरा दुनियाँ बनने के साथ-साथ तो नहीं ही बनी होगी!
  •  • उन्मुक्त, उच्छृंखल और अनवरत स्वच्छंद विचरते से थककर कभी किसी ने कोई कार्य, कोई ऐसा संजीदा आचरण किया होगा, जिसे दूसरों ने अपनाकर खुशी पाई होगी!
  •  • ऐसे ही किसी का कोई आचार-विचार या व्यवहार सर्व जन हिताय लगा होगा, तभी सार्वजनिक अनुकरणीय होकर, परंपरा के रूप में ढला होगा!
  •  • “जो परम्परा आदि काल में अनुकरणीय थी क्या वह आज भी उपयुक्त है?”
  •  • “आज जिस परम्परा के सृजक / वाहक हम बने हैं,  क्या कल भी वही उपयुक्त रहेगी?”
  •  • “बिना किसी परम्परा के, समाज; जंगल बन जायेंगे! किन्तु आदिकाल की परम्पराओं को निभाते रहकर भी तो, जंगली ही प्रमाणित हो रहे हैं हम!”
  •  • इसीलिए; अपनी वर्तमान पारिस्थितिकी के
    अनुरूप,
    अपने लिये ,
    अपनी राह,
    अपनी परम्परा,
    सृजित कर,
    अपनी धरती पर,
    अपना स्वर्ग
    आप
    स्वयं ही बनाइये!!!

    #’सत्यार्चन’
    #SatyArchan
    #SathyArchan
    (#-A Global Name @ Web
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