आगाज-ए-महफिल 

आगाज-ए-महफिल

ना हम आते ना बुलाये जाते तो बहुत अच्छा था•••
अब आ ही गये हैं तो आप भी आ जाते तो अच्छा था •••

शब्द यूँ ही नहीं उछलकूद करते कभी किसी के•••
चंद इल्जाम और जरा आ जाते, तो अच्छा था!

रहे बेआवाज दिल का साज, क्यूँ कब तक?
आकर छेड़ जाते सूने तार••• तो बहुत अच्छा था•••

हुक्म आगाजे महफिल का मेरी खुशनसीबी मगर
ना जलाते दीप हम ही जल जाते तो अच्छा था!

बुलाये गये तो चले आये हैं••• हम यूँ ही उठकर,
अब आप भी आ जाते जनाब तो बहुत अच्छा था!

-सत्यार्चन

क्या किये! 

जोखिमों से सदा ही डरकर जिये तो क्या जिये!

जीने से पहले, मरे अक्सर… यूं मरे तो क्या जिये।

मौत आयेगी तो, सच है, तब मरना होगा …

पर मौत के आने से पहले, हर दिन मरे, तो क्या जिये!

आस के बादल तो थे, ठहरते तो बरसते•••

धीर धर ना सके तुम, चल दिये तो चल दिये!

बीती, बीत गई कबकी, ना मन से गई बिताई•••

बीती के भरे विष प्याले, नित-नित पिये तो क्या पिये!

दर्द ना देखा हो जिसने, ऐसा कोई हुआ नहीं…

आजीवन पीते रहे दर्द, जिये दर्द ही तो क्या जिये!

बाग थे, बहारें थीं, मन घर किये मगर पतझड़…

मौजों में कभी झूमे नहीं, यूं गमगीं जिये तो क्या जिये!

दावतें थी यारों की, मयखाने थे, थीं महफिलें…

बिन हँसे, बिन मुस्कराये, गुमसुम जिये तो क्या जिये!

शब भी थी, सुराही भी, थी हसीन साकी भी,

ना ढाला कभी ना छलकाया, फिर प्याले पिये तो क्या पिये!

ना बहके, ना लड़खड़ाये, ना उठाकर यार घर लाये…

अनगिन पिये प्यालों पे प्याले, यूँ पिये तो क्या पिये!

-सत्यार्चन

अशांत मन !

अशांत मन!

(पुनर्लिखित एक पुरानी रचना )

शांति की खोज में
भटकता रहा में
यहाँ वहाँ…
जाने कहाँ-कहाँ…
गांव-गांव, नगर-नगर
बस्ती -बस्ती , डगर-डगर!
वन -उपवन-मधुवन
हर कहीं कोलाहल
हर ओर कृन्दन!
उद्वेलित करते जटिल प्रश्न
अब भी ना था हुआ शमन !
आखिर में अशांत मन
जा पहुँचा ‘शांतिवन’
ज्वालायें थीं चिताओं में
निष्तब्धता को चीरकर
मुझे कह गई कोई चिटकन
नहीं कोई किसी का है सत्य वचन
राहों में बिछाये क्यों चितवन!
छोड़छाड़ तू सब भटकन
बस स्थिर कर ले अपना मन!

-सत्यार्चन सुबुद्ध

जागो सोने वालो!

जागो सोने वालो!

मैं सूर्य!
तस्वीर में खजूर के दरख़्त मुझसे बहुत बड़े दिख रहे हैं! तो क्या मैं उनसे छोटा हो गया ? वे तो अर्ध चेतन हैं—- जड़ सामान— और तुम? सुप्त चेतन! जागो समय व्यतीत होता जा रहा है••• फिर पछताओगे की मैं जगाने आता रहा और तुम जड़ खजूर की तरह अकड़ कर सोते रहे! अमृत बाँटने आता हूँ मैं रोज—- अमृत ! अमरत्व वाला नहीं ! सुख , सम्पन्नता, सौहार्द वाला—- जितना सुखपूर्वक जी लिए वही तो अमर जीवन है! शेष तो बोझ है! जागो! शरणागत हो जाओ ! इसी में तुम्हारा हित है! जग जाओ!
#सुप्रभातम #goodmornings

Dare???

