ज्ञान क्या और ज्ञानी कौन?

ज्ञानोदय, ज्ञानमार्ग के अक्षरज्ञान जैसा है! तदुपरांत ज्ञानयात्रा प्रारम्भ होती है, अपने-अपने प्रारब्धानुसार ज्ञानमार्गी ज्ञानपथ की सुरम्य यात्रा में अपने लक्ष्य की और बढ़ता चलता है….

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ज्ञान क्या और ज्ञानी कौन?

यदि सारा ज्ञान पुस्तकों में ही होता तो शोध क्या हैं? नित नये नए होते अविष्कार क्या हैं? प्रतिपल लिखा जाता नव साहित्य सृजन क्या है? कल की स्थापित मान्यताओं का स्थान लेती नवधारणायें क्या हैं?
इसीलिये; अक्षर ज्ञान; केवल ग्रंथों के पठन- पाठन, मनन योग्य बनाने वाला ही है!
ग्रंथों का पाठ विचार योग्यता प्रदाता मात्र है!
विचार योग्य होकर निरंतर शोध से ही ज्ञानोदय संभव है!
अक्षर ज्ञान की पुनरावृत्ति अनावश्यक है किंतु ज्ञानोदय तक पहुँचने के लिए, शेष सभी चरण, निरंतर पुनरावृत्ति की आवश्यकता दर्शाते हैं!
ज्ञानोदय की स्थिति में पहुँचकर वर्तमान एवं पूर्व मनीषियों के कथ्य की वास्तविक व्याख्या स्पष्ट दिखने लगती है!
ज्ञानोदय की स्थिति ही ज्ञान के प्रादुर्भाव की
(ज्ञानमार्ग की) प्राथमिकी है! ज्ञानोदय, ज्ञानमार्ग के अक्षरज्ञान जैसा है! तदुपरांत ज्ञानयात्रा प्रारम्भ होती है, अपने-अपने प्रारब्धानुसार ज्ञानमार्गी ज्ञानपथ की सुरम्य यात्रा में अपने लक्ष्य की और बढ़ता चलता है! कोई कुछ कदम चलकर वापस लौट लेता है कोई मीलों चलता चला जाता है! कोई-कोई अनंत यात्रामय आजीवन ही बना रहता है!

प्रत्येक ज्ञानोपाधि उपरांत अन्य उपाधि-ग्रहण की चेष्टा करता हुआ ऐसा मनीषी ही ब्रम्हानंदमय जीवन जीता है!

हरी ॐ!
– सुबुद्ध सत्यार्चन

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