टीज़र-टीचर-शिक्षक!

* मेरे माता-पिता और शासकीय प्राथमिक शाला जमुनियां, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में पदस्थ ‘प्राइमरी टीचर्स’ परम-आदरणीय माननीय श्री रामेश्वर सोनी जी, और माननीय श्री राम नारायण शर्मा जी जैसे ‘साधारण से लोगों ने’ बड़ी मेहनत और मुश्किल से, मुझे डांट-मार-कूट कर सिखाया था…! तब कहीं आज मैं सुबुद्ध कहलाया!*

मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से नहीं हूं
जिन्हें समझदारी के खिताब मिलते रहते हों..


मैं तो निपट अज्ञानी पैदा हुआ था…
मुझे तो खुद मां ने सिखाया कि वो मेरी मां हैं और ये मेरे पिता हैं… नहीं तो मैं तो पहचान भी नहीं पाया था…. मुझे पढ़ना-लिखना, दौड़ना-कूदना तो छोड़िए बोलना और चलना तक नहीं आता था…! मां-पिता, भाई-बहिनों ने बड़ी मुश्किल से सिखाया….!

*पढ़ना-लिखना, जोड़ना-घटाना मेरे माता-पिता और शासकीय प्राथमिक शाला जमुनियां, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में पदस्थ ‘प्राइमरी टीचर्स’ परम-आदरणीय माननीय श्री रामेश्वर सोनी जी, और माननीय श्री राम नारायण शर्मा जी जैसे ‘साधारण से लोगों ने’ बड़ी मेहनत और मुश्किल से, मुझे डांट-मार-कूट कर सिखाया था…! तब कहीं आज मैं सुबुद्ध कहलाया!*


इतना बड़ा गधा था मैं…!
फिर जैसे जैसे बड़ा होता गया कुटता-पिटता, हंसता-खेलता सीखते गया! कालेज से निकलते-निकलते सारी पढ़ाई लिखाई ही बेकार लगने लगी… इसी बीच नौकरी मिल गई… अफसर भी हो गये…. मगर सबसे उपयोगी और जरूरी व्यवहारिक ज्ञान में स्नातक हो पाना तो बहुत ही अधिक कठिन था… यह व्यवहार विज्ञान इतना कठिन था कि मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान, व्यवहार प्रबंधन, प्रभावोत्पादकता पर दुनियां भर के जाने-माने लेखकों की कई कई किताबें पढ़ डालने पर भी माता-पिता और प्राइमरी टीचर्स के सिखाये उचित-अनुचित को जानने की जिज्ञासा, पहचान करने, स्वीकारने और अपनाने की मिली शिक्षा के आगे सब छोटा लगा…! उचित व्यवहार सीखने  की चाह है तो सीखना जारी है अभी भी…!  जिससे भी जब भी जहां भी मिलता हूं, बतियाता हूं उसमें अच्छा क्या-क्या  है…  खोजता हूं… और वो जो मुझमें नहीं उसमें से उठा लेता हूं … मांग लेता हूं … कभी कभी चुरा भी लेता…  दूसराें में बुराई खोजने में समय नष्ट नहीं करता…  वो तो मुझमें ही ढेर हैं..!
बस इसी तरह धीरे-धीरे सीखते जा रहा हूं …. क्योंकि मैंने बताया ना कि मैं निरा अज्ञानी जन्मा था .. अब प्रत्येक सुबह जागकर नये जन्म सा अनुभव होता है… जिसमें सबकुछ पिछले की अपेक्षा और बेहतर करने, जानने-सीखने,  की जरूरत मेहसूस होती है…
बताया ना कि मैं उन भाग्यवानों में से नहीं हूं जिन्हें सबकुछ आता है.. वो जो समझदार ही जन्मते हैं..  कुछ तो इतने बड़े ज्ञानी भी अवतरित होते हैं इस धरती पर कि वे जिस विषय में जितना जानते हैं…. उस विषय में सारी दुनियां में, उनसे अधिक जानने समझने वाला ना तो कभी हुआ है, ना आज है और ना ही आगे कभी हो पायेगा!


इन महाज्ञानियों के ऐसे अद्भुत ज्ञान के बड़े चर्चे होते हैं.. और ऐसे चर्चे करने वाले भी वे खुद ही होते हैं … !  ऐसे  ज्ञानवान का गुणगान भला अज्ञानी आमजन कर भी कैसे सकता है…!
हां तो मैं बता रहा था कि मैं सीखा हूं आप सब से, सीख रहा हूं आपसे और सदा सीखता रहूंगा क्योंकि मुझे मेरे मूर्धन्य गुरुजनों से सीखने की सीख शुरु में ही मिल गई थी…!  आज उन योग्यतम शिक्षकों को, आप सबको सादर नमन जिनसे मुझे कुछ ना सीखने मिला है… और मिल रहा है!
-सत्यार्चन सुबुद्ध