ज्ञानोद्भव

यह नजरिया ही है जो मानने से रोकता है किन्तु जिज्ञासु के मन में जानने की प्यास/ जिज्ञासा भी यही जगाता है और प्यास सदाशयी बनाती है… आगत के स्वागत को तत्पर…
ज्ञान के पादप का पल्लवन तभी संभव है जब ज्ञान का बीज ज्ञान की भूमि में रोपित, ज्ञान के जल से सिंचित, ज्ञान के उर्वरक से पुष्ट, ज्ञान के प्रकाश से आलोकित, और ज्ञान के कीटनाशक से दोषरहित रह, ज्ञानपूर्ण पोषण पा सके!

-सत्यार्चन

मैं अकेला ही काफी हूँ!! — “Kumar Ranjeet”

इश्क़ में जीत के आने के लिये काफी हूँ मैं अकेला ही ज़माने के लिये काफी हूँ हर हकीकत को मेरी ख्वाब समझने वाले मैं तेरी नींद उड़ाने के लिये काफी हूँ ये अलग बात के अब सुख चुका हूँ फिर भी धूप की प्यास बुझाने के लिये काफी हूँ बस किसी तरह मेरी नींद […]

via मैं अकेला ही काफी हूँ!! — “Kumar Ranjeet”

श्रेष्ठ आराधक

💐🙏🏽💐 सद्गुरु कहते हैं कि श्रीराम का श्रेष्ठ आराधक वह है जो अपने जीवन में राम के आदर्शों को जीने का सर्वोत्तम प्रयास करे …!

श्रीराम सर्वहारा के आराध्य हैं! क्यों?

इसलिए कि वे सर्वदा आदर्श हैं और आदर्श का अनुसरण ही उसकी वास्तविक पूजा-अर्चना, आराधना है… अन्यथा आपके मुंह पर आपके कृतित्व को, स्वार्थसिद्धि तक महान बताने, फिर मखौल उड़ाने वाले के प्रति, जैसी आपकी मानसिकता होगी, वैसी ही ढोंगियों के प्रति उस सर्वोपरि की क्यों ना हो?

इसीलिए, पूजा, प्रार्थना, अनुग्रह, अनुसरण या अनुकरण पूरे मन से, आत्मिक आनंद के लिए हो… मात्र प्रदर्शन के लिए नहीं!

-सत्यार्चन सत्यव्रत सुबुद्ध

कुर्बानी- नेकी के लिए!

अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…!

सभी मजहबों/ धर्मों की किताबों में लिखे वाकये वो नजी़रें हैं जिनको अमल में लाया जाना ही मुनासिब है…

इस्लामिक आस्था से जुड़ी, “कुर्बानी” भी ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है!

इस्लाम में कुर्बानी की शुरुआत का जिक्र, सर्वोपरि “हुजूर” का अपने फालोअर्स में सबसे अधिक वफादारी का दम भरने वालों की मौजूदगी में, उचित को चुनकर उसे कपनी वफादारी साबित करने के इम्तेहान से गुजरने का मौका दिया! जिसके लिए उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने को कहा गया. तब पिता अपने बेटे की कुर्बानी देने को, और बेटे का कुर्बान होने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाने का वाकया लिखा है! हुजूर के दरबार में घटी इस घटना के दृश्य में पिता की आंखों पर पट्टी बांधकर बेटे की तलवार से कुर्बानी दी जाना और कुर्बानी के बाद पट्टी खुलने पर बेटे की जगह गर्दन कटे हुए बकरे का देखा जाना, बताया गया है!

इसमें एक से अधिक सीख समाहित हैं…

1- जब तुम्हारे बुजुर्ग, जो हुजूर की जानिब से तुम्हारे कुदरती खैरख्वाह हैं, के हुक्म की तामील करो… बिना किसी शक-ओ-शुबहा के बस अमल करो!

2- अगर तुम सच्चे हो, ईमान पर हो और तुम्हें तुम्हारी सच्चाई का इम्तेहान सबके बीच देने कहा जाये तो दिखा दो कि तुम सच्चे हो!

