विदाई

– विदाई – .
किसी के गले से लगना था
गले से किसी को लगाना था
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ना कोई गले से लग सका
ना गले से कोई लगा सका…
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किसी के दिल में बसना था
किसी को बसाना था दिल में;
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ना कोई दिल में बस सका
ना बसा सका कोई दिल में …
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आखिर विदाई की घड़ी आई..
और हो गई उसकी विदाई!
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#सत्यार्चन

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ईश कृपा

ईश कृपा

अनेक विशिष्ट चीजें केवल सामीप्य से ही मिल जाती हैं वो भी मांगे बिना ही— जैसे बर्फ के पास शीतलता,अग्नि के पास गर्माहट,गुलाब के पास सुगंध…
इसी तरह का स्वभाव परमात्मा का है उससे मांगने की आवश्यकता नहीं होती — अगर हम निकटता बना लें तो वो हमारी हर इच्छा को जान लेता है एवं हर उचित इच्छा के पूर्ण होने का रास्ता भी बना देता है —
इसीलिए आइये उस सर्वोपरि के सानिध्य का प्रयास प्रारंभ किया जाए ताकि हम सदा के लिए सांसारिक दुख और बंधनों से मुक्त हो सकें!
प्रभु से के चरणों में निकटता की शुभकामना के साथ ही ईश्वर के विषय में एक और महत्वपूर्ण तथ्य —
वो सदा से
इसी धरती पर हमारे बीच ही है !
कृपा करने के लिये वो सज्जनों के रूप में सामने आता है —
और
कोप के लिये कुबुद्धि/ दुर्जनों / आपदाओं को माध्यम बनाता है —
*मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारों या चर्च में वह मिले या ना मिले सतत किये गये सद्कर्मों से वह जरूर मिलता है*

#सत्यार्चन

सपने पालो तो सही … होंगे तभी तो … सच हो पायेंगे ना !

सपने पालो तो सही … होंगे तभी तो … सच हो पायेंगे ना !

 सपने… सच हो सकें…

दोस्तो,

बेशक

 सभी के

 सारे सपने

 कभी सच में नहीं बदल पाते

 मगर,

 उससे बड़ी सच्चाई है कि

 सपने

केवल उनके सच हो सके

जिन्होने पहले सपने देखे

फिर उन्हें पाला,

अपने सपनों से

 दीवानगी की हद तक मोहब्बत की,

अपने सपने को

अपना जुनून बना डाला …

जिनने अपने सपनों को जिया…..

और वो …..

जो सपने देखने तक से डरते हैं

 वो क्या जानें कि

सपनों के जीने भर में ही

कितना शुरूर है

और सच होने का जलसा 

कैसा अनौखा होता है….

                    (12 अगस्त 2013) – #सत्यार्चन

अमृत का प्याला

– अमृत का प्याला –

 

 

बड़े जतन से…

बार-बार…

 बनाया

अमृत का प्याला

सजाया …

तुम तक लेकर आया

 देखकर

या

अनदेखे

अक्सर

तुमने ठुकराया !

 काश …

स्वीकारते तुम …

अमृत का प्याला!

#सत्यार्चन

व्यर्थ की आशायें

व्यर्थ की आशायें

 आज की भोर भी

रोज सी ही थी

सुनहरी किरणें बिछी थीं …

और तुम ना थे….

http://lekhanhindustani.com/2017/08/05/व्यर्थ-की-आशायें

 

मगर तुम तो

दिन,  शाम और रात में भी

होते ही कब हो….

बस

मैं ही होता हूँ

सदा की तरह

एकाकी

अ’मृत

व्यर्थ की आशाओं के साथ …

#सत्यार्चन

 

 

 

 

रामराज्य!

रामनीति – राजनीति ? राम जाने!

आज की राजनीति बहुत जटिल है जी … समझ ही नहींं आती
जैसे आदर्शतम रामराज्य में राजा राम भी नहीं समझ पाये थे
या शायद समझा नहीं पाये थे ….
किसी अकिंचन के सीता मां पर संदेह जताने से
उस राज्य के राजा द्वारा अपनी रानी को त्यागने की घटना  को
उच्चकोटि का आदर्श राजनैतिक आचरण  माना जाता रहा है …
इस अकिंचन सत्यार्चन को तो यह किसी भी राजघराने के रनिवास की मर्यादा का हनन् दिखता है…
मेरी बुद्धि भी उस अकिंचन जितनी छोटी है ना ….
जिसपर आरोप है कि आरोप उसने लगाया था ….
किन्तु क्या श्रीराम के महान रामराज्य में
किसी अकिंचन में इतना साहस था कि
वह महानतम राजा की रानी पर ऐसा घिनौना आरोप लगा सके….
कहीं ऐसा तो नहीं कि
सभासदों में से ही किसी ने किसी अज्ञात काल्पनिक अकिंचन का उल्लेख कर
अपनी बुद्धिजीविता-वश उपजे कुटिल प्रश्न को
उसके बहाने उठाया हो ….
जबकि प्रश्न स्वयं सभासदों का स्वयं का  ही रहा हो?
या
पति राम ने प्रश्न उठाने राजा राम का आवरण ओढ़ा हो  ….
या
व्यक्ति राम अपनी पत्नी की सुरक्षा में असमर्थ रहने की खीझ
अपनी उसी पत्नी को प्रताड़ित कर निकाल रहा हो …..
राम जाने ….!
मगर
हमारे राम जी ने जिस किसी भी कारण से जो भी किया
वह तत्कालीन परिस्थितियों में, सर्वोत्तम ही रहा होगा ….
क्योंकि श्रीराम का सम्पूर्ण आचरण इस योग्य है
कि उनके निर्णय पर संदेह मूर्खता ही होगी …
आलोचना अलग बात है …
पति राम का आलोचक मैं भी हूँ ….
क्योंकि पति-पत्नी संबंधों को मैं
आज के परिप्रेक्ष्य में ही देख पा रहा हूँ ….
तत्कालीन का तो केवल अनुमान ही कर सकता हूँ ना ….!!!
#सत्यार्चन / SatyArchan / SathyaArchan
(वेव पर वैश्विक नाम)

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