जीवन ही कर्मफल है तो अब सत्कर्म क्यों?

“सबकुछ तो नहीं किन्तु बहुत कुछ पूर्वरचित है और पहले तथा अभी तक किये जा रहे कर्मों का ही फल है!”

Advertisements

जीवन ही कर्मफल है तो अब सत्कर्म क्यों?

क्या सबकुछ पूर्वरचित है?
क्या संपूर्ण घटित कर्मों का फल है!

हाँ सबकुछ पूर्वनिर्धारित है और सबकुछ पूर्वकर्मों का फल भी है….

किंतु ये पूर्वकर्म अभी अभी बीते हुए पल में किये हुए भी हो सकते हैं और सदियों पूर्व के भी….

तब साधारण भाषा में सामान्य तरीके से समझने योग्य यह भी कहा जा सकता है कि –

“सबकुछ तो नहीं किन्तु बहुत कुछ पूर्वरचित है और पहले तथा अभी तक किये जा रहे कर्मों का ही फल है!”

सद्कर्म सुफल प्रदाता तो होते ही हैं पूर्व दुष्कर्मों के दंडों को भी हल्का करते जाते हैं! इसीलिये सद्गृरु के सांनिध्य में सत्कर्मरत होने का प्रयास कीजिये!

सद्गृरु से गुरुत्व पाने सबमें से सद्गृरु को पहचानने की सामर्थ्य बनानी होती है! जिसकी प्राथमिक आवश्यकतायें हैं सहृदयता, निष्पक्षता और सज्जनता के गुण धारण करना!

सद्गुरु का सांनिध्य केवल सद्जन को ही मिलना सुनिश्चित है!

रामायण में कहा है-

“तुलसी या संसार में सबसे मिलिए धाय।
ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाय।।”

(किस समय किसकी आत्मा में देवत्व जाग जाये….. और कब किसकी वाणी में सरस्वती विराज जाएँ… कौन जाने!)

और यह भी कि-

“एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध,
तुलसी सांगत साधु की कटें कोटि अपराध।।”
(सत्संग फलदायी है!)

“साधु कौन?”

“साधु वही हो सकता है जो, अपने पराये में भेद किये बिना, सदैव शुभ के पक्ष में और अशुभ के विरोध में स्थित रहे!”

“सद्गृरु कौन?”

“वो ही सद्गृरु है जो निज हित-अहित का विचार किये बिना सर्वजनहिताय चिंतन, मनन, मार्गदर्शन और कर्म करे!”

-सुबुद्ध सत्यार्चन

Advertisements