3- नेकी की राह कुर्बानी चाहती है… नेकी के लिए कोई भी कुर्बानी छोटी है…!

रमजान आने को हैं फिर “ईद-उल-जुहा” ! तो अब से “ईद-उल-जुहा” पर नेकी के नाम नेकी के लिए नेक कुर्बानी देने का वादा अपने आपसे कीजिए! रक्तदान करके… खुद अपनी कुर्बानी दीजिए…! रक्त बहाने के लिए नहीं सहेजने के लिए हो आपकी कुर्बानी! किसी को ज़िन्दगी देने के लिए हो आपकी कुर्बानी…

जरूरी होने पर जब औरों से आंखें, लीवर, किडनी, ब्लड, बांह, मांस, होंठ आदि लिए जाने में मज़हब आड़े नहीं आता है तो इत्मीनान रखिये, इनके दिये जाने में मज़हब दीवखै कैसे हो सकता है! चाहें तो अपने मौलाना से मशविरा करें और जायज़ पायें तो आगे बढ़ जायें… दीन के काम आकर मुस्लिम समुदाय को इज्जत बख्शने की वजह बन जायें!

जिस-जिस इंसान या मुसलमान का इस मशविरे से इत्तेफाक हो वो इसे आगे बढ़ाकर दुनियां में मुस्लिमों की दीगर दुनियां से बढ़ती दूरी घटाने का रास्ता बनायें! इंसानियत के नाम इंसान होने का सबूत दें! इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर इंसानियत के काम आयें! इस्लाम का रुतबा ऊंचा रखने अपनी कुर्बानी देकर दिखायें!

सबसे अच्छी वो कुर्बानी, जो दे किसी को जिंदगानी!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

क्रेडिट /डेबिट कार्ड!

क्रेडिट/डेबिट कार्ड आज हर किसी की सुविधा ही नहीं आवश्यकता बन गये हैं . इनके 3 प्रकार के उपयोग करता हैं! 1ली तरह के लोग ही इसका सही तरह प्रयोग करते हैं! 2री तरह के लोग इस उपयोगी सुविधा का डर के कारण पूरा लाभ उठा पाने से वंचित रह जाते हैं और

3रे प्रकार के लोग लापरवाही से उपयोग कर अपने नुकसान का कारण बन जाते हैं…

तीनों ही तरह के उपयोग कर्ता ऊपर साझा की गई तस्वीर से परिचित होंगे? अधिकांश कार्ड्स इसी प्रकार एक कागज पर चिपका कर भेजे जाते हैं! कभी सोचा कि इस तरह क्यों भेजे जाते हैं? आप कहेंगे ताकि कार्ड के गिरकर खोने का डर ना रहे… कुछ हद तक सही भी है किन्तु इसके लिए कई रंगों से छपे और हाइलाइटेड पेपर पर चिपकाने की क्या जरुरत थी?

असल में कार्ड- कम्पनियां हमारी आलसी और लापरवाह आदतों से परिचित हैं. हमारी लापरवाही का खामियाजा उनकी साख पर नकारात्मक प्रभाव को घटाने के उद्देश्य से कम्पनियां चाहती हैं कि कार्ड की सुविधा का अधिकतम व सुरक्षित लाभ उठाने आप कम से कम अतिआवश्यक जानकारी अवश्य लें. इसीलिए रंगीन हाइलाइटेड स्याही में अति महत्वपूर्ण सूचना व सावधानियां छापे हुए कागज पर कार्ड को चिपकाकर भेजा जाता है। ताकि कार्ड निकालते समय शायद आपकी दृष्टि पड़े और शायद आप पढ़ कर स्वयं को धोखाधड़ी से बचाना सीखकर कार्ड प्रदाता कंपनियों पर उपकार करें!