Dare???

What’s seen (or hidden from eyes of some ordend followers of several political parties) is Real n bitter Truth of India… An Honest approach may transform it to Royal n Pleasant India!
Im started in 1988 ! If someone may dare following Honesty is welcomed joining my shoulders equivalently!

-Subuddh SatyaArchan

दर्पण- मीडिया! 

दर्पण- मीडिया!  

दर्पण निरपेक्ष है!

दर्पण के पेट नहीं है, वह भूख प्यास से परे है!

दर्पण लालच से परे है!

दर्पण अपने और अपनों के  दर्द से ना व्याकुल होता है ना ही इसके डर से आतंकित!  

इसीलिए दर्पण निष्पक्ष है!

मीडिया की आदर्श भूमिका दर्पण सी होने की अपेक्षा अनुचित नहीं है किन्तु मीडिया संचालकों में उपरोक्त सभी लौकिक गुण स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं नारद जी के काल से ही!

 किसी युद्ध मोर्चे में  पराजय या राज पुत्र की हत्या जैसे शोक संदेश वाहक की निरंकुश राजाओं द्वारा गर्दन काट डालने के  अनेक उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है!

इसीलिए केवल मीडिया को दोषी ठहराना कितना उचित है यह आप ही सोचिये!  

महान! 

महान! 

​यूँ मुसलमान हो जा 

कि तू कुरान हो जा !

सच्चा हिन्दू हो जा

तू इन्सान हो जा!

पक्का इसाई हो जा

मरियम का मान हो जा !

इतना महान हो जा

कि तू आसमान हो जा!

-सुबुद्ध सत्यार्चन 

नवरात्रि 

नवरात्रि शुभ हो आपको व सबको!

*हमारे कथन पर सीधे विश्वास या अविश्वास से पहले कथ्य को जाँच लें फिर निर्णय करें!*
-सुबुद्ध सत्यार्चन

*Don’t just Trust or DisTrust my words; Test then follow or forget!*
-SathyaArchan

शुभ की कामना है तो सदाचरण अपनायें!

हमारा मौन व्रत रहेगा!

*अतः यदि*
*आपके/आपके निकटजनों के*
*मन में/ जीवन में*
*कोई संशय/  कष्ट/ अपूरित लक्ष्य शेष हैं*

तो हमें यहाँ टिप्पणी में या व्हाट्सऐप पर
(हो सके तो ध्वनि संदेश/ वायस मेसेज अन्यथा शब्द संदेश द्वारा ही) आज से नवमी तक कभी भी अपना /अपने प्रश्न  888 9512 888 पर सविस्तार  प्रेषित कीजिएगा!

सभी प्रश्नार्थियों को सभी प्रश्नों के निःशुल्क  व सर्वोत्तम समाधान दशहरे को ध्वनि संदेश द्वारा प्रेषित कर दिये जायेंगे!

*जय माता दी!*

-सुबुद्ध सत्यार्चन

अंत्येष्टि!

अंत्येष्टि!

यदि आपके अपने ही आपके सर्वश्रेष्ठ प्रतिद्वन्दी हों

और जीत गलाकाट प्रतिष्ठा का प्रश्न;

तो समझ लीजिए बारूद की दीवारों वाला महल आपका परिवेष है…

भटकती चिंगारी आपका भाग्य…

और किसी भी पल आपके महल का आपकी चिता बनना ही आपकी परिणति!

-सुबुद्ध सत्यार्चन

If your greatest opponents are your dear ones….

then you reside in a house of explosives…

And at any moment some random fire would creat your funereal!

-“SatyaArchan’s Truer Tail”

मैं , तुम , हम!

मैं , तुम , हम!

शीशों का छिटकना•••
टूटना!
बिखरना!
किरचों का चुभना!
बस तुम्हारे साथ ही होता है क्या?
मेरा हाल क्या है ?
कुछ पता भी है ?
.
तुम कहो मैं जीता !
मैं कहूँ तुम!
जीत क्यों?
हार क्यों?
पनप सका ना
अब तक वो प्यार क्यों?
गले लगा लेते जब जीतते
लग जाते गले हारकर !
मैं क्यों ?
तुम क्यों?
होना हम दुश्वार क्यों???
.
-सत्यार्चन