तुम सफल… समृद्ध तुम!

तुम सफल… समृद्ध तुम!

धनवान-धनवती, रूपवान-रूपमती
और ज्ञानवान-ज्ञानवती एक ही कालेज में पढ़े थे!
कालेज के दिनों से ही रूपमती के जन्म-दिन पर सब इकट्ठे होते ही होते !
रूपमती का यह 55वां जन्म-दिन था! सभी शाम की चाय के साथ हँसी ठिठोली करते-करते अपनी -अपनी सफलताओं को बड़ा बताने लग गये !
धनवान- मेरे दोनों बेटों के पास 2-2 आलीशान मकान हैं —
धनवती- और तीन-तीन लक्जरी गाड़ियाँ वो भी हर साल बदल लेते हैं —
रूपमती – हमारी तो दोनों ही बेटियाँ एक के बाद एक ब्यूटी-क्वीन बनीं हैं — तुम्हारे बेटे जैसे दो-चार लड़के रोज दोनों को प्रपोज करते रहते हैं—
अभी केरियर बनाने वो ‘प्रोड्यूसर्स” से मीटिंग्स में बिजी हैं! बाद में किसी भी प्रिंस से शादी कर सेटल हो जायेंगी — तब तक हमारी अपनी आलीशान कोठी भी बन जायेंगी!
रूपवान अपना कप लेकर बालकनी के कौने पर जा खड़ा हुआ!

थोड़े से अंतराल के बाद

ज्ञानवान – धन, रूप सच में तुम लोग समृद्ध भी हो और सफल भी, मगर हम लोग बस सुखी हैं… दाल रोटी चल रही है… सर पर छत है, यात्रा को गाड़ी के साथ-साथ खुशियाँ और भी हैं …. बेटी शहर में ही ससुराल जाकर राजी-खुशी है तो नई बेटी, बेटे की बहू बन आ गई …. बेटी का बेटा और बेटे की बेटी खेलने आ जाते हैं तो दीवाली हो जाती है, ईद, क्रिसमस और होली भी!