विनम्र राजा! -एक लोककथा

विनम्र राजा! -एक लोककथा

प्राचीनकाल में, सोहागपुर राज्य में एक अत्यंत चतुर, बुद्धिमान व यशश्वी राजा का शासन था. राजा का अपनी प्रजा के वास्तविक हालचाल जानने का तरीका अनोखा था. वो अपने दरबार की शुरुआत दरबारियों, मंत्रियों सहित नगर भ्रमण करने से किया करता. रोज चल-दरबार से लौटकर ही राजमहल में दरबार सजता था. राजा नगरभ्रमण पर हाथी, रथ, बग्घी, आदि अलग अलग तरह की सवारियों पर निकलता था आमजनता से भेंटकर उनके हालचाल स्वयं ही पूछता था. एक दिन राजा पैदल ही नगरभ्रमण पर निकला तो मंत्री, दरबारी सबको भी मजबूरन राजा के पीछे पीछे पैदल चलना पड़ा. अपने राजा को अपने समान पैदल चलते देख जो भी स्त्री-पुरुष सामने से आता आदर से अभिवादन, प्रणाम करता. राजा भी उनके अभिवादन का, सर झुकाकर प्रणाम से उत्तर देता जाता… तभी सामने से नगरसेठ और उसकी पत्नी आये, नगरसेठ ने राजा को कमर तक झुककर प्रणाम किया तो राजा नगरसेठ के पैरों में साष्टांग दंडवत मुद्रा लेट गये…. मजबूरन दरबारियों को भी ऐसा ही करना पड़ा. सभी दरबारी राजा के नगर सेठ को साष्टांग दंडवत से आक्रोशित थे, सबने आपस में सलाह कर राजा की इस हरकत के विरोध का निश्चय किया. लौटकर दरबार सजते ही एक वरिष्ठ सभासद ने प्रश्न उठाया “राजन आपका सेठ दम्पत्ति के सामने साष्टांग दंडवत होना किसी भी तरह उचित नहीं आपके इस तरह के आचरण से तो जल्द ही राजसत्ता का मान मिट्टी में मिल जायेगा… “

राजा ने उत्तर दिया “मित्र; मैं कुछ भी सहन कर सकता हूं किन्तु यह नहीं कोई मुझसे अधिक विनम्र हो… और वो व्यापारी दम्पत्ति मेरे अभिवादन में कमर तक झुके हुए थे…

समझिये-समझाइये!

-सत्यार्चन

परिष्कृत प्रारब्ध क्या है?

प्रारब्ध या नियति पर बहस व्यर्थ की बहस है…
आपकी पारिस्थितिकी
(आपका देश, काल और परिस्थिति) आपके नियति निर्धारक नहीं है किन्तु आपकी नियति का छद्म किन्तु दृढ़ घेरा अवश्य बनते हैं…

उत्कृष्टता आकांक्षितों को अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य से इस घेरे को तोड़ बाहर निकलना होता है…. तब अगले बड़े होते जाते घेरे आसानी से टूटते जाते हैं…. प्रारब्ध परिष्कृत हो पक्षकर बनता जाता है….

और व्यक्ति मनवांछित उत्कृष्टता को पा लेता है या निकट तक पहुंच जाता है…

अन्यथा अन्य पशुओं की तरह ही सामान्य व्यक्ति, सामान्यतः माता पिता के समान जन्म, पोषण, प्रणय, संतोनोत्पत्ति और मरण के पहले घेरे में ही सीमित रह खुशी-खुशी जीवन जीकर परलोक गमन कर जाता है!

पहले घेरे में सीमित रह पशुवत जीने वाले या संघर्ष कर अनेक घेरों को तोड़ उत्कृष्टता तक पहुंचने वालों में से कोई भी श्रेष्ठ या निम्न नहीं हो सकता….

प्रश्न पथचयन का है… मनचाहे पथ के पथिक हो निरंतर चलते रहें… अपनी जीवन यात्रा, अपनी इच्छानुसार संपन्न करें… ना पथभ्रमित हों ना पथभ्रष्ट…
हरि ओम्!

