जीभर जियें!

जीभर जीने का बड़ा सीधा सरल सूत्र है कि हर पल मृत्यु के वरण को तत्पर रहो!
इस हेतु श्रीकृष्ण और तुलसी दास जी में से किसी की भी सीख अंगीकार कर लीजिए –
“कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः” (केवल कर्म ही कर्ता के अधिकार में है उस (कर्म) का फल नहीं! (“फल कुछ भी हो सकता है!” उस फल के स्वीकार के अतिरिक्त कोई विकल्प है ही नहीं!) इसी को तुलसीदास जी ने सरलीकृत किया “हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश, विधि हाथ”
और जो हमारे हाथ है ही नहीं उसके लिए चिंतित होने से क्या लाभ? सर्वांगीण, सर्वोत्तम, समर्पित प्रयास तो हमारे हाथ हैं …. जीवन जीने के विषय में भी यही लागू होते हैं!