लागा दाग…

प्रतिपल विस्तार पाते विगत को   क्षणिक वर्तमान पर अप्रभावी बना कर ही सुंदर, सुखद, सुमंगल एवं अनंत भविष्य का निर्माण संभव है!

लागा दाग!

दाग लगने के बाद?

जीवन है जीवन में चलते-फिरते, उठते-बैठते …. जीवन के विभिन्न उपक्रम करते हुए… चोट लगते रहती है… शरीर पर, कार पर घर की दीवार पर , मान-सम्मान पर…

कार पर हो… दीवार पर हो या शरीर पर या मान-सम्मान पर ही हो… चोट/ डेंट/ दाग ना लगता तो बहुत अच्छा था… मगर लग गया… लगने के बाद….


लगने के बाद???


केवल भविष्य में ना लगने देने के प्रयास का निर्णय लेने के अतिरिक्त सब व्यर्थ!
जो होना था हो चुका !


अब?


प्रतिपल विस्तार पाते विगत को   क्षणिक वर्तमान पर अप्रभावी बना कर ही सुंदर, सुखद, सुमंगल एवं अनंत भविष्य का निर्माण संभव है!

-सुबुद्ध सत्यार्चन