सुख चाहिए?  ये लीजिए! -1

ये दुनियाँ, अपना घर… इसे सजायें… चलो …अच्छे को अच्छा कह आयें….

सुख चाहिए? ये लीजिए! -1

हम हमेशा

बुरे की बुराई की आलोचना तो करते हैं•••

किन्तु

अच्छाई को प्रोत्साहित कर मान्यता देने में पीछे रह जाते हैं!

हर एक के जीवन में,
हर दिन,

कुछ ना कुछ अच्छा अवश्य घटित होता है

किन्तु अधिकांश को
इसका भान तक नहीं हो पाता•••

पिछले 1 घंटे, 1 दिन, 1 सप्ताह के घटनाक्रम को फिर से देखिए ••••

निश्चय ही कुछ ना कुछ अच्छा /सुखकर अवश्य घटा होगा!

जिसे हमने देखकर भी अनदेखा कर दिया था /महत्वहीन मान लिया था!

बस इस उपेक्षित छोटे/बड़े अच्छे को जानने-पहचानने का प्रयास करना है••• पहचानना है, जानना है, मानना है, सराहना है •••• जिसने इस अनदेखे को महत्व दे मान देना सीख लिया, उसके जीवन में, कुछ ही सप्ताहों में, आशीर्वादों की बरसात होना शुरू हो जाती है!

फिर चहुँओर केवल शुभ ही घटित होता दिखाई देने लगता है!

अशुभ अनदेखा हो जाता है!

जैसे आज शुभ नहीं दिखाई देता••• ठीक वैसे ही तब अशुभ ढूँढने से ही मिल पाता है!

यह मेरा स्वयं का भी अनुभव है!

आपभी कर सकते हैं!

यदि सुखी होना है तो शुरुआत आज ही करना होगी!

कल कभी आ पाया नहीं;
ना कल कभी आ पायेगा!

ये दुनियाँ, अपना घर… इसे सजायें… चलो …अच्छे को अच्छा कह आयें!!!

#SathyaArchan

रामनीति – राजनीति ? राम जाने!

पति राम का आलोचक मैं भी हूँ ….
क्योंकि पति-पत्नी संबंधों को मैं
आज के परिप्रेक्ष्य में ही देख पा रहा हूँ ….
तत्कालीन का तो केवल अनुमान ही कर सकता हूँ ना ….!!!

आज की राजनीति बहुत जटिल है जी … समझ ही नहींं आती
जैसे आदर्शतम रामराज्य में राजा राम भी नहीं समझ पाये थे
या शायद समझा नहीं पाये थे ….
किसी अकिंचन के सीता मां पर संदेह जताने से
उस राज्य के राजा द्वारा अपनी रानी को त्यागने की घटना  को
उच्चकोटि का आदर्श राजनैतिक आचरण  माना जाता रहा है …
इस अकिंचन सत्यार्चन को तो यह किसी भी राजघराने के रनिवास की मर्यादा का हनन् दिखता है…
मेरी बुद्धि भी उस अकिंचन जितनी छोटी है ना ….
जिसपर आरोप है कि आरोप उसने लगाया था ….
किन्तु क्या श्रीराम के महान रामराज्य में
किसी अकिंचन में इतना साहस था कि
वह महानतम राजा की रानी पर ऐसा घिनौना आरोप लगा सके….
कहीं ऐसा तो नहीं कि
सभासदों में से ही किसी ने किसी अज्ञात काल्पनिक अकिंचन का उल्लेख कर
अपनी बुद्धिजीविता-वश उपजे कुटिल प्रश्न को
उसके बहाने उठाया हो ….
जबकि प्रश्न स्वयं सभासदों का स्वयं का  ही रहा हो?
या
पति राम ने प्रश्न उठाने राजा राम का आवरण ओढ़ा हो  ….
या
व्यक्ति राम अपनी पत्नी की सुरक्षा में असमर्थ रहने की खीझ
अपनी उसी पत्नी को प्रताड़ित कर निकाल रहा हो …..
राम जाने ….!
मगर
हमारे राम जी ने जिस किसी भी कारण से जो भी किया
वह तत्कालीन परिस्थितियों में, सर्वोत्तम ही रहा होगा ….
क्योंकि श्रीराम का सम्पूर्ण आचरण इस योग्य है
कि उनके निर्णय पर संदेह मूर्खता ही होगी …
आलोचना अलग बात है …
पति राम का आलोचक मैं भी हूँ ….
क्योंकि पति-पत्नी संबंधों को मैं
आज के परिप्रेक्ष्य में ही देख पा रहा हूँ ….
तत्कालीन का तो केवल अनुमान ही कर सकता हूँ ना ….!!!
#सत्यार्चन / SatyArchan / SathyaArchan
(वेव पर वैश्विक नाम)