मेंहदी तो रंग लाती है…

मेंहदी तो रंग लाती है…

तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है…
.
सजनी के हाथों सज
साजन की
मुस्कान बन जाती है
बड़ी करामाती है
तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है!
.
मेंहदी की भी ख़्वाहिश
यही रही होगी
मिट जाऊं
पिस जाऊं
हर एक सजनी को मगर
ऐसे सजाऊं
ऐसे रच जाऊं
कि
उम्र गुजर जाये
उतारे से भी रंग
कभी उतर ना पाये!
साजन, सजनी की
और सजनी
साजन के
दिल की
धड़कन बन जाये!
तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है…!
.
जब मेंहदी हाथों में
और
दिल में साजन को
सजनी सजाती है
मेंहदी
गहरी…
बहुत गहरी
ऐसे रच जाती है…
उम्र गुजर जाती है
उतर नहीं पाती…
गहराती जाती है.
बड़ी करामाती है
तोड़ी जाती है
पीसी जाती है
फिर भी
मेंहदी तो रंग लाती है!
-सत्यार्चन

रस्सी से गुंथे इंसानी रिश्ते…!

रस्सी से गुंथे इंसानी रिश्ते…!

दो बराबर, मिलती-जुलती सी
सूत की रस्सियां
एक दूसरे से मिल, हो सबल
सार्थक जीने, एक दूसरे में गुंथने
हुई होंगी आकर्षित, तत्पर, चेष्टारत
तब परिचय से परिणय के बीच
अच्छी तरह आंटी गई
दोनों रस्सियों की
खुली होगी ऐंठन
और मिलन तक आते
रस्सियों ने अपने आपको
एक दूसरे से बढ़ चढ़कर
ढीला किया होगा
थोड़ा बहुत उधेड़ा होगा
मिटाया होगा
घटाया होगा
जरा जरा अस्तित्व अपना
दोनों कृषकाय सी
सूत-सूत होती रस्सियों ने
किया होगा एक-दूजे को
एक दूजे के हवाले
एक दूसरे ने देखी होगी
एक दूसरे में ताकत
खुदको उधेड़कर दोनों ने
एक दूसरे को कसा होगा
प्रेममय उमेंठा होगा
एक दूसरे ने
पाया होगा अस्तित्व अपना
एक दूसरे में
तब बना होगा आधार
स्वस्थ परिवार का
दो बिखरती हुई निर्बल
मगर
सतत संग खा-खाकर बल
सूत के रस्से सा हो सबल
बना होगा वह आधार
जिसे कहते हैं परिवार
जिसकी सुतली बन
हमको/ आपको मिला यह संसार…
हम-तुम कपास से कभी
अपनी मांओं के गर्भ में पहूंचे होंगे
मां ने रक्तसिंचित कर
कपास को बना तृण
दे गर्भ में पोषण
सूत सा सुतली सा
जन्मा होगा हमें
मुझे और तुम्हें!
फिर से उनकी ही तरह
हो आकर्षित
हमने
मैंने और तुमने
साथ जीने की
साथ मरने की
उठाई कसम
मगर
ना छूटी ऐंठन,
ना शिथिल तन
ना समर्पित मन
कहने को साथ साथ
चलते रहे
मैं और तुम
ना हो सके कभी हम
बहुत उमेंठा है एक दूजे को
हमने
मैंने
और तुमने
एक दूसरे के नहीं
अपने अपने
आत्मप्रेम में
बंधने नहीं बेधने!
तोड़ने, मिटाने, गिराने
एक दूसरे को
अपने कदमों में झुकाने!
सुनते हैं आज की
यही रीत है
कदमों में बिछ जाये
वही प्रीत है!
जो हो सो हो
हमें तो प्यारी जीत है!
ना बिछेंगे ना बिछायेंगे
ना झुकेंगे ना झुकायेंगे
रोकर नहीं हंसकर
साथ निभायें जायेंगे!
हम प्रेमियों के वंशज हैं
हमें “तुमसे प्यार है!”
छोड़ेंगे ना हम छूटेंगे
हमारे यही संस्कार हैं!
-सत्यार्चन