सत दर्शन!

सत दर्शन!

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सत्य की दर्शनाभिलाषा जिनके मन में हो उनका सत्य से साक्षात्कार सुनिश्चित है!
जिन्हें सत्य की सात्विकता के विचार मात्र से बदहजमी हो जाती है वे आजीवन आडम्बर जीते हैं … आडम्बर बाॅंटते हैं तो कुछ और कैसे पा लेंगे? यानी उनको प्राप्ति भी तो आडम्बर ही होगी ना… इनकी खुशी भी वैसी ही होती है… अवास्तविक ! केवल बाहरी दुनियां को दिखाने के लिए….! अंदर सब खाली…!
जबकि सतपथ के सत्पथिक के जीवन में कुछ भी अवास्तविक नहीं होता…!
चयन आपका!
आखिर…
जीवन है आपका!!
-सुबुद्ध

शुभविजयदिवस!

शुभविजयदिवस!

राम,रावण, राम राज्य व सोने की लंका सभी आदर्श/निकृष्ट प्रतीक!

ठूंठा धोबी के कटु तथा निंदनीय शब्दों पर भी उसे कोई सजा नहीं दी  श्रीराम ने! सपत्नीक स्वयं भुगती… भूल की?

रामराज्य में

‘श्रीराम की भूल सुधारने’ (?) हम सभी रावण नहीं बन बैठे हैं?

अनचाहा बोलने वाले की बोलती बंद करने उतारू होकर!

-सुबुद्ध

कृष्ण या सुदामा?

कृष्ण या सुदामा?

जाने कब से आंखें नीर हीन हो चुकी थीं…! जाने क्या क्या बीत गया … जाने क्या क्या छूट गया… मगर आंखों में आंसू ना आये थे वर्षों बीत चुके थे पत्थर हुए… !
अचानक श्री कृष्ण-सुदामा मिलन का  वीडियो क्लिक किया… और अपने आपको वीडियो में दोनों ओर देख… निरंतर भावविह्वलता में अश्रुधार चल निकली… समाप्त होने पर भी रुकने तैयार नहीं … बाॅंध जो टूट गया था आज…! श्रीकृष्ण और सुदामा; मुझे दोनों में, मैं ही दिखते रहे…
लोकोपहास से तो अब कभी असहजता नहीं होती …. आदत जो हो गई है…. मुझे हर बार पता होता है कि जरा सी देर में द्वारकाधीश दौड़े चले आने वाले हैं… और लोकदृष्टि पलक झपकते बदल जाने वाली है… कोई आज की बात तो है नहीं…  कब से देखते आ रहा हूं…. एक-दो बार नहीं बार बार… हजार बार….  निराशा में कदम वापस मोड़ने से पहले श्रीकृष्ण दौड़े चले आये हैं… 
महल में बैठा हुआ अन्दर वाला ‘मैं कृष्ण’ भी जानता हूं… कि अपने वैभव के मान के उबाऊ बोझ से मुक्त कराने किसी भी दिन….  किसी भी पल द्वारपाल आकर…  शायद बस अभी अभी आकर मुझे मेरे बचपन के उच्छृंखल, बेतकल्लुफ़ आल्हादमय पलों   में ले जाने का कारण बनने….   सुदामा के आगमन की सूचना देने ही वाला है…  मुझे उबाऊ जीवनचर्या से सस उबारने ही वाला है… सुदामा को मेरा उल्लास लौटाने का माध्यम बनना ही था ….  आना ही था…!
‌मित्रों में ना मांगना पड़ता है…. ना बोलना …. बस उसकी जरूरत पता चल जाती है…! फिर कौन कृष्ण कौन। सुदामा पता ही नहीं चलता…. बस मित्र को मित्र की आवश्यकता का भान हो जाता है और मित्र दसियों कोस से चलकर…. दाता होकर भी याचक बनकर वो  देने आ ही जाता है…  जो मुझे चाहिए…. मैं पा लेता हूँ ….  जो मेरा अभीष्ट है…. साधिकार पाता हूॅं…  ना तो मैं उस प्राप्ति का मूल्यांकन करना चाहता हूं ….. ना कर सकता हूं….  ना चुकाने की सोचता हूँ… ना ही चुकाने में सक्षम हूँ… ना ही चुका सकता हूं….  किन्तु उसकी आवश्यकता योग्य जो हो सके करने का प्रयास अवश्य  कर सकता हूँ… करता हूँ…
‌वास्तव में कृतज्ञ तो मैं हो रहा होता हूँ …. और कृतज्ञता वो ज्ञापित कर रहा होता है ….
यही तो लीला है…. मित्रवत्सल परममित्र लीलाधर की … जो किसी किसी के ही पल्ले पड़ पाती है….!
नटखट-नटनागर-मुरलीधर-किशन कन्हैया की अमिट स्मृति अनायास सजीव अवतरित हो उठी है….
हरि ॐ!
-सुबुद्ध !

ऐ किसान हो तेरा सम्मान!

तेरे मोल का नहीं…. अब तक कोई अनुमान—

ऐ किसान! 
हो तेरा सम्मान!

बाकी के सब बिक गये

तेरे मोल का नहीं

अब तक कोई अनुमान —


एक तू ही शेष सन्मार्ग पर
तू ही शेष महान !


ना रिश्वतखोरी से तेरा नाता
ना कोई छल ही तुझे भाता


तेरी मेहनत ही तेरा अभियान!
बाकी के सब बिक गये….


तेरे मोल का नहीं

अब तक कोई अनुमान—


तू ही है वह सतपथिक
श्रम जिसका अभिमान!
हो तेरा सम्मान!
तू ही एक महान!


तू संघर्षरत प्रति दिन
हर दिन तेरा प्रयास

हर दिन जय पराजय !
तेरे धीरज को प्रणाम!


तेरे साहस को मेरा नमन !
हों सच्चे तेरे अनुमान!
रहें सफल तेरे अभियान!
हो फलीभूत तू

तब होंगे हम निहाल


तू तो होने ना देगा

भूख से बेहाल!


तेरी उपज के मोल को

सदा मिले वाज़िब मान!


ऐ किसान!

तुझे भी मिले

तेरा वांछित सम्मान!


सत्य अर्चन

चेहरे!

चेहरे!

चेहरा,
चेहरे पर चढ़ाने
चुन लीजिए
चाहे जैसा….
एक ना एक दिन
दिख ही जाना है
वैसा…
है जैसा !

चेहरे!

जयति जय जय मां

जयति जय जय मां!

आज शारदीय नवरात्रों के शुभारंभ पर सबको शुभकामनाएं!
मैं भी व्रती हूँ! सन्मार्गी हूँ! सदैव रहना चाहता हूँ!
*सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:*
*सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दु:खभाग्भवेत!*
*अर्थात सभी सुखी हों सभी रोगमुक्त हों सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें! किसी को भी दु:ख का भागी ना बनना पड़े!*
पूरी तरह सच्चे मन से… व निरपेक्ष रहते हुए उपरोक्त श्लोक के मूलभाव के उद्देश्य को मन में धारण रखते हुए…


*अंतर्चेतना में उद्घाटित कुछ नव संदेश सबसे साझा करना चाहता हूँ!*
हम हमारी मानवीय संस्कृति के संरक्षक बनें! मानवता के अनुसरणकर्ता हैं तो समझ लें..   कि “वर्तमान सत के स्थापित होने और असत के विस्थापन का चल रहा है…! चाहे घर हो, समाज हो, देश हो या दुनियां…. सत के मार्ग में बाधक होना यानी सर्वोपरि का कोपभाजन होना है! ‘उसे’ बस प्रकृति को इशारा ही तो करना है… और बड़े से बड़ा सुदृढ़तम स्तंभ भी ढह जाना है..! सत का मार्ग …. सदाचार का मार्ग अपनायें… सन्मार्गी बनें, सन्मार्गियों के समर्धक बनें… सतपथ के अनुगामी बनें, स्थायी सुखी हो जायें…! कम से कम सतपथ के पथिकों का विरोध तो ना ही करें…! सतपथ के पथ पर चलने वालों पर ईश्वर का आशीष सदा से रहा है और रहेगा…! फिर चाहे वह सत्पथिक हाथी सा विशालकाय हो या चींटी सा सूक्ष्म!

@जय माता दी!#

-सुबुद्ध सत्यार्चन!
(आश्विन नवरात्र- प्रतिपदा!)

विचरण अनंत !

बैठे हम भोपाल में, करते कांव कांव!

जी चाहे उड़ जायेंगे… रच लेंगे एक और गांव…!


मन की आंखें, मन के पांव…
चल उठ…बैठे अगले ठाॅंव!


कवि/ कलमकार विषम अनंत
करे भाव विचरण दिग दिगन्त…!


-सुबुद्ध सत्यार्चन

कितने भले हैं लोग!

कितने भले हैं लोग!

लोग, समाज, देश और दुनियां
देख रही है ••• बदल रहा है ••• मिट रहा है ••• उठ रहा है ••• गिर रहा है•••
जैसी बातें तो बहुत होते रहती हैं•••
मगर ये लोग, समाज, देश और दुनियां हैं क्या? कहाँ पाये जाते हैं? इतने खराब क्यों हैं?
है जवाब?
मुझे लगता है कि है!
ये सभी कुछ मैं हूँ! /आप हैं! हम सब हैं! सभी अच्छे हैं! सभी सच्चे हैं••• मगर ना खुद की पूरी तरफ ईमानदारी से देख पाते हैं ना खुद से बाहर अपनों में, ना दूसरों में •••!
*अगर*
मैं कहूँ कि मैं ईमानदारी से खुद को देखता हूँ तो मुझे एक संत समान भला मानुष दिखता है
*तो*
इस वाक्य को पढ़ते हुए ही अनेकों को ऐसी आग लगेगी कि वे भूल जायेंगे कि मैंने इसकी शुरुआत अगर से की है•••• वे आगे इस वाक्य को तक नहीं पढ़ पायेंगे••• आगे पढ़ें जाने की तो छोड़ ही दीजिए !
ऐसा क्यों?
क्योंकि हम सबके संस्कार 80-90% निशेधात्मक शिक्षण के हैं! स्वयं को बड़ा मानना निषिद्ध! कहना अपराध!
किन्तु अपने ईमानदार आंकलन में बुरा ही क्या है?

कैसे करें?

बस स्वयं को स्वयं की तरह मत आंकिये एक परिचित की तरह आंकिये!


इसी तरह अन्य को अन्य के स्थान पर स्वयं को उसके देश, काल, परिस्थितियों में रखकर स्वयं की तरह देखिये!


फिर एकबार फिर से देखकर बताइए कि कैसा है समाज?


शायद मुझसे सहमत हो पायें आप कि लोग, समाज, देश और दुनियां में 95% से अधिक भले और नेक लोग हैं •••• दुपियां बहुत सुंदर है, अच्छी है, भली है!
बुरे लोगों का, बुराई का प्रतिशत तो 1% भी नहीं है••• अच्छे और बहुत अच्छे लगभग 7% किन्तु निष्क्रियों का प्रतिशत सर्वाधिक 98-99% होकर सारा संतुलन बिगाड़ रहा है!
बस हमारा नजरिया बेइमान है•••! इसे  वर्षों पहले देखी बुराई तो साफ-साफ ताजा दिखती रहती है••• याद रहती है••• अच्छाई देखने, सुनने और समझने लायक क्षमता ही गिने चुने लोगों में विकसित हो पाती है और इससे भी बढ़कर समझ लें, तो सराहने की, सराह लिया तो स्वीकारने की, स्वीकारा तो अपनाने की क्षमता तो बहुत ही बिरलों में पाई जाती है!
अगर आ जाये तो????

हसरत तेरी…

किस्मत मेरी…

हसरत तेरी!

करके छेद किया गया कश्ती में हॅंसकर सवार…
चल दिया मुझे देखना था, देखते मेरा डूबना…!
-सत्यार्चन सुबुद्ध

‘उन्मुक्तता’

‘उन्मुक्तता’ (एक लघुकथा!)

एक बार फिर वही होटल का कमरा, वही मादक संगीत… वही शराब… वही  कालगर्ल रेखा… विवेक की बांहों में थी…
रेखा की गर्दन और उसकी लंबी घुंघराली लटों के बीच से हाथ निकाल विवेक ने पैमाना खाली किया तो झट से वो इठलाती हुई उसकी बांहों से फिसलकर निकली… बार टेबल से खाली पैमाना भरकर फिर से विवेक की गोद में ऐसे लेट गई  जैसे बाथरूम में पानी भरे टब में जा समाई हो…

कम गाढ़ा हो तो अंजुरी असमर्थ…! रिसता ही है…!

विवेक उसे यहां वहां छूते हुए उससे छेड़छाड़ भरी बातें कर रहा था… विवेक लम्बे समय से रेखा का नियमित ग्राहक था… वो रेखा की खूबसूरती, उसके मैनर्स, एटीकेट्स से काफी प्रभावित था… वो उसे कालगर्ल से अधिक करीबी दोस्त की तरह मेहसूस करने लगा था… सुरा के शुरूर में तो शायद मनचाही हूर… इसी बीच विवेक ने मुस्कुराकर उसका दुपट्टा हाथ में लपेटते हुए शिकायती लहजे में पूछा

“तूने ये दुपट्टा ओढ़ना नहीं छोड़ा ना… मैंने कहा था ना कि… मुझे तू बिना दुपट्टे के ज्यादा अच्छी लगती है…. मैंने लाल सेंडिल को भी मना किया था यार… तू ये मत पहना कर … … ‌ … अच्छा ये बता … तुझे पता है ना… तुझे याद है इतने सालों में मैंने तुझे मेरे पास आते हुए जो जो ना करने को कहा हो… और तूने उसमें से कुछ भी मानकर ना किया हो? इतने सालों से मैं…. तेरे सिवा किसी को नहीं बुलाता तुझे ही याद करते आ रहा हूं…  और तू है कि… हां तो हर बार कर देती है… पर मेरे लिए… मेरा जरा सा कहा करके नहीं दिखा सकती…क्यों ? …? ….?”
“यार तुम शायर हो …  समझदार लगते हो…. मगर इतनी सी बात भी नहीं समझ पा रहे हो…. ‘शायर साहब’ कि अगर किसी का कहा ही करना होता…. किसी के कहे में ही चलना होता… मैं कर पाती…. तो क्या मैं कालगर्ल होती?”

एक कालगर्ल/ मैनर्ड वैश्या से ऐसी फिलासफी सुनते ही विवेक का नशा काफूर हो गया….!
उसने रेखा को चलता किया… और डायरी उठा लिखने लगा…
‘नारी में उन्मुक्तता की उत्कंठा’ कितनी तीव्र हो सकती है और उस उन्मुक्तता के  परिणामों के दृश्यों से, परिचित कराने वाली उस कालगर्ल से ‘ज्ञानप्राप्ति के बाद’  विवेक फिर उससे कभी नहीं मिला….!
-सुबुद